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Wednesday, December 13, 2017

**********मुक्तिप्रसंग का लोकतंत्र**********

राजकमल चौधरी [साभार : मैथिलीजिन्दाबाद.कॉम]
  मुक्तिप्रसंग का लोकतंत्र* 
(राजकमल चौधरी की कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ का एक पाठ)

        मुक्तिप्रसंग’ के पाठकों के पास एक सुविधा यह है कि इसकी रचना अवधि के दौरान कवि राजकमल चौधरी की बाह्य परिस्थितियों और मनोजगत को समझने में मदद करने वाली सामग्रियाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं । यह कविता फरवरी 1966 से जुलाई 1966 तक की अवधि में लिखी गयी थी । उन दिनों राजकमल चौधरी पटना अस्पताल के राजेन्द्र सर्जिकल वार्ड में भर्ती थे । फरवरी के अंतिम दिनों में असह्यनीय पेट दर्द और तीव्र मुत्रावरोध की शिकायत के बाद उन्हें यहाँ लाया गया था । शुरू में कैंसर की आशंका व्यक्त की गयी थी । बाद के मेडिकल जाँच रिपोर्टों के आधार पर कैंसर की तो नहीं, लेकिन, मैलिग्नेट लिम्फो सर्कोमो नामक जिस बीमारी की आशंका व्यक्त की गयी थी, वह भी जानलेवा थी । सर्जिकल ऑपरेशन ही एक मात्र निदान था ।[1] राजकमल का घोर असुरक्षाबोध से भर जाना स्वाभाविक था । मृत्यु की आशंका ने मन को बहुत अशांत कर दिया था । तब उनकी उम्र तकरीबन साढ़े छत्तीस वर्ष थी । मार्गदर्शन की उम्मीद में उन्होंने अस्पताल से ही वात्स्यायन जी को एक पत्र लिखा था । अस्पताल में ही उन्हें अपने पत्र का उत्तर भी मिला । 25 मार्च 1966 को लिखे गये वात्स्यायन जी के आत्मीय पत्र का एक अंश इस तरह था- स्वीकार के बाद मृत्यु को हटाकर एक ओर रख दिया जा सकता है, और यही मैं आपसे कहना चाहता हूँ । यह स्वीकार हराता नहीं जीने का बल भी देता है । [2] पत्र में लिखी बातों को पढ़कर राजकमल का मन दृढ़ अवश्य हुआ था, लेकिन जीने की उत्कट इच्छा, मृत्यु की आशंका, भयावह पीड़ा और मृत्यु को स्वीकार कर उसे अलग रख देने के प्रयास का आपसी तनाव उन्हें बहुत बेचैन किये रहता था । 11.04.66 को मैथिली के साहित्यकार जीवकान्त को सम्बोधित एक पत्र में उन्होंने लिखा- रोग बहुत कठिन बहुत कष्टकर है । लेकिन जीना है । [3] कभी असह्य पीड़ा के क्षणों में वे अपनी डायरी में लिखते- ‘Please stop the world. I want to get off from this earth” [4]
इन कुछ प्रसंगों से गुजरकर यह समझा जा सकता है कि मुक्तिप्रसंग बेहद असामान्य मनःस्थिति में लिखी गयी कविता है । इसकी भूमिका में राजकमल ने लिखा है – मुक्तिप्रसंग मेरा वर्तमान है ।” और यह भी लिखा है कि - जिजीविषा और मुमुक्षा-इस कविता के मूलगत कारण हैं । [5]
इस कविता की शुरूआत आत्मालाप से होती है, जिसमें जिजीविषा और मृत्यु की प्रबल आशंका के द्वन्द्व से निर्मित बिम्बों की प्रचूरता है – ‘दोनों आँखों की ज्वालामुखी पिघल जाने के उपरांत / मैं उसकी बाँहों में / यूनिसेफ-एंबुलेंस की दुर्गति / मेरे नशे में डूबी हुई / मैं ही प्राप्त करूँगा / इस नगरवधू को महाश्मशान बनाने का श्रेय / मेरे ही रक्त के शंख चक्र सामुद्रिक स्वाद में / जलते हुए नाम मेरे होठ दुहराते हैं / वही एक शब्द बार-बार / बीजमंत्र  वही एक कामतंत्र / छत से पलंग तक झूलती हुई रस्सी का फंदा और सर्जिकल अस्पताल तक की स्वप्न यात्रा में कहता है उपाध्याय / कुछ नहीं होगा तुम्हें / वैसा जो नहीं हुआ है अब तक मर्मांतक / किंतु मेरा चेहरा मेरी गर्दन मेरे कंधे काले पत्थर की अपनी बाँहों में समेट कर वह मुस्कुराती है / वही होगा वही होगा / रोक लिया गया था अब तक जिसे विपरीत ऋतुओं और मांगलिक नक्षत्रों के कारण..[6]
