Sunday, June 9, 2013

विकल्पहीनता और विकल्प

साभार : दी इंडियन एक्सप्रेस                           
बिहार का महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव पिछले दिनों चर्चा का विषय बना रहा । नीतीश कुमार ने जनता से विकास और सुशासन का दावा करते हुए वोट मांगे थे । इस तरह यह जद (यू) और राजद के बीच का चुनाव नहीं रह गया था । यह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के लिए नाक की लड़ाई बन चुकी थी । नीतीश कुमार के सुशासन और विकास के दावे को जनता ने खारिज कर दिया । राजद प्रत्याशी प्रभुनाथ सिंह ने जद (यू) के उम्मीदवार पीके शाही को करीब एक लाख सैंतीस हजार मतों के भारी अंतर से पराजित कर दिया । चुनाव परिणाम ने लालू प्रसाद यादव को खुश होने का मौका दिया है । मीडिया उन्हें पर्याप्त तबज्जो दे रही है । लालू भी अपनी वापसी के दावे करने से चूक नहीं रहे हैं । जद (यू) का कहना है कि राजद को महज एक लोकसभा उपचुनाव में मिली जीत पर इतना इतराना नहीं चाहिए । जद (यू) के अनुसार इस चुनाव परिणाम को पूरे बिहार का जनादेश समझना गलत है । पार्टी अपनी झेंप मिटाने के लिए कुछ भी कहे, यह चुनाव परिणाम नीतीश कुमार के अति आत्मविश्वास को जबरदस्त चुनौती देता है ।
बिहार की जनता ने आठ वर्ष पहले राजद से बुरी तरह ऊब कर नीतीश को सत्ता सौंपी थी । लालू प्रसाद यादव और बाद में उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री के रूप में करीब पन्द्रह वर्षों तक बिहार में सत्ता का सुख भोगा था । इस कालखंड में बिहार का पिछड़ापन बढ़ता ही चला गया था । अपराध का ग्राफ बढ़ने लगा था । शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई बुनियादी सेवाओं की बदहाली से आम जनता परेशान हो गयी थी । उन्नीस सौ नब्बे के विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव का मुख्यमंत्री के रूप में चुना जाना एक सुखद संकेत माना गया था । इसे गरीबों-पिछड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी के रूप में देखा गया था । लेकिन लालू प्रसाद यादव बाद में जातीय गणित में माहिर हो गये । यह रास्ता उन्हें ज्यादा सुविधाजनक लगा । कुशासन की परंपरा फलने-फूलने लगी । बिहार में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बढ़ती चली गयी । गंभीर समस्यायों से जूझते बिहार को लालू यादव के तिलिस्म से बाहर आने में पन्द्रह वर्ष लग गये ।
2005 में नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने भारी आशा के साथ सत्ता सौंपी थी । जनादेश ने लालू प्रसाद की राजनीति को पूरी तरह नकार दिया था । शुरू में नीतीश कुमार जनता की आशा पर खरे उतरते दिखे थे । अपराध का ग्राफ घटा था और भ्रष्टाचार के कम होने व बदहाली से उबरने के संकेत मिलने लगे थे । धीरे-धीरे यह उत्साह खत्म होने लगा । नीतीश की सरकार भी कागजी उपलब्धियों की सरकार बनने लगी । पन्द्रह वर्ष के कुशासन के बदले सुशासन का सिर्फ ढोल पीटा जा रहा था । बिहार की मीडिया को सत्ता ने इस तरह प्रभावित किया कि नीतीश सरकार की प्रशंसा में वह अब तक लिप्त रहती है । मीडिया ने जो माहौल तैयार किया उससे नीतीश कुमार की छवि राष्ट्रीय स्तर पर एक सक्षम नेता के रूप में उभरी । अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर भी उन्हें पहचान मिली । इसी माहौल में नीतीश कुमार 2010 में दुबारा सत्ता में लौटे । जनता के लिए लालू-राज की भयावहता की तुलना में यह फिर भी बेहतर विकल्प था ।
नीतीश कुमार की दूसरी पारी में जनता को हकीकत से रूबरू होने का ज्यादा मौका मिला है । इस बार नीतीश का अहंकार कई मौकों पर साफ दिख जाता है । सरकार को एक व्यक्ति की सरकार बना देने में नीतीश ने कोई कसर नहीं छोड़ी है । राज्य के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की  समस्यायों को लेकर नीतीश बात तक करने को तैयार नहीं होते हैं । जनता के सड़कों पर उतरने से भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । तस्लीमुद्दीन जैसे आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को अपनी पार्टी में जगह देने से उन्हें परहेज नहीं रह गया है । रणवीर सेना के राजनीतिक दलों से सम्बंध की जाँच के लिए बने अमीर दास आयोग को भंग करने का फैसला लेकर नीतीश  सरकार ने दलित नरसंहार को लेकर न्याय की आशा पर पानी फेरने का काम किया है । मतलब साफ है कि पिछड़े की राजनीति करने वाले नीतीश कुमार सवर्ण भूमिहारों की नाराजगी की चिंता करने लगे हैं । मंत्रियों और उनके सम्बंधियों को सस्ते दरों पर भूमि आवंटित करने के मामले पर भी नीतीश कुमार चुप ही रहे हैं । बाढ़ राहत घोटाले की जाँच भी सरकार ठीक ढंग से नहीं करा सकी है । भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने के बावजूद नरेन्द्र मोदी से विरोध का उनका नाटक भी लोगों को रास नहीं आ रहा है । कुल मिला कर नीतीश कुमार जनता की नजरों में एक गैर ईमानदार, तानाशाह, बड़बोले और दोहरा चरित्र रखने वाले नेता के तौर पर स्थापित होते जा रहे हैं । हालाँकि मीडिया के हीरो वे आज भी हैं । ऐसे में महाराजगंज उपचुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी को मिली करारी हार को नीतीश सरकार के प्रति जनता में व्याप्त भारी रोष की के रूप में देखा जाना उचित है । अभी तो यह नहीं लग रहा है कि जद (यू) इस चुनाव परिणाम से सबक लेने के मूड में है ।

महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव का परिणाम एक बड़ी समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचता है । इस परिणाम में विकल्पहीनता के संकेत निहित हैं । नीतीश से ऊब चुकी जनता के पास क्या सिर्फ उसी राजनीति की ओर लौट जाने का रास्ता शेष बचा है, जिसके कारण लगातार पन्द्रह वर्षों तक उसने ने यंत्रणा भोगी है ? इस बीच मीडिया ने यह जताने की कोशिश की है कि लालू अब बदल गये हैं । लेकिन यह सच नहीं है । पिछले कुछ वर्षों से सत्ता में नहीं होने से उनका रूतबा कम जरूर हो गया है, लेकिन तेबर अब भी वही है । पिछले आठ वर्षों में एक बार भी ऐसा अवसर नहीं आया है जब वे सही राजनीति के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखा सके हैं । उनके पास अपनी गलती को सुधारने के पर्याप्त अवसर थे लेकिन उन्होंने इसे गँवा दिया । पहली बार जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे तब लालू प्रसाद के लिए बेहतर होता कि वे बिहार में विपक्ष की राजनीति करते । लेकिन तब सत्ता सुख की लालसा में केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय में जमे रहे । नीतीश कुमार की दूसरी पारी में भी उन के लिए अवसर था । लेकिन इस बार भी उपेक्षा झेलने के बावजूद यूपीए सरकार के हर सही गलत फैसले में वे तरफदारी करते नजर आते हैं, गोया उनका यही काम हो । नीतीश कुमार के निरंकुश होते जाने का बड़ा कारण वहाँ विपक्ष नाम की चीज का नहीं होना रहा है । लालू प्रसाद की राजनीति में कोई सकारात्मक परिवर्तन आ गया है, इस निष्कर्ष पर पहुँचना मूर्खता है । रेल मंत्रालय में रहते हुए उनके विकास के दावे का सच भी अब सबके सामने आ रहा है । उनकी राजनीति को समझने के लिए उनका एक हालिया बयान महत्वपूर्ण है । प्रभु चावला के साथ एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार कानून फालतू है, यदि वे सत्ता में आए तो इसे हँटा देंगे । क्या नीतीश को नकारने का मन बना चुकी जनता ऐसे ही नेता को फिर से मौका देने के लिए मजबूर होगी ? या उस रामविलास पासवान के पास लौटेगी जिसकी अवसरवादी राजनीति को वह पहले ही खारिज कर चुकी है ? क्या जनता कांग्रेस पार्टी को मौका देगी जिसकी सरकार के कारनामे को लेकर बिहार ही नहीं देश भर में गुस्सा है ? या अंत में उसी भाजपा-जद (यू) गठबंधन को फिर से सत्ता सौंप देगी जिससे वह परेशान है ? ऐसी स्थितियाँ बनती हैं तो बिहार के दुर्भाग्य को विस्तार ही मिलेगा इसमें संदेह नहीं है ।
साभार : प्रतिरोध डाट कॉम

यह वह समय है जब बिहार की जनता को विकल्प चाहिए । सड़क पर विपक्ष की राजनीति करने व वैचारिक अराजकता से मुक्त होने का दावा करने वाली पार्टियों के लिए यह सही समय है कि वह खुद को एक बेहतर और सक्षम विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करे । इस समय जनता तक पहुँचने के लिए इन राजनीतिक ताकतों को उन रास्तों का चयन करना होगा जो जनता के दिलों तक पहुँचती है । वैचारिक राजनीति की आत्ममुग्धता से बाहर आकर उन्हें राज्य के कोने-कोने में जनता तक पहुँचने के लिए सघन अभियान चलाना होगा । 2014 के लोक सभा चुनाव तक यदि वे ऐसा करने में सफल होते हैं तो बिहार का उसके दुर्भाग्य से निकास की संभावना बची रहेगी । अन्यथा यह मान लेना होगा कि दुर्दशा बिहार की नियति है, यह भी कि बेहतर  और समानांतर राजनीति का दावा करने वाले राजनीतिक दलों मे राजनीति करने की इच्छाशक्ति मर चुकी है ।

Tuesday, March 5, 2013

शशि की स्मृति में

शशि शेखर
बीते वर्ष की कई अच्छी-बुरी यादें हैं। बुरी यादों में से एक है हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग के होनहार छात्र शशि शेखर का जाना। 16 नवम्बर 2012, पंखे से झूलती उसकी देह की कल्पना से भी सिहर जाता हूँ। 


शशि ने यह तस्वीर स्कूल के दिनों में बनायी थी।



मेरी स्मृति ठीक है तो पहली बार 2010 के जुलाई-अगस्त महीने में मैंने उसे यू-स्पेशल बुक शॉप में देखा था । सेतु ने बताया था कि यही शशि शेखर है। इसी के बी.ए. फस्ट इयर में 80 % के लगभग अंक आए हैं। हिन्दी में इतने अंक लाना बहुत बड़ी बात है। वह टहलते हुए रैक पर किताबें देख रहा था। मैं उसके पास गयामैं ने पूछा- कैसे और क्या लिखते हो कि इतने अंक आ जाते हैं उसने थोड़ा मुस्कुराते हुए बहुत धीमे से कुछ कहा था। उसने क्या कहा तब भी मैं समझ नहीं सका था या अब मुझे याद नहीं है। उसके चेहरे के एक्सप्रेशन से जरूर महसूस हुआ था कि ऐसे सवाल सुन-सुन कर वह ऊब चुका है।

एम.ए.(हिन्दी) की हमारी क्लासेज फैकल्टि ऑफ आर्ट्स में हुआ करती थी। एनरॉलमेन्ट हिन्दू कॉलेज में था। हिन्दू कॉलेज के छात्रो से खास कर अंडर ग्रेजुएट छात्रो से परिचय न के बराबर था। शहीद भगत सिंह कॉलेज का मेरा मित्र सेतु उसी साल (2010 में) माइग्रेशन कराकर बी.ए.(हिन्दी ऑनर्स) थर्ड इयर में हिन्दू कॉलेज आ गया था। मेरे विपरीत उसमें घुलने-मिलने की भारी क्षमता है। वह और शशि भी काफी घुल-मिल गए थे। सेतु बताया करता था कि शशि शेखर जिनियस है। किसी में परफैक्शन नहीं हो तो उसे 80% अंक नहीं आ सकते हैं, यह मैं अपने अनुभव से जानता हूँ। मैं ने उसकी लिखी कविताएँ और लेख हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग की दीवार पत्रिका पर देखी थी। उसकी लिखावट बहुत सुंदर थी। उसका व्यक्तित्व सौम्य था। उसके प्रति स्नेह और सम्मान दोनों आता था।
26 फरवरी 2011 को हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग ने एक दिन के लोकल ट्रिप का कार्यक्रम रखा था। एम.ए. के छात्र भी जा सकते थे। मैं गया था। लोदी गार्डेन, मुगल गार्डेन और हिरण पार्क मे हम लोग घूमने गए थे। वे लोग जो परिवार के साथ रहते हैं अपने घरों से ज्यादा भोजन लेकर आए थे। ज्यादा इसलिए कि उसमें हम जैसे लड़के-लड़कियों का हिस्सा भी था जिनके लिए भोजन बना कर ला पाना कठिन था। लोदी गार्डेन में हम लोग खाने बैठे थे। मेरे बगल में सेतु और उसके बगल में शशि बैठा था। वह अल्प भोजी नहीं था। वह जितनी धीमी गति से बोला करता था, उतनी ही धीमी गति से खाता भी था। सबके खाकर उठ जाने के कुछ देर बाद ही वह उठा था। सेतु ने उससे मजाक में कुछ कहा भी था ।

उसके साथ सबसे अधिक समय तब बीता था जब हम कथाकार उदय प्रकाश के यहाँ गए थे। हिन्दू कॉलेज वाली ट्रिप से ठीक एक दिन पहले यानी 25 फरवरी 2011 को। हिन्दू कॉलेज की वार्षिक पत्रिका- इन्द्रप्रस्थके लिए उन से साक्षात्कार लेने कॉलेज से एक टीम गयी थी। शशि के अलावा अनुपमा, अदिति, असीम, संजीव और सेतु के साथ मैं भी था। वह उस दिन उत्साह में  था। लेकिन उदय प्रकाश के साथ दो-तीन घंटे तक चले साक्षात्कार में वह एक भी सवाल नहीं पूछ सका था। लौटते हुए इसका उसे मलाल था। संभवतः हम लोगों द्वारा लगातार पूछे जा रहे सवालों के बीच अपने विनम्र और संकोची स्वभाव के कारण वह सवाल नहीं पूछ पा रहा था। बाहर आकर उसने प्रतिक्रिया दी। असीम तो आलोचना पर ही उन्हें घेरे हुए था। आप तो रेपिड फायर राउंड लेकर बैठ गए- सेतु से कहा। मेरे लिए कहा- भैया भाषा के सवाल पर ही अटके रहे। उसकी प्रतिक्रिया बता रही थी कि हम सब ने अच्छा साक्षात्कार नहीं लिया है। मैं ने उससे कहा था कि कुछ तुम्हारे सवाल थे तो तुम्हें पूछना चाहिए था न, तुम चुप क्यों रहे ? शायद उसने कहा था कि आप लोगों ने मौका ही कब दिया या उसने कोई जवाब नहीं दिया था।
उदय प्रकाश का यह दो-तीन घंटे का साक्षात्कार हमने रिकॉर्ड किया था। इसे लिपिबद्ध करना आसान नहीं था। इसके कई अंशों को एडिट भी करना था। इस काम में शशि को किसी से खास मदद नहीं मिल सकी थी। इस तरह मेहनत का यह काम उसने अपने ही बूते किया था। 'इन्द्रप्रस्थ' में वह साक्षात्कार छप कर आया। उसने बहुत सारे अंश अपने विवेक से हँटा दिए थे। उदय प्रकाश के उत्तर में से मुख्य अंश को छाँटकर उसने उसकी भाषा को भी दुरूस्त कर दिया था। इसे पढ़ते हुए मुझे लगा था कि यह लड़का संभावनाओं से भरा हुआ है। यह भविष्य मे बहुत बेहतर करेगा।

शशि से मेरी कभी लम्बी अनौपचारिक बातचीत नहीं हुई थी। बाद में जब वह मिलता तो हालचाल या मुस्कुराहट भर से हमारा काम चल जाता था। वह कम से कम बोला करता था। अपने निकट के लोगों से सम्भव है वह खुल कर बोलता हो। वामपंथी छात्र संगठन आइसा से जुड़े सन्नी ने मुझे बताया था कि शशि फस्ट इयर में इस छात्र संगठन में बेहद सक्रिय रहा था। वह ट्यूशन पढ़ाया करता था। लौटते हुए उनसे अक्सर समसामयिक विषयों पर बहस किया करता था। लेकिन सेकेन्ड इयर में उसकी सक्रियता धीरे-धीरे कम होती गयी। सन्नी का मानना है कि वह कैरियर का दबाव महसूस करने लगा था। सेकेंड इयर का परीक्षा परिणाम उसकी आशा के अनुरूप नहीं था। ऐसे में सांगठनिक सम्पर्क से उसने खुद को पूरी तरह से काट लिया था। बहुत संभव है कि इसके कारण वैचारिक द्वंद्व से उपजे हुए हों।

इस दुखद घटना से कुछ महीने पहले मैंने शशि शेखर के फेसबुक वाल पर यूजीसी के एक स्कालरशिप योजना का लिंक शेयर किया था। यह स्कॉलरशिप विश्वविद्यालय में पढ़ रहे एम.ए. के उन विद्यार्थियों के लिए था जो बी.ए. में विश्वविद्यालय का रेंक होल्डर रहा हो। लिंक के साथ मैंने लिखा था- तुम्हारे लिए। उसने प्रतिक्रिया दी थी- SO SWEET OF YOU BHAIYA!!
संभवतः उससे अंतिम भेंट फैकल्टि ऑफ आर्ट्स में हुई थी। वह चलते हुए मिल गया था। मैंने उससे स्कॉलरशिप फॉर्म भरा या नहीं यह पूछा था। वह मेरी बात ठीक से समझ नहीं सका था। जब उसने समझा तो धीरे से कहा- हाँ, भर दिया।

शशि का इस तरह चला जाना बहुत टीस देता है। न्यूज चैनलों और अखबारों में पुलिस के हवाले से उसके नोटबुक में लिखे जिन पंक्तियों को उसके सुसाइड नोट के रूप में दिखाया गया वह था : It’s my story: Can we do nothing for the dead? And for a long time the answer has been nothing’ *
[यह मेरी कहानी है : क्या हम मृतकों के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं ? और लम्बे समय से इसका उत्तर है- कुछ भी नहीं।]
दरअसल यह निर्मल वर्मा की कहानी परिंदेका एक अंश है, इसके वाक्यांश It’s my story को छोड़कर।  कहानी की शुरुआत कैथरीन मेन्सफील्ड के इसी वाक्य को कोट करते हुए की गयी है। यह कहानी शशि की कक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। ऐसे में इसे सुसाइड नोट कहना कितना उचित है ? हालाँकि It’s my story का लिखा होना, जैसा कि अखबारों में बताया गया है, खटकता है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह नोटबुक जिस छात्र का था, वह बहुत क्रियेटिव था। कुछ अनाम प्राध्यापकों के हवाले से यह भी छापा गया था कि वह मृत्यु के बाद के जीवन पर लगातार शोधरत था। उसने एक-दो दिन पहले कुछ प्राध्यापकों से इस विषय पर लम्बी चर्चा भी की थी। ये खबरें भी अपुष्ट हैं। और इसे नोटबुक में लिखी पंक्तियों के आगे की मनगढ़ंत कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।


13 मार्च 2012 को हस्ताक्षर पत्रिका के लिए साक्षात्कार के क्रम में कुंवर नारायण के साथ।
शशि शेखर मेधावी था। उससे इर्ष्या की जा सकती थी। उस पर गर्व किया जा सकता था। वह कविताएँ लिखा करता था। मैंने सुना है वह नियमित डायरी लिखा करता था। उसे पत्र लिखने में भी रूचि थी। मैं दृढ़ विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इतनी कम उम्र में भी उसके विचार जहाँ दर्ज होंगे महत्व के होंगे। शशि की जिनसे भी अनौपचारिक बातचीत होती थी वे उसकी वैचारिकी को अपनी स्मृति के सहारे कलमबद्ध कर सकें तो बड़ी बात होगी। उसकी डायरी और पत्र प्रकाश में लाये जा सके तो उसकी प्रतिभा से लोग परिचित हो सकेंगे। उसके असाइनमेंट्स भी महत्व के होंगे।** कुछ ऐसे संस्मरण जो उसकी मनोदशा की पड़ताल करे, लिखे जा सके तो एक बड़ा भ्रम खत्म होगा। यह सब काम शशि के करीब रहे लोगों को करना चाहिए। उससे तो बहुत सारी शिकायतें हैं। जो कम बोला करते हैं उन्हें ऐसे चुपचाप नहीं चल देना चाहिए। उसके साथ एक बड़ी सम्भावना का अंत हो गया। उसकी वैचारिकी और सृजन को सहेजा जा सका तो उसके लिए बड़ी श्रद्धांजलि होगी।