इस कविता की भूमिका में राजकमल ने वात्स्यायन जी के पत्र का संदर्भ लेते हुए लिखा है – “मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है । इस वर्ष फरवरी से जुलाई तक प्रत्येक शनिवार को ऑपरेशन थियेटर के सफेद टेबुल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है । मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को अपने अहं से मुक्त किया जा सकता है ।”[7] स्वयं को अहं से मुक्त किये जा सकने का अनुभव संभवतः इस कविता में भी उनके आत्म की परिधि से बाहर आने में सहायक रहा होगा । आत्ममुक्ति की चिंता के साथ शुरू हुई कविता मुक्तिप्रसंग धीरे-धीरे दुनियाभर की मुक्तिकामी आकांक्षाओं से अपना सम्बंध स्थापित कर लेती है । कविता अपने समय के कई अनुत्तरित प्रश्नों से जूझने लगती है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से एक जिम्मेदार दुनिया की उम्मीद जगी थी । धीरे धीरे यह छलावा साबित होने लगी । संयुक्त राष्ट्र संघ कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों की कठपुतली बन कर रह गया । दुनिया भर में जनता ने लोकतंत्र के भरोसे जो सपने देखे थे, वे टूटने लगे । भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और अस्वास्थ्य से जूझ रही जनता के लिए हथियारों और बारूद के ढेर जमा किये जा रहे थे । ‘मुक्तिप्रसंग’ में यह सब दर्ज हुआ है दैनिक समाचार पत्रों में वियतनाम हिंदेशिया कांगो रोडेशिया / अपने देश में एटम बम बनेगा नहीं बनेगा ।
सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र, अन्य राष्ट्रों के शोषण के नये-नये तरीके इजाद कर उन्हें लगातार आजमा रहे  थे । राष्ट्रों की प्रभुता और अखंडता के नाम पर क्रूरतापूर्वक दमन का दौर भी जारी था । साठ के दशक तक हमारे देश के सोचने समझने वाले युवाओं के सामने भी यह स्पष्ट होने लगा था, कि लोकतांत्रिक युग के नाम पर दुनिया भर में फरेब चल रहा है । स्वाभाविक रूप से इन युवाओं की भी लोकतंत्र से बहुत उम्मीदें रही होंगी । लोकतंत्र के प्रति मोह और मोहभंग के संक्रमण काल में वे भी कई अनसुलझे सवालों में उलझे रहे होंगे । राजकमल भी ऐसे कई सवालों से जूझ रहे थे - आदमी क्यों पार करता है युद्ध?/ क्यों वर्लिन की दीवार?/ क्यों देश प्रेम?/ क्यों ताशकंद?/ क्यों दास कैपिटल?/ क्यों सेगाँव की बौद्ध भिक्षुणियाँ जल मरती हैं?/ क्यों कश्मीर के लिए सेनाएँ?/ क्यों एक ही युद्ध मेरी कमर की हड्डियों और कभी-कभी वियतनाम में होता है?
          कथित लोकतांत्रिक दुनिया के ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न, ‘लोकतंत्र” के प्रति बेहद नकारात्मक धारणाओं को निर्मित करने वाले होते हैं । नवंबर, 1965 में ज्योत्सना में छपे राजकमल के एक लेख  एक कवि का निजी वक्तव्य का यह अंश ऐसी ही एक धारणा को प्रकट करता है – जनतंत्र के युग में सारी बातें और सारी हालतें सोई रहेंगी । यों, कभी-कभी दिल बहलाव के लिए कोई नाच-गान पेश होगा, कोई कविता लिखी जाएगी, पुरस्कार दिए जाएँगे, नकली प्रतियोगिताएँ होंगी, शीशे के रंगीन टुकड़े हीरों से ज्यादा कीमती जचेंगे, कोई अफसर नौकरी छोड़कर योगाश्रम खोलेगा और अखबार निकलते रहेंगे । यह सारा कुछ सिर्फ मनोरंजन और सिर्फ जनताशाही के नाम पर होगा ।[8]
जब मुक्तिप्रसंग की रचना की जा रही थी, तब देश को आजाद हुए अठारह वर्ष से अधिक बीत चुके थे । देश की बड़ी आबादी आजादी और लोकतंत्र को हाँसिल करने की खुशफहमी में जी रही थी । इस स्थिति का फायदा उठाकर सामंती व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की राजनीतिक साजिश अपनी कामयाबी के नित नये कीर्तिमान गढ़ रही थी । राजाओं के वंशज, जमींदार, बड़े व्यापारी और ऊँची जातियों के लोग सांसद, विधायक, मंत्री बनकर लोकतंत्र का अपने चरित्र और अपनी सुविधा के अनुसार दोहन कर रहे थे । अफसरों ने अंगरेजी नौकरशाही की परंपरा और प्रवृत्ति से अपने आप को मुक्त नहीं होने दिया था । देश की जनता के हित में नीतियों और योजनाओं को तैयार करने के दावे खोखले साबित हो रहे थे । भ्रष्टाचार ने देश को तबाह करना शुरू कर दिया था । संविधान में प्रस्तावित संकल्प दम तोड़ने लगा था । देश का बड़ा हिस्सा बदहाल था । ऑपरेशन टेबल पर लेटे हुए कवि की देह और मन की पीड़ा देश की असह्य पीड़ा से जुड़कर इस तरह व्यक्त हुई है -  लेकिन मेरा देश मेरा पेट मेरा ब्लाडर / मेरी अंतड़ियाँ खुलने से पहले / सर्जनों को यह जान लेना होगा / हर जगह नहीं है जल अथवा रक्त / अथवा मांस अथवा मिट्टी / केवल हवा कीड़े जख्म और गन्दे पनाले हैं / अधिक स्थानों पर इस देश में/ जहाँ सड़कर फट गयी हैं नसें / वहाँ हवा तक नहीं/ ऊपर की त्वचा चीरने पर आग नहीं निकलेगी न ही धुआँ / जठराग्नि..दावानल.. / सब बुझ गए अचानक पहले पन्द्रह अगस्त की पहली रात के बाद / अब राख ही राख बच गया है पीला मावाद
          जब जनता में यह भ्रम हो कि देश में उनका अपना शासन है, तब उनका प्रतिरोधी स्वभाव बहुत कमजोर हो जाता है, शायद इसीलिए राजकमल अपने समय के लोकतंत्र की पहचान एक सम्मोहिनी राजनीतिक व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में नहीं कर पा रहे थे । लोकतंत्र के प्रति उनकी निराशा बृहत्तर थी । लोकतंत्र के प्रति उनकी अनास्था ‘मुक्तिप्रसंग’ में बहुत मुखर होकर दर्ज हुई हैं – आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियाँ / केवल पेट के बल उसे झुका देती हैं / धीरे-धीरे अपाहिज / धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए / उसे शिष्ट राजभक्त देशप्रेमी नागरिक बना लेती है ।
लहर के मार्च 1961 अंक में राजकमल चौधरी का एक लेख छपा था – कबिरा खड़ा बजार में । इस लेख में उन्होंने अपनी पसंदीदा उपन्यासकार आइन रैण्ड के 1957 में प्रकाशित उपन्यास ‘एटलस श्रग्ड’ (Atlas Shrugged) के कुछ पात्रों की चर्चा की है । आन्द्रे और रोआर्क की प्रकृति का उल्लेख करने के बाद, इन दोनें पात्रों से एक अन्य पात्र जॉन गाल्ट की प्रकृति की तुलना करते हुए उन्होंने लिखा है – जॉन गाल्ट आत्महत्या नहीं करता, डिनामाइट नहीं लगाता, वह सिर्फ़ अलग हो जाता है, वह नासमझ लोगों की नासमझ दुनिया से अलग हो जाता है ।[9]
‘मुक्तिप्रसंग’ में भी कवि ने लोकतंत्री संसार से अलग हो जाने की प्रस्तावना रखी है -आदमी को इस लोकतंत्री संसार से अलग हो जाना चाहिए / चले जाना चाहिए कस्साबों गांजाखोर साधुओं / भीखमंगों अफीमची रंडियों की काली दुनिया में / मसानों में / अधजली लाशें नोचकर खाना श्रेयस्कर है / जीवित पड़ोसियों को खा जाने से” उन्हें लोकतंत्र के नाम पर चल रहे मानवता के विध्वंश की बहुत खतरनाक साजिश से अलग हो जाना अनिवार्य लगता है - “हम लोगों को अब शामिल नहीं रहना है / इस धरती से आदमी को / हमेशा के लिए ख़त्म कर देने की साजिश में ।”
लोकतंत्र का आवरण ओढ़कर पसर रही विकृतियां भयावह थीं । इतनी भयावह कि मुक्तिप्रसंग’ का कवि इस लोकतंत्री संसार से उलग होकर अराजक गाँजाखोरों, साधुओं, भीखमंगों, अफीमचियों आदि की दुनिया को चुन लेना बेहतर समझता है । यह निर्विवाद है कि देश में पनप रहे असंतोष, उग्रवाद और अलगाववाद आदि के लिए लोकतांत्रिक विकृतियाँ बड़ी जिम्मेदार रही हैं । इसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि लोकतंत्र की विकृतियों से जन्मी अनास्था ही कालांतर में ‘नक्सलबाड़ी’ जैसे आंदोलनों के अस्तित्व में आने का बड़ा कारण बनी ।
यह विचारणीय है कि ‘मुक्तिप्रसंग’ और राजकमल के अन्यत्र लेखन में लोकतंत्र के प्रति जो अनास्था,आक्रोश और रोष व्यक्त हुआ है, क्या वह लोकतंत्र के प्रति उनकी अनंतिम धारणा को प्रकट करता है? क्या राजकमल लोकतंत्र की व्यवस्था को खारिज करते हैं, अथवा ऐसा प्रकट करने वाली उनकी अभिव्यक्तियाँ गहन अंतःपाठ की मांग करती हैं?