* शशि शेखर से जुड़ी खबरें :
2. नवभारत टाइम्स

** हिन्दू कॉलेज की वे पत्रिकाएँ जिन से शशि का गहरा जुड़ाव रहा है उन पत्रिकाओं को शशि की रचनात्मकता को सामने लाने का कार्य जरूर करना चाहिए।

शशि शेखर की  कुछ प्रकशित रचनाओं के लिंक :
1. शब्दों में छिपी रोशनी : नरेश सक्सेना के कविता संग्रह 'सुनो चारुशीला' की समीक्षा / जनसत्ता,14 अक्टुबर 2012
2. बतकही के बहाने : स्वयं प्रकाश के साक्षात्कारों के संकलन 'और फिर बयाँ अपना' की समीक्षा / जनसत्ता, 15 जनवरी 2012
[सारी तस्वीरें शशि शेखर (Shashi Shekharके फेसबुक प्रोफाइल से से ली गयी हैं।]

Sunday, December 16, 2012

सर क्रीक जैसे मुद्दे अनायास नहीं उठाए जाते

साभार : बीबीसी न्यूज
इस साल नवम्वर महीने में इजराइल की सेना ने आत्मरक्षा के नाम पर गाजा पर लगातार हमले किये। एक बड़ी सैन्य ताक़त द्वारा मासूमों का बेदर्दी से कत्ल किया गया। इजराइल की संसद अक्टूवर महीने में भंग कर दी गयी थी। इसी महीने यह भी तय हो गया था कि जनवरी 2013 में वहाँ आम चुनाव कराए जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में इजराइल की आंतरिक स्थिति बहुत संतोषप्रद नहीं रही है। रोजगार, गरीबी व अन्य आंतरिक चुनैतियों से निपट पाने में अपनी असफलता से ध्यान हटाने के लिए लिकुड पार्टी की सरकार के लिए आत्मरक्षा के मुद्दे को हवा देना जरूरी हो गया था। * ईरान से ख़तरे की बात भी वहाँ ज़ोर-शोर से उठाई जा रही है। यह लगभग साफ हो चुका है कि नवम्वर में फिलिस्तीन पर हुए हमले की मूल वजह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की चुनावी महत्वाकांक्षा है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इंसाफ और शांति पसंद लोगों द्वारा इजराइल के इस कृत्य की निंदा की गई। लेकिन अमेरिका लगातार यह संदेश देता रहा कि वह इजराइल के अत्मरक्षा के अधिकार का सम्मान करता है। यह समान मानसिकता वाली शक्तियों की दोस्ती का बयान है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव भी इसी इसी तरह के कुछ मुद्दे उछाल कर जीते जाते रहे हैं। इस बार ओबामा की बड़ी सफलता एटावाद में पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन कर ओसामा को मारना रहा। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ओसामा को इसी उद्देश्य से अनुकूल समय में शिकार बनाया गया।

यह अनायास नहीं है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सर क्रीक (SIR CREEK) का मुद्दा उठाया है। सर क्रीक गुजरात के कच्छ से सटा खाड़ी क्षेत्र है। यह सामरिक दृष्टी से महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत और गुजरात की सीमा रेखा पर फैले इसके करीब 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दोनो ही देश अपना दावा करते हैं। ** इसलिए यहाँ दोनो देशो के बीच तनाव बना रहता है। लेकिन इस क्षेत्र का विवाद सियाचिन विवाद की शोर में दवा रहता है। नरेन्द्र मोदी ने यह संदेह व्यक्त किया है कि प्राकृतिक गैस व तेल के कुओं से समृद्ध सर क्रीक खाड़ी क्षेत्र को भारत सरकार एक गुप्त समझौते के तहत पाकिस्तान को सौंपने की तैयारी कर रही है। इस मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी ने एक पत्र प्रधानमंत्री के नाम लिखा है।  मोदी ने यह पूछा है कि अप्रैल में अजमेर यात्रा पर आए पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ जब आप दिल्ली में भोजन कर रहे थे तब क्या जरदारी ने सर क्रीक का मुद्दा नहीं उठाया था ? आपने तेहरान में पूरी दूनिया के सामने पाकिस्तान से किसी ठोस समझौते की ओर बढ़ने की बात नहीं कही थी मोदी ने पोरबंदर में केद्रीय रक्षामंत्री के उस बयान को भी उद्धृत किया है जिसमें उन्होंने सर क्रीक मुद्दे पर आगे के रास्ते खुलने की बात कही थी। मोदी ने इस संदर्भ में पीएमओ से स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा है। पत्र में उनहोंने ख़ुद को देश का एक आम नागरिक कहा है जो देश की सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर चिंतित है। ***  यह सच है कि आपसी विवादों पर होने वाली बातचीत को लेकर सरकारों का अपने देश की जनता के साथ पारदर्शिता का घोर अभाव रहा है। लेकिन आपसी बातचीत में विवादास्पद मुद्दों को शामिल किया जाना संदेह की वजह नहीं हो सकता है। सर क्रीक का मुद्दा दोनों देशों के बीच पहले भी उठता रहा है। **** अब तक का इतिहास यही रहा है कि सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दोनों देशो के हुक्मरान यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर रहे हैं। एक इंच जमीन को लेकर भी उनका समझौतावादी रुख अपने देश में उनकी राजनीतिक साख को हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता है, यह उन्हें बेहतर पता है। ऐसे में पीएमओ और कांग्रेस के नेता नरेन्द्र मोदी के संदेह को मनगढ़ंत, निराधार और भड़काऊ बता रहे हैं तो यह ग़लत नहीं लगता है । चुनाव के दौरान देश की संप्रभुता और अखंडता का मुद्दा उठाकर नरेन्द्र मोदी जहाँ एक ओर कांग्रेस द्वारा देशहित को सुरक्षित रख पाने की क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं, वहीं ख़ुद को एक दूरदर्शी और सामर्थ्यवाण नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। निश्चित रूप से वे विकास के अपने दावे के खोखलेपन से परिचित हैं और उन्हें पता है कि हर बार की तरह जुनूनी वोट ही उन्हें कुर्सी तक पहुँचाएँगे। देश की सीमा विवाद पर संदेदनशील बयान देकर पूरे देश का ध्यान एक बेहतर नेतृत्व के तौर पर अपनी ओर खींचना भी उनका ध्येय हो सकता है। सभी जानते हैं कि उनकी निगाहें साउथ ब्लॉक पर टिकी हैं।