‘लहर’ के जुलाई, 1962 अंक में छपे उनके एक लेख – ‘बर्फ और सफ़ेद कब्र पर एक फूल’ में वे बेहतर राजनीतिक व्यवस्था की संभानाओं को खोजने की चेष्टा करते हुए दिखाई देते हैं– “सोचता रहता हूँ कि क्या उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद या कम्युनिज्म के अलावा कोई तीसरा रास्ता नहीं है?”[10] राजकमल का जुड़ाव अमेरिका की बीट पीढ़ी से भी था, जिसकी मान्यता थी कि व्यक्तिगत स्वाधीनता सर्वोपरि है । संभव है कि अपनी मनोरचना के कारण वे साम्यवाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतिकूल समझते हों । उस दौर में राममनोहर लोहिया जैसे प्रखर राजनितिक चिन्तक भी कांग्रेस विरोध के साथ ही साम्यवाद की खामियों को भी देश के सामने लाने का प्रयास कर रहे थे । लेकिन राजकमल देश के भीतर विकसित हो रहे ‘समाजवादी धाराके सच को भी पहचान रहे थे । वे जनसंघी चरित्र और उसके खतरे से भी भली-भांति परिचित थे । अप्रैल-जून-1967 के ‘आलोचना’ में छपे अपने एक लेख- ‘अप्रत्याशित कुछ भी नहीं’ में उन्होंने लिखा है- कांग्रेस शासन के देशव्यापी विरोध, जनमत के अर्ध विक्षिप्त अनिर्णय और नयी विकल्प प्रियता के कारण देश के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी (और परस्पर विरोधी) दलों की संयुक्त सरकारें बनी हैं । इन सरकारों में अधिक बुद्धिमान, अधिक स्वार्थहीन, अधिक ईमानदार व्यक्ति अवश्य शामिल हुए हैं, लेकिन इन सरकारों में जनसंघ, स्वतंत्र, प्रसोपा, मुस्लिम लीग, जनक्रांति दल जैसी प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी पार्टियां भी शामिल हैं । इसलिए कुल मिलाकर ये पीढियां भी कांग्रेस के अपने दक्षिणपंथ और वामपंथ की मिली-जुली भाव भगत की सरकार से अधिक पराक्रमी, और अधिक क्रांतिकारी और अधिक समाजवादी सरकारें नहीं बन पाएंगे ।”[11]
‘मुक्तिप्रसंग’ का कवि विकल्पहीनता और अनास्था को अपना स्थाई भाव बना लेने के पक्ष में नहीं   है । इसलिए अपने पलायन की इच्छा को वह स्थगित करता है और अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की अपनी रचनात्मक आस्था की ओर लौटता है – “वह पागल मरी हुई आतंकित अनगढ़ स्त्री चिपकाऊंगा / अपने ओंठों पर उसके ओंठों में / अपने शब्द / वाक्य / भाषाएँ / अपने मुहावरों से उसकी बंजर धरती नहलाऊंगा ।” कवि यह सब उस स्त्री के लिए कहता है जो – “ग्यारह बजकर उनसठ मिनट पर / हर रात शहीद-स्मारक के नीचे नंगी होती है / पागल काली मरी हुई एक स्त्री / उजाड़ आसमान में बाहें फैलाकर रोने के लिए / रोते हुए सो जाने के लिए पानी और अनाज के देवताओं से भीख मांगती है / तिरंगा फहराने के अपराध में मार डाले गए / 1942 के छात्रों के नाम पर” । ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्त्री भारत की जनता की जनतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक है, जिन्हें कवि स्वर देने का संकल्प लेता है ।
राजकमल चौधरी ने विधिवत रूप से 1960 में लिखना शुरू किया था और 1967 में साढ़े सैंतीस वर्ष की उम्र में उनका देहान्त हो गया था । यह कहना उचित होगा कि उनके लेखन की अल्पावधि उनके सृजन ही नहीं, उनके निर्माण के भी वर्ष थे । संभवत: इसलिए परस्पर विरोधाभासी बातों से उनका साहित्य भरा हुआ है । व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व के द्वंद्व ने भी उन्हें पर्याप्त मथा  है ।
फरवरी 1967 के आम चुनावों के बाद ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख – ‘अप्रत्याशित कुछ नहीं’ में उन्होंने यह भी लिखा है- “मैं राजकमल चौधरी अपनी तरफ से जनता के पास चले जाने का वादा करता हूँ, मेरी सही यात्रा यहीं से शुरू होगी ।”[12] ऐसा प्रतीत होता है कि राजकमल अपने लिए उचित प्रस्थान बिंदु और दिशा तय कर चुके थे ।  इसी दौर में राजकमल राजनितिक रूप से भी अपने चिंतन में स्पष्ट होने लगे थे । इसी लेख में उन्होंने लिखा है - “जब तक देश की अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था में आमूल, सम्पूर्ण और क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं होगा – हमारा देश और हमारे देश का मनुष्य लोक सेवाओं और लोक सभाओं में अपना सही प्रतिनिधि भेजने के लिए स्वाधीन नहीं है ।”[13] राजकमल का जनता के पास लौटने का संकल्प 19 जून 1967 को हुई उनकी मृत्यु के साथ ही अधूरा रह  गया ।
‘मुक्तिप्रसंग’ का पुनर्पाठ करते हुए हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह कविता लोकतंत्र के प्रति जिस अनास्था को अभिव्यक्त करती है, वह किन परिस्थितियों में निर्मित हुई थी । ‘लोकतंत्री’ संसार से अलग हो जाने की बात कितनी अधिक पीड़ा के साथ कही गयी होगी । इस बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करना बहुत आवश्यक है, कि कवि जिस लोकतंत्री संसार से अलग होने की बात करता है, वह लोकतंत्री संसार, वास्तविक लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित ही नहीं है ! यह समझना भी आवश्यक है कि राजकमल की जो अनास्था प्रकट हुई है, वह लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था के छले जाने से निर्मित हुई है ।
दरअसल ‘मुक्तिप्रसंग’ का स्वर लोकतंत्र के जरुरी मूल्यों के प्रति आग्रही है । यह कविता लोकतंत्र की वास्तविक भावना को परे रख कर चलने वाले लोकतंत्र को स्वीकार करने से साफ इंकार करती है । अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब मांगती है । लोकतंत्र के नाम पर चल रही साज़िशों के प्रति सावधान करती है । यह कविता लोकतंत्र को नहीं लोकतंत्र के नाम पर परोसे जाने वाले अलोकतंत्र को खारिज करती है । यह कविता अपने निहित आशय में यही व्यंजित करती है कि अनास्था के लोकतंत्र का एकमात्र विकल्प है- सही लोकतंत्र ।
‘मुक्तिप्रसंग’ को लिखे हुए पांच दशक बीत चुके हैं । राजकमल के उठाये गए सवाल अब भी ज्यों के त्यों हैं, बल्कि अधिक तीखे हो गये हैं । कुछ सन्दर्भों में स्थान काल पात्र ज़रूर बदल गए हैं । लोकतंत्री संसार आज भी वास्तविक लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना ही चलती है । देश दुनिया की परिस्थितियाँ कमोवेश वैसी ही है । कश्मीर में मानवाधिकारों का क्रूरतापूर्वक हनन आज भी हो रहा है । इस ‘लोकतांत्रिक देश के कुछ हिस्सों में भारी विरोध के बावजूद आफसफा जैसे नागरिक अधिकारों के क्रूर दमन में सहायक कानून लागू हैं । आदिवासियों को जंगल से बेदखल किया जा रहा है, और किसानों से उनकी ज़मीने छीनी जा रही हैं । मानव विकास की अपेक्षा युद्धोन्माद अधिक महत्वपूर्ण बना हुआ है । दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध छिड़े हुए हैं । अमेरिका जैसे कई शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर राष्ट्रों का बल और छलबलपूर्वक शोषण कर रहे हैं । कई मजबूत देश, कमजोर देशों को अपने निशाने पर लेकर इन्हें तबाह करने पर तुले हुए हैं । जनता के चुने हुए प्रतिनिधि राजाओं की तरह पेश आते हैं । इत्यादि ।
ऐसे मुद्दों की एक असमाप्त श्रृंखला है । यह और भी दुखद है कि परिस्थितियाँ पहले से अधिक भयावह हुई हैं, और इसके और भी अधिक भयावह होते जाने की आशंका है । जरूरी है कि पुनर्पाठ के क्रम में हम राजकमल की अनास्था से गुज़रते हुए वास्तविक लोकतंत्र को हाँसिल करने की चुनौतियों से निपटने की युक्तियों पर विचार करें, और उसे व्यवहार में लाने का प्रयास करें । ‘मुक्तिप्रसंग’ में निहित ‘लोकतंत्र की आकांक्षा’ की दिशा में यही हमारा प्रस्थान बिंदु हो सकता है ।


[1] इन सूचनाओं के स्रोत के लिए देखिए : राजकमल चौधरी का सफर (पहल पुस्तिका), पृष्ठ : 34-35
[2] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-7
[3] देखिए : राजकमल चौधरी का सफर (पहल पुस्तिका), पृष्ठ : 35
[4] राजकमल चौधरी रचनावली, खंड-8, पृष्ठ : 285
[5] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-8
[6] इस लेख में उद्धृत कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ के सभी पद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तिका- ‘मुक्तिप्रसंग (द्वितीय सं.-2006) से लिये गये हैं ।
[7] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-8
[8] देखिए : देखिए : राजकमल चौधरी रचनावली, खंड-7, पृष्ठ : 133
[9] देखिए : वही, पृष्ठ : 335
[10] देखिए : वही, पृष्ठ : 349
[11] देखिए : वही, पृष्ठ : 389
[12] देखिए : वही, पृष्ठ : 390
[13] देखिए : वही, पृष्ठ : 389
 सन्दर्भ विवरण
1. राजकमल चौधरी : मुक्तिप्रसंग : द्वितीय संकलन-2006 : वाणी प्रकाशन, दिल्ली-2
2. सुभाष चन्द्र यादव : राजकमल चौधरी का सफ़र (पहल पुस्तिका) : अक्टूबर, 1998 : जबलपुर-4
3. संपादक- देवीशंकर नवीन : राजकमल चौधरी रचनावली खंड-7 व खंड-8 : प्रथम संस्करण-2015 : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली-2
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[*‘बया’ (संपादक : गौरीनाथ) के जुलाई-दिसंबर,2017 अंक (पृ.14-16) में प्रकाशित] 

Tuesday, July 25, 2017

‘वागर्थ’ के एकांत

फेसबुक पर पिछले दिनों मेरी नज़र कुछ ऐसे पोस्ट और प्रतिक्रियायों पर गयीजिसमें प्रो. शंभुनाथ के भारतीय भाषा परिषदकलकत्ता के निदेशक और 'वागर्थके संपादक चुने जाने पर हर्ष प्रकट किया गया था । इस तरह का आशय और विश्वास व्यक्त करते हुए लोगों ने आदरणीय गुरूजी को बधाई पेश की थी कि 'वागर्थके दिन तो अब अच्छे होंगेअब तक 'वागर्थपतनशीलता के रास्ते पर था! 