21 नवम्वर को मुंम्बई हमले के दोषी आमिर अजमल कसाब को पुणे के यरवदा जेल में बेहद गुप्त तरीके से फाँसी दे दी गई। ***** इसका समय भी गुजरात चुनाव से ठीक पहले चुना जाना कुछ निहितार्थ रखता है। जिस तरह कांग्रेसी नेता और कई केन्द्रीय मंत्री इसे अपनी बड़ी सफलता के तौर पर दिखा रहे हैं, वह भी संदेह पैदा करता है। देश भर में कसाब की फाँसी के बाद यूपीए सरकार ने जो जश्न की प्रस्तावना रखी है वह मुम्बई हमले के पीड़ितों को न्याय मिल जाने का भ्रम पैदा करता है। कई लोगों ने ऐसा मान भी लिया है। दरअसल कट्टर राष्ट्रवाद और हिंदूवाद की राजनीति करने वाले नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के भारी प्रभाव वाले गुजरात में उनसे मुकाबला करने के लिए उन्हीं की भाषा में ज़वाब देना कांग्रेस को ज़रूरी लगने लगा है। कांगेस के हिस्से मंहगाई और भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी के आरोप के अलावा कुछ भी नहीं है। ऐसे में कांग्रेस ने कसाब की फाँसी को अपने ढाल के रूप में इस्तेमाल किया है। कांग्रेस पर लगने वाले मुस्लीम तुष्टिकरण के आरोप के मुकाबले इसे गुजरात चुनाव में कांग्रेसी नेताओं ने ख़ूब भुनाया भी है।

राष्ट्र की सुरक्षा और प्रतिष्ठा से जुड़े भावनात्मक मुद्दे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जिन्हें भड़काकर जनता को आसानी से मुर्ख बनाया जा सकता है। सिर्फ धर्म ही नहीं किसी भी भावना को कट्टरता से से जोड़ दिया जाए तो वह अफीम का काम करती है। इस समय पूरी दुनिया में राष्ट्र की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के प्रति जनता के भावनात्मक जुड़ाव को कट्टर बनाने में उस राष्ट्र का पूरा तंत्र और दक्षिणपंथी ताक़तें जी जान से जुटी हुई हैं। इस अफीम का अपने हक़ में इस्तमाल करना, राजनीतिक पार्टिर्यों को ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित लग रहा है। ऐसे में विश्व भर में पसरी ग़ैरईमानदार राजनीतिक ताक़तें कभी अमन चाहेंगी और विवादास्पद अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को सुलझाने  की मंशा रखेगी, यह उम्मीद रखना मूर्खता है। घरों में आग लगाकर हाथ सेकने की जो परंपरा विश्व भर में निर्विघ्न चल रही हैं, जनता की समझदारी ही इससे निपट सकती है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि सर क्रीक जैसे मुद्दे अनायास नहीं उठाए जाते हैं।


साभार  संदर्भ :

  2.  Wac-Maan / Article

**विकिपीडिया / सर क्रीक खाड़ी विवाद

*** हिन्दुस्तान टाइम्स (16 दिसम्बर 2012)

****न्यूज रिपोर्टर डाट इन


Sunday, November 11, 2012

अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव और हमारी औपनिवेशिक मानसिकता

साभार : dishtracking.com
अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव सम्पन्न हो चुका है। रोमनी की हार हुई है और ओबामा फिर से राष्ट्रपति चुने गए हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया भारत में भी एक ख़ास तरह का माहौल तैयार करती है। मीडिया में तरह-तरह से इसका विश्लेषण होता है। विश्लेषण जिस वैचारिकी के आधार पर की जाती है, उसका असर जनमानस पर भी पड़ता है। यह चर्चा का विषय बना रहता है कि किसके राष्ट्रपति बनने से भारत को ज़्यादा फ़ायदा होगा। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति की नीतियाँ दुनिया भर के देशों को प्रभावित करती हैं। विचारणीय यह है कि यह प्रभाव कितना सही है। कम से कम हमारे विश्लेषण का वर्तमान तरीका  इसे सही ही ठहराता है। अर्थ और सामरिक शक्ति के केन्द्र के रूप किसी एक देश का या कुछ देशों का स्थापित होना, दुनिया भर केलिए ख़तरनाक है। किसी प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र के द्वारा इसकी संस्तुति और भी ख़तरनाक है। देश की जनता सबसे अधिक देश की मीडिया से प्रभावित होती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की विदेशनीति के मामले में हमारे यहाँ मीडिया प्रायः आलोचनात्मक रुख़ अख़्तियार नहीं कर पाती है। ऐसे में अमेरिका को लेकर देश की सत्ता की सोच ही मीडिया में प्रतिबिम्बित होती है। अमेरिकामुखी होना हमारे यहाँ सत्ता की सोच का बुनियादी हिस्सा बन चुका है। इस सोच ने औपनिवेशिकता का नया मुहाबरा रचा है। इसकी जड़ की तलाश देश की आर्थिक नीतियों पर जा कर ख़त्म होती है। हमारी अर्थव्यवस्था पर पूँजी का दबाव जिस रफ़्तार से बढ़ना शुरू हुआ, हमारी रीड़ की हड्डी उसी रफ़्तार से झुकती चली गयी  जबकि नब्बै के दशक में मनमोहन के आर्थिक उदारवादी मॉडल ने तो हमारी रीड़ की हड्डी तोड़ कर रख दी। सार्वजनिक उपक्रमों को तबाह करने की साज़िश के बीच निजीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश की सुविधाओं का जो झुनझुना देश की जनता को पकड़ाया गया, वह हमें अमेरिका जैसे देश का आर्थिक उपनिवेश बना देने केलिए काफ़ी था। आज अमेरिका का उसकी अर्थनीति को लेकर किया गया मामूली फैसला भी हमारे हितों को प्रभावित करता है।

ऐसे में यह सोचना ज़रूरी है कि जो हो रहा है वह हमारे लिए कितना ख़तरनाक है। देश की मीडिया का भी यह दायित्व है कि जनता को देश की विदेश नीतियों व आर्थिक नीतियों के प्रभावों-कुप्रभावों को लेकर जागरूक बनाए। वैसे बड़े पूँजी घरानों से पोषित या उसके दबाव में काम करने वाली मीडिया से तो इसकी उम्मीद नहीं ही की जा सकती है। समानांतर मीडिया ही यह काम भी कर सकती है। देश की जनता जब देश की आर्थिक, सामरिक व विदेश नीतियों का सच समझकर मतदान करेगी तभी देश सही अर्थों में समप्रभु हो सकेगा। हमारी समप्रभुता आर्थिक और सामरिक साम्राज्यवादी नीतियों के पुरजोर विरोध से पुष्ट होगी। यह बहुत ज़रूरी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को एक राष्ट्र का उसके राष्ट्राध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया से अधिक कुछ भी न समझा जाए। जबतक इसे इससे अधिक समझा जाता रहेगा तब तक यह हमारे औपनिवेशिक मानसिकता को प्रकट करता रहेगा। इस मानसिकता से मुक्ति तभी मिल सकेगी जब हम सत्ता के रूप में सही सोच को चुनेंगे और उस पर यह दबाव बनाए रखेंगे कि आर्थिक,सामरिक और विदेश नीतियों पर भी उसे जनता की अपेक्षा पर खरा उतरना है।

Thursday, September 13, 2012

सवाल हमारी आलोचनादृष्टि का भी है

असीम त्रिवेदी का एक कार्टून जिसपर विवाद है।
साभार: Frontierindia
यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए; कि असीम से जुड़े कार्टून विवाद पर लिखना असीम के प्रति सहनुभूति है. इसकी ज़रुरत भी नहीं है. सवाल किसी पक्ष में खड़े होने की है और अपने भीतर के सारे उपापोह ख़त्म कर इस तरह खड़ा होना ज़रूरी है. अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीनने का हक़ हम किसी को नहीं दे सकते हैं. लेकिन यहाँ सिर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल नहीं है. एक बड़ी समस्या कला की ग़लत व्याख्या से पैदा हो रही है. बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबक़ा असीम पर लगाये गए राजद्रोह के आरोप का विरोध कर रहा है. लेकिन यह तबक़ा ऐसा मान कर चलता है कि असीम ने अपनी अभिव्यक्ति केलिए राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमानजनक पयोग किया है;जो एक नैतिक अपराध है. दरअसल कला की सीमा को निर्धारित करने का यत्न किया जा रहा है. यह प्रयास नया नहीं है. हमेशा से होता आया है. मसलन साहित्य की जनोन्मुखता रीतिकाल में ग़ायब रही. यह गायब हुयी नहीं थी; बल्कि की गयी थी. कला और साहित्य को उस समय इसी ढंग से परिभाषित किया जाता था. काव्यशास्त्र और नायिकाभेद तक साहित्य और कला का सौंदर्य अक्षुण्ण है; ऐसा मान लिया गया था. आधुनिक काल में इसे तोड़ा गया. ऐसे ही सौंदर्य के कई बने-बनाये प्रतिमानों का भविष्य में तोड़ा जाना तय होता है.

हमारे सौंदर्यबोध का अस्सी फ़ीसदी हिस्सा हमारे परिवेश से ही निर्मित होता है. और बचपन से ही हमें प्रतीकों से प्रेम करना सिखाया जाता है. ख़ासतौर पर धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतीकों से. प्राय: उम्र बढ़ने के साथ-साथ हम अपनी व्यक्तिगत सौन्दर्याभिरूची विकसित करने का प्रयास करते हैं. इस क्रम में हमारी समझदारी कई चीजों को लेकर बदलती है. विशेष कर धार्मिक प्रतीकों को लेकर. इसकी वज़ह यह है कि धर्म को लेकर प्रगतिशील चिंतन की परंपरा बहुत मज़बूत हैं. लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों व राष्ट्रवाद पर ऐसी ही चिंतन परंपरा का अभाव है. जो चिंतन उपलब्ध हैं; वे हमें भाते नहीं हैं. ऐसे में सारी कट्टरता हम छोड़ते भी जाते हों; तो राष्ट्र को लेकर हमारी कट्टरता कमोवेश बची रहती है. हम देश के प्रति भावुकता व प्रेम की आड़ में कैसे कट्टर होते जाते हैं; पता ही नहीं चलता है. हम पड़ोसी देश की हरक़तों से तंग आकार सोचते हैं कि यह तो सरकार निक्कमी है; वर्णा हमारी सेना को पड़ोसी देश तबाह करने में घंटा भर भी नहीं लगेगा. आश्चर्यजनक यह है कि ऐसा सोचते हुए हमें उस देश के अपने ही जैसे लोगों का बिल्कुल भी ख़्याल नहीं आता है. अब यह मानसिकता सांप्रदायिक कट्टरता से किस तरह से अलग है; जिसके प्रभाव में किसी एक मोहल्ले की दुर्भाग्यपूर्ण घटना या इस संदर्भ में फैलाया गया अफ़वाह किसी दूसरे मोहल्ले में निर्दोष लोगों के ख़ून से अंजाम तक पहुँचाई जाती है. कट्टरता हमेशा कोरी भावुकता के आड़ में पनपती है. सीमापार आतंकवादियों को भी इसी आधार पर तैयार किया जाता है.

असीम त्रिवेदी से जुड़े कार्टून प्रकरण में हमारी कट्टर मानसिकता और कला के प्रति व्यवस्थित आलोचनादृष्टि के आभाव का ज़बरदस्त असर रहा है. कार्टून में निहित भावना की उचित व्याख्या किये जाने के वज़ाय प्रतीकों के दुरूपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बहस ही हावी रहा. संभवत: ऐसी ही बात कविता या कहानी में कही जाती तो बुद्धिजीवियों को उसके पक्ष में खड़े होने में दिक्कत नहीं होती. मसलन नागार्जुन की पंक्ति- बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू केया धूमिल की पंक्ति- हमारे यहाँ संसद तेली की वह घानी है / जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है” ; इन पंक्तियों को हम यथास्थिति का सटीक वर्णन कहने में संकोच नहीं करेंगे. लेकिन इन्ही भावनाओं का कार्टून रूपांतरण हमें राष्ट्रपिता व संसद का अपमान लग सकता है. सच तो यह है कि कला को लेकर हम में से ज़्यादातर लोगों की समझ बहुत विकसित नहीं है. साहित्य में जिस तरह आलोचना की परंपरा रही है; कला में वैसी ही आलोचना की परंपरा नहीं है. ऐसे में किसी कार्टून को तार्किक ढंग से समझने की ज़रूरत हमें महसूस नहीं होती है. क्या असीम ने कार्टून को जिन प्रतीकों के माध्यम से उठाया है; वह सर्वथा वर्जित है या होना चाहिए? क्या असीम के ये विवादास्पद कार्टून अभिव्यक्ति की दृष्टि से गहरा अर्थ नहीं रखते हैं? असीम ने जिन राष्ट्रीय प्रतीकों की दुर्दशा दिखाई है; वह उनका नहीं वल्कि किसी और का कमाल है. राष्ट्रीय प्रतीकों को संविधान निर्माताओं ने देशवासियों की भावनाओं से जोड़ कर ही स्वीकृत किया था. उन भावनाओं के साथ हो रहे खिलबाड़ ने राष्ट्रीय प्रतीकों की जो दशा की है; असीम ने उसे दिखाया है. देश की दुर्दशा को  दिखाने केलिए राष्ट्रीय प्रतीकों की दुर्दशा को प्रतीक के रूप में दिखाना प्रभावी सृजनशीलता का नमूना है. बड़े तबक़े में एक बौखलाहट देखी जा सकती है. बेहतर तब होता जब प्रतीकों की इस दुर्दशा को देखकर आहत हुए लोग; इसमें निहित देश की दुर्दशा से इतने ही आहत होते. कला को लेकर हमारी अपरिपक्व समझ और हमारी कट्टरता ने अभिव्यक्ति की सीमा निर्धारित करने का जो प्रयास किया है; वह हमारे लिए ही ख़तरनाक सवित होगा.  हमें सोचना चाहिए कि क्या सत्यमेव जयते की भावना पर असत्यमेव जयते या भ्रष्टमेव जयते की भावना हावी नहीं हो गयी है? क्या सत्य की सुरक्षा को सुनिश्चत करने का आश्वासन देते सिंह भेड़िये जैसे धुर्त नहीं हो गए हैं ? क्या संसद भवन में सांसदों के अभद्र आचरण पर हमें शर्म नहीं आती है ? क्या हमें नहीं लगता कि हम सबकी भावनाओं से निर्मित जो हमारा देश है; उसके साथ रोज बलात्कार हो रहा है? कार्टून दृश्य विधा है. हमारी कही गयी बातों की अपेक्षा ज़्यादा मुखर. इसलिए कार्टून में यही अभिव्यक्ति हमें अखड़ती है. इसी विषय वस्तु का यदि फिल्मांकन किया जाये तो बहुत संभव है कि कोरी भावुकता से भरे कट्टर लोग हिंसा तक पर उतारू हो जाएँ. सच तो सिर्फ सच होता है. अभिव्यक्ति की विधा अलग अलग हो सकती है. असीम ने अभिव्यक्ति की विधा के तौर पर कार्टून को चुना है. निश्चत तौर पर यह ज्यादा बेधने वाली विधा है. असीम ने सच को कलाभिव्यक्ति भर दी है. तमाम विसंगतियों के बीच हम यशपाल की कहानी परदाकी तरह अपने प्रतीकों के परदे से ढँके नहीं रह सकते. हमें यह सोचना ही होगा की हमारे सारे प्रतीक किस तरह हमारे और हमारे देश चलाने वालों के आचरण से अपना अर्थ और स्वरूप खोते जा रहे हैं. असीम ने इसी को व्यक्त करने का प्रयास किया है. बहुत ज़रूरी है कि हम असीम के बनाए कार्टूनों की तरह; प्रतीकों के संवेदनशील चरित्र पर भी विचार करें. हमें यह ध्यान रखना चाहिए की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नगाड़े बजा कर भी कहीं हम कला को नष्ट करने का ख़तरनाक तरीका तो नहीं चुनते जा रहे हैं ! बहुत ज़रुरी है कि कला की सुदृढ़ आलोचना परंपरा का विकास हो. अन्यथा कला को लेकर हमारी उथली समझ; कला की सीमा निर्धारित करने का औज़ार बन जाएगी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हुए भी असीम के कार्टून की निंदा करना; प्रगतिशीलता और कला को लेकर हमारी समझ का द्वन्द्व ही है. असीम ने प्रतीकों में निहित भावना और वर्तमान परिस्थिथि में उस भावना की नियति का विरोधाभास (कंट्रास्ट) दिखाने में ज़बरदस्त सफलता पाई है. यह बेहिचक कहा जा जा सकता है कि वे बेहद प्रतिभाशाली कार्टूनिस्ट हैं. और मुक्तिबोध की उस भावना का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जो अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की बात करता है.

असीम के कुछ इंटरव्यू देखने के बाद उनहें अपरिपक्व व बचकाना कहने का सबको मौका मिल गया है. यह बात सही भी है की असीम ने कई अगंभीर बातें भी की हैं. वे अपनी परिपक्वता का प्रदर्शन नहीं कर सके हैं. लेकिन अपने कार्टून में राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर उनका पक्ष बहुत स्पष्ट है. हमें भी असीम की अभिव्यक्ति को उनके कार्टून में ही ढूँढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. असीम अपनी भावना को बेहद तार्किक ढंग से बोल कर अभिव्यक्त कर सकें; तभी उनके कार्टून की प्रासंगिकता है; हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए. असीम बहुत बौद्धिक हों; यह भी जरुरी नहीं है. वे अपने निजी जीवन में व्यवहार कुशल और अच्छे इन्सान हों; इसकी भी हमें अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. असीम की भावनाएँ सबसे बेहतरीन ढंग से उनके कार्टून में मुखर होती है. और कार्टून की सार्थक व्याख्या ही असीम की भावनाओं और विचारों से हमें जोड़ सकती है.


यह कहना भी सही नहीं है कि असीम ने रातों-रात प्रसिद्द हो जाने का आसान रास्ता चुना है. असीम के ये विवादास्पद कार्टून ताज़ा नहीं हैं. इन्हें बनाते हुए असीम को ऐसा ज़रुर लगा होगा कि लोग ज़्यादा आकर्षित होंगे. देशद्रोह का मुक्कदमा उनपर दायर किया जाएगा और उनकी ग़िरफ्तारी होगी ऐसी कल्पना तो कम से कम उन्होंने भी नहीं की होगी. दरअसल देशद्रोह के मुक्कदमे ने उन्हें बहस के केंद्र में लाने का काम किया है. और अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने की हिम्मत ने उन्हें लोकप्रियता दी है. कुछ स्टंटबाजों की आड़ लेकर अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने वाले लोगों को स्टंटबाज कहने की जो परंपरा विकसित हो रही है; वह ग़लत है. किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले गहराई से विश्लेषण करना आवश्यक है.

Tuesday, September 11, 2012

असीम त्रिवेदी तो कलानुवादक भर हैं : एक छोटी सी टिप्पणी

साभार :indiatoday.intoday.in*
असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी और उनके कार्टून को लेकर कुछ ग़ैरजिम्मेदार बौद्धिक बहसों से गुजरते हुए लगा कि राष्ट्रीय प्रतीक पता नहीं किस लोक से उतार कर भू -लोक के भारतवासियों से इंट्रोड्यूस कराये गए हैं . प्रतीकों की श्रेष्ठता जीवन से ज्यादा दिखने लगे; और आलोचक व मीडिया उसकी व्याख्या इसी तरह करने लगे तो समझना चाहिए कि दुर्दिन आ गए हैं !
तय है कि ये प्रतीक हमारी भावनाओं के प्रतिनिधि के तौर पर निर्मित किये गए होंगे. लेकिन जब भावनाएं लगातार आहत हो रही हों; तब प्रतीकों के क्या मायने रह जाते हैं!! रघुवीर सहाय ने अपनी कविता अधिनायक में लिखा है :
राष्ट्र गीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है / फटा सुथन्ना पहने जिसके गुन हरचरना गाता है !!
नागार्जुन ने तो राष्ट्रपिता गाँधी को भी नहीं छोड़ा : बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !!
अब इन दोनों काव्यांशों की कल्पना कार्टून के रूप में करें तो असीम आपको कहीं से अराजक नहीं लगेंगे. किसी को रघुवीर और नागार्जुन ही अराजक लगते हों; फिर कोई बहस ही बेकार है !!
असीम के कार्टून को मैं अलग नज़रिये से समझता हूँ. यह प्रतीकों में निहित मूल भावना और वर्तमान परिदृश्य के कंट्रास्ट को दिखाता है . वर्तमान का प्रतीक यही हो सकता है . असीम ने कलानुवाद भर किया है ; कृतिकारों को तो हम सब बखूबी पहचानते हैं !!


[*असीम त्रिवेदी का विवादास्पद कार्टून जिसकी वज़ह से उन्हें 9 सितम्बर 2012 को गिरफ़्तार किया गया था।]

Sunday, September 2, 2012

दिल्ली विश्वविद्यालय में सुरक्षा और लोकतंत्र का संकट

फैकल्टी आफ आर्ट्स, दिल्ली विश्वविद्यालय
साभार:
www.indiaafricaconnect.in
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव चौदह सितम्बर को होना है. इसी सिलसिले में शुक्रवार;31-08-2012 को विश्विद्यालय के उत्तरी परिसर में छात्र संगठन एनएसयूआई ने एक रैली का आयोजन किया था. कई बसों में भरकर स्कूली लड़के और आवारा क़िस्म के युवाओं को जमा किया गया था. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ देर केलिए कैम्पस में आतंक का माहौल पसर गया था. इन लोगों ने जम कर हंगामा किया. आते जाते छात्रों से बदतमीजी और छात्राओं को प्रताड़ित करने की बहुत सारी घटनाएँ सामने आयीं लेकिन पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहा. एनएसयूआई व इसी की तरह विचारहीनता के शिकार कुछ अन्य छात्र संगठनों द्वारा अराजकता का ऐसा प्रदर्शन इस विश्वविद्यालय केलिए कोई नया अनुभव नहीं है. विश्वविद्यालय प्रशासन से इन्हें शह मिलता रहा है; यह भी किसी से छुपा हुआ नहीं है.
अधिक चिंताजनक एक और विषय इसी घटना की आड़ में पैदा हुआ है. दिखावे में माहिर विश्वविद्यालय के उपकुलपति दिनेश सिंह की पहल पर शनिवार; 01-09-2012 को छात्रो-अविभावकों का उनके साथ सवाल-ज़वाब का एक कार्यक्रम विश्वविद्यालय रग्बी ग्राउंड में रखा गया था. उनके उत्साह का रंग-भंग तब हुआ जब इन्द्रप्रस्थ कॉलेज की एक छात्रा ने एनएसयूआई की उक्त रैली का ज़िक्र करते हुए; अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की पीड़ा सुनाई और विश्वविद्यालय प्रशासन से कैम्पस के असुरक्षित माहौल को लेकर सवाल किये. इस मुद्दे पर  उपकुलपति को काफ़ी फजीहत झेलनी पडी. घिर चुके उपकुलपति ने जल्दी ही कोई ठोस कदम उठाने का आश्वासन दिया. शाम के छः बजे तक मीडिया के ज़रिये यह खबर आने लगी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कैम्पस में किसी भी तरह की रैलियों और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी है.*
अब विचारणीय यह है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उठाया गया यह कदम न्यायोचित है? प्रशासन ने आनन-फानन में अपने नाकारेपन को ढांपने की असफल कोशिश की है या इसमें उसका कोई निहित उद्देश्य है?
विश्वविद्यालय परिसर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. छात्रसंघ चुनाव के दौर में विश्वविद्यालय प्रशासन रैलियों और प्रदर्शनों की वीडिओग्राफी भी करवाता है. वीडिओ फुटेज के सहारे दोषी लड़कों को चिह्नित किया जा सकता है. उन पर कानूनी कारवाई की जा सकती है. मौके पर मौज़ूद मूकदर्शक बने पुलिसकर्मियों पर शिकंजा कसा जा सकता है. भीड़ की अगुआई करने वाले छात्र नेताओं को दण्डित किया जा सकता है. यहाँ तक कि उनमे से छात्रसंघ चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को नामांकन तक से रोका जा सकता है. ऐसा करके अराजक तत्वों को एक कड़ा सन्देश दिया जा सकता है. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है.
पिछले कुछ दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन का रबैया घोर अलोकतांत्रिक रहा है. जिसतरह उपकुलपति और उनकी टीम के उनके विश्वस्त मनमाने ढंग से फैसले ले रहे हैं; शिक्षकों-छात्रों में भारी रोष है. ऐसे में विरोध के स्वर लगातार मुखर हो रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन इन विरोधी स्वरों को दवाने का लगातार प्रयास कर रहा है. कुछ हालिया उदाहरण हमारे सामने हैं. जबकि सेमेस्टर प्रणाली को भारी विरोध के बावजूद लागू करवाने और अब उसकी खामियों के लगातार सामने आने की बात ज्वलंत ही है; कुछ दिनों पहले मेटा यूनिवर्सिटी कांसेप्ट को आपात बैठक के माध्यम से स्वीकृत करवाने के बाद इसे मीडिया के माध्यम से प्रसारित कर दिया गया. विश्वविद्यालय के शिक्षकों-छात्रों को इस मामले विल्कुल विश्वास में नहीं लिया गया.** प्रगतिशील तबके में यह कांसेप्ट संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है. इसे सरकारी युनिवर्सिटियों में प्राइवेट युनिवर्सिटियों की बैकडोर एंट्री की पूर्वपीठिका माना जा रहा है. बीते 24 अगस्त को शिक्षकों छात्रों का एक समूह इस मामले में अपनी आपत्ति दर्ज कराने उपकुलपति कार्यालय के नजदीक पहुंचना चाहता था . कथित तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार ऐसे किसी दल को पुलिस बैरिकेड लगाकर रोका गया.*** प्रशासन से विरोध जताने केलिए 28 अगस्त को हुए शिक्षकों के हड़ताल से भी फासिस्ट तरीके से निपटा गया.**** यहाँ तक कि उन शिक्षकों-छात्रों को चिह्नित कर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर धमकाए जाने का मामला भी प्रकाश में आया है; जो प्रशासन की तानाशाही के विरोध में किये गए प्रदर्शनों का हिस्सा रहे हैं. लेकिन इसी दौर में एनएसयूआई और एबीवीपी जैसे संगठनों को रैलियों प्रदर्शनों की खुली छूट दी गयी थी. 31 अगस्त को कैम्पस में इसी का एक नजारा दिखा था. ऐसे में प्रशासन की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है. जिस तरह से उपकुलपति दिल्ली विश्वविद्यालय को बाजारीकरण और अपने उटपटाँग प्रयोगों का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं; प्रगतिशील ताक़तों के द्वारा उनके विरोधों के तीव्रतम होते जाने की आशंका उन्हें भी है. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि प्रशासन की निगाहें कही और हैं और निशाना कहीं और लगाया गया है. विरोध प्रदर्शनों की संस्कृति को नष्ट कर; प्रशासन अपने नापाक इरादों के रास्ते के सारे अवरोध हँटा देना चाहता है. बीते कई सालों का अनुभव कहता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को अराजक रैलियों से कोई परेशानी नहीं है. परेशानी होती तो यह परंपरा अब तक फलती फूलती नहीं. प्रशासन को दिक्कत है; तो उन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से है; जो मुद्दों के आधार पर प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं.
प्रशासन के इस अप्रत्यक्ष आपातकाल का विरोध नहीं होगा; यह भ्रम प्रशासन को भी नहीं होगा. संभवतः ऐसी स्थिति से निपटने के फासिस्ट तरीक़ों की तैयारी को भी अंतिम रूप दिया जा चुका होगा. बहरहाल रग्बी ग्राउंड में इन्द्रप्रस्थ कालेज की छात्रा द्वारा उपकुलपति को सुनाई गयी कटु आपबीती विश्वविद्यालय की किसी भी छात्रा द्वारा सुनाई जाने वाली इस तरह की अंतिम आपबीती हो; हम यह कामना भर कर सकते हैं. कैम्पस में असुरक्षा को लेकर उठाये गए उसके सवालों को हल करने की ग़ैरईमानदार और ग़ैरज़िम्मेदाराना कोशिश को तो बेनक़ाब होना ही है.



साभार साक्ष्य :

    *http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Delhi-University-bans-rallies-after-molestation/articleshow/16163636.cms
  **http://www.deccanherald.com/content/265437/duta-opposes-vcs-meta-varsity.html
 ***http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/tp-newdelhi/article3819243.ece   ****http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/tp-newdelhi/article3825938.ece