'वागर्थका क्या होगाऔर भारतीय भाषा परिषद का क्या हो रहा हैयह तो वे लोग अच्छे से बताएँगे जो बिना किसी जान-पहचान के एक लेखक की हैसियत से यहाँ अपनी रचनाएँ भेजते हैं! मैं सिर्फ यह कहना चाहूँगा कि एक प्रोफेसर संपादक को प्रसन्न करने के लिए पूर्व के किसी रचनाकार संपादक से श्रेय छीनने का प्रयास करना, महज एक दृष्टिकोण नहीं हैबेइमानी है, बेहयायी है, और हद दर्ज़े की धूर्तता भी है ।

वागर्थके एकांत
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एकांत श्रीवास्तव

2007 में 'वागर्थ' ने एक कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया था । संभवतः यह प्रतियोगिता 35 वर्ष तक के कवियों के लिए आयोजित की गयी थी । इस प्रतियोगिता में बहुत उत्साह के साथ मैंने भी दो कविताएँ भेजी थी । तब मैं बी.ए. में एड्मीशन के उद्देश्य से दिल्ली आया हुआ था । मुझे याद है कि किंग्सवे कैंप के एक साइबर कैफे वाले को 20 या 25 रुपये प्रति पृष्ठ की दर से देकर, दो पृष्ठों में इन कविताओं को कम्पोज करवाया था । इस प्रतियोगिता में कोई पुरस्कार तो नहीं मिला, लेकिन 'वागर्थ' के नवंबर-2007 अंक में अपनी दोनों कविताओं के प्रकाशित होने की सूचना एक परिचित के माध्यम से मिली । यह मेरे लिए अप्रत्याशित खुशी की बात थी !
हुआ यह था कि तब के संपादक एकांत श्रीवास्तव ने पुरस्कृत कविताओं के साथ, प्रतियोगिता के लिए आयी अधिकांश नव लेखकों की कविताओं और कुछ अन्य युवाओं की कविताओं को शामिल कर इस अंक को नवलेखन कविता अंकका रूप दे दिया था ! इस अंक में न सिर्फ कविताएँ छापी गयी थीं बल्कि एकांत जी ने अपने संपादकीय में लगभग सभी कविताओं पर संक्षिप्त ही सही टिप्पणी भी की थी । पहली बार मेरी कविताएँ किसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । इस प्रकाशन से और मिल रही छिटपुट प्रतिक्रियायों से मेरा मनोबल काफी बढ़ा था । निश्चित रूप से ऐसा कई अन्य नव लेखकों के साथ भी हुआ होगा । उस अंक में छपे कई कवि/कवयित्री आज भी सक्रिय हैं । उनकी अपनी एक पहचान है,और अच्छा लिख रहे हैं । नवलेखन कविता अंककी तर्ज पर ही संपादक ने अगला अंक नवलेखन कहानी अंकके रूप में प्रकाशित किया था । इस अंक ने भी निस्संदेह कई नव लेखकों का मनोबल बढ़ाने में अपना योगदान दिया होगा ।
एकांत जी के संपादन में ही वागर्थने जुलाई 2008 अंक को नवलेखन आलोचना पर केन्द्रित करने की घोषणा की थी और इसके लिए रचनाएँ आमंत्रित की थी । इसकी सूचना मुझे बाबूजी ने फ़ोन पर देते हुए ज़ोर देकर कहा था कि इस अंक के लिए मुझे एक लेख तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए । लेख तैयार करने का मन बना पाने में मुझसे देरी हुई । वे मेरे बी.ए. के शुरूआती दिन थे । लिखने-पढ़ने का उत्साह तो बहुत था, लेकिन तब मुझे संदर्भों का उल्लेख करने की पद्धति या आवश्यकता तक के विषय में कुछ पता नहीं था । समीक्षात्मक लेख लिखने का कोई अनुभव भी नहीं था । कुछ सम्बंधित किताबें पढ़कर और अपनी तब की समझ का जितना उपयोग कर सकता था, करके मैंने रेणु की कहानी पंचलाइटका एक पुनर्पाठ तैयार किया था । आलोचनात्मक तो क्या ही कहेंगे, उसे लेखक और उसकी रचना से प्रभावित होकर किया गया विश्लेषण और व्याख्या कहना उचित होगा ।
अपेक्षाकृत देर हो जाने के कारण मुझे संपादक को फ़ोन कर के पूछ लेना उचित लगा था । एकांत जी फ़ोन पर सहज उपलब्ध हो गये थे, और बहुत ही विनम्रता से उन्होंने बात की थी । नवलेखन कविता अंकमें मेरी छपी रचना का संदर्भ देने पर उन्होंने मुझे पहचान लिया और कहा कि आपकी कविता पर तो अच्छी प्रतिक्रियायें आ रही हैं ! मैंने उन्हें नवलेखन आलोचना अंक के लिए तैयार अपने पुनर्पाठ के बारे में बताया । उन्होंने कहा कि रेणु जी की कहानी पर तो एक पुनर्पाठ पहले ही स्वीकृत हो चुका है । मैंने उन्हें बताया कि बहुत मन से और मेहनत से यह लेख तैयार किया था ! वे शायद एक नव लेखक को मायूस नहीं करना चाहते थे, उन्होंने कहा कि अच्छा, आप भेज दीजिए । रेणु तो बड़े रचनाकार हैं, उन पर दो लेख भी आ सकते हैं । अब हिचक मेरी ओर से थी और वह यह थी कि रेणु की कहानी पर एक अच्छा पुनर्पाठ यदि पहले ही स्वीकृत हो चुका है, तो पता नहीं मेरा पुनर्पाठ स्तरहीन न लगे । मैंने उन्हें संकोच के साथ कहा कि ठीक है, भेज देता हूँ, लेकिन पता नहीं छपने लायक लिख पाया हूँ या नहीं! एकांत जी ने कहा कि- आप भेजिए, आपने मन से लिखा है, तो छपेगा ही ! उसी बात-चीत में उन्होंने मुझसे कहा कि- आप उसी क्लास में हैं, न जो बारहवीं के ठीक बाद आता है! एकांत जी की बातों से उस दिन मैं कितना अधिक प्रोत्साहित हुआ था, उसे ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर सकता । आज लगभग एक दशक बाद भी मैं उस प्रोत्साहन की सकारात्मकता को महसूस कर पाता हूँ । उस नवलेखन आलोचना अंकमें मेरे किये एक पुनर्पाठ सहित रेणु की दो कहानियों पर कुल दो पुनर्पाठ प्रकाशित हुए थे। इस प्रकाशन के बाद प्रोत्साहित करने वाली प्रतिक्रियायें भी मिलती रहीं, और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि इस प्रकाशन के बाद मेरा यह आत्मविश्वास विकसित हुआ कि मैं भी आलोचनात्मक लेखन कर सकता हूँ । इसी प्रकाशन के बाद मिली प्रतिक्रियायों से मुझे ऐसा लगा और मैने तय किया कि आलोचनात्मक लेखन दायित्वबोध के साथ करूँगा और छपने की जल्दबाजी नहीं करूँगा । मुझे लगता है कि मैं आज तक अपने इस संकल्प को निभा पाने में कामयाब रहा हूँ । 
इसके बाद मैंने वागर्थमें कभी कोई रचना प्रकाशनार्थ नहीं भेजी और एकांत जी से फिर कोई सम्पर्क भी नहीं रहा, लेकिन उनके संपादन में आने वाले बाद के अंक भी मैं देखता रहता था । उनके संपादन में प्रकाशित हुए अन्य गद्य विधाओं पर केन्द्रित नवलेखन अंक के माध्यम से भी कई नव लेखकों की प्रतिभाओं से परिचित होने का अवसर मिला था । वह भी एक संग्रहणीय अंक था । उनके संपादन में आने वाले सामान्य अंकों में भी युवा और ताजे चेहरे दिखते रहते थे । इन अंकों की एक खूबसूरती यह भी हुआ करती थी कि इनमें विचारों और प्रतिबद्धताओं की विविधता दिखाई देती थी ।
कुछ महीनों बाद पता चला कि एकांत जी की जगह विजय बहादुर सिंह ने ले ली है । कई कारणों से धीरे-धीरे साहित्यिक पत्रिकाओं से एक पाठक के बतौर मेरा नियमित जुड़ाव कम होने लगा था ।  कुछ वर्षों बाद एक बार फिर एकांत जी के संपादक बनने की ख़बर सुनी । अब शंभुनाथ जी के संपादक बनने की ख़बर सुन रहा हूँ !
यह सही है कि एकांत जी के प्रति मेरे मन में अपने व्यक्तिगत अनुभवों के कारण सम्मान है । एक स्थापित लेखक/संपादक का मुझ बिल्कुल अपरिचित, बिल्कुल नये और एक कम उम्र रचनाकार को गंभीरतापूर्वक फ़ोन पर सुनने, विनम्रता से जवाब देने और प्रोत्साहित करने के सहज तरीके की छाप मेरे मन पर है । लेकिन उनके योगदान के मूल्यांकन का आधार मात्र मेरा अनुभव नहीं है । मैं निजी बातचीत से जानता हूँ कि मेरे कई अन्य लेखक मित्रों का भी मुझसे मिलता-जुलता अनुभव रहा है । मुझे आशा है कि कुछ मित्र इस बात की पुष्टि भी करेंगे ।
भयावह संपादकीय अहंकार के दौर में क्या एक संपादक को इसलिए विशिष्ट नहीं माना जाना चाहिए कि उसने कई नव लेखकों को बिना भेद-भाव, बिना जान-पहचान के अवसर दिया, और जिससे उनकी प्रतिभा पर्याप्त प्रोत्साहित हुई ? बहुत अधिक ऐतिहासिक-साहित्यिक महत्व के विशेषांकों के प्रकाशन के बजाय भविष्य एक संपादक के योगदान का मूल्यांकन इस संदर्भ में भी करेगा कि उसने संभावना से भरे कितने नये लेखकों को सामने लाने और प्रोत्साहित करने का काम किया । मैं मानता हूँ कि इस दिशा में एकांत जी का योगदान महत्वपूर्ण है । बहुत प्रयास करके भी कोई उनसे यह श्रेय नहीं छीन सकता । हिन्दी के संपादकों को इस मामले में एकांत जी से सीखने की जरूरत है । 

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[स्पष्टीकरण: इस लेख में लगभग एक दशक पहले की बातों का जहाँ उल्लेख हुआ है, मैंने अपने स्मरण और अपने विश्वास में जो सच है, उसे लिखा है । संभव है कुछ त्रुटियाँ रह गयी हों, घटनाओं के क्रम में थोड़ा-बहुत अंतर रह गया हो, और संवाद में ठीक-ठीक वही बातें नहीं आ पायी हों, जो हुई होंगी । लेकिन इस लेख में भावनाओं और आशय को ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर पाने का मैंने पूरा प्रयास किया है । यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह लेख व्यक्ति एकांत श्रीवास्तव के बजाय संपादक एकांत श्रीवास्तव पर केन्द्रित है । एकांत जी की विचारधारा, भाषा परिषद के साथ उनके सम्बंध, सहमति-असहमति जैसे पहलुओं की न तो मुझे जानकारी है और न तो उस पर बात करना इस लेख का अभिष्ट है।] 

Monday, May 25, 2015

सृजनात्मक संघर्ष


साभारगूगल बुक्स
सृजनात्मक संघर्ष क्या है ? यह सवाल सुनकर, मुझे सबसे पहले मुक्तिबोध का ध्यान आएगा । मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी और लम्बी कविता अंधेरे में दो ऐसे स्रोत रहे हैं, जिनसे मुझे सृजनात्मक संघर्ष अथवा लेखक के आत्मसंघर्ष को समझने में पर्याप्त मदद मिलती है । अपने विवेक से मैं जितना समझ पाया हूँ, उसी आधार पर सृजनात्मक संघर्ष पर कुछ लिखने की छूट ले रहा हूँ ।
लगभग एक सप्ताह पहले अल्पना मिश्र के पिछले जन्मदिन (18 मई 2014) पर स्त्रीकालवेब पोर्टल पर प्रकाशित उनकी पाँच कविताओं को उनके अगले जन्म दिन पर फिर से फेसबुक पर शेयर किया गया था । शेयर किये गये एक लिंक पर आशुतोष कुमार ने अल्पना मिश्र को टैग करते हुए अपनी प्रतिक्रिया इस तरह दी – अल्पना मिश्र का सृजनात्मक संघर्ष एक मिसाल है  । उन्हें बधाई । इस प्रतिक्रिया को पढ़कर मैं देर तक सोचता रहा कि आशुतोष कुमार ने किस आधार पर अल्पना मिश्र के सृजनात्मक संघर्ष को मिसाल कहा होगा ! मुझे लगता है, आशुतोष जी के पास इसका आधार ज़रूर रहा होगा, इस पर फुर्सत से वे लिख भी सकते हैं । तत्काल मन में कोई आधार नहीं भी रहा हो, तो भी मुझे विश्वास है कि भविष्य के लिए, वे अपने विवेक से इसे तैयार कर लेंगे । बहरहाल मुझे स्वीकारना चाहिए कि आशुतोष कुमार की प्रतिक्रिया के कारण ही इस विषय पर विचार करने की मुझे आवश्यकता महसूस हुई है ।
फिर से उसी सवाल पर लौटते हैं कि सृजनात्मक संघर्ष क्या है ! मेरी समझ से सामान्यतः इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति के लिए किये जाने वाले आत्म और बाह्य संघर्ष के रूप में परिभाषित करने में कोई बुराई नहीं है । ऐसा संघर्ष प्रत्येक सृजनधर्मी कमोबेश करता ही है । अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस आत्म और बाह्य संघर्ष को सूक्ष्मता से समझा जाए । मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन वागर्थ के किसी अंक में कलकत्ता की एक लेखिका के नागार्जुन से हुई भेंट पर लिखे संस्मरणात्मक लेख को पढ़ा था । लेखिका ने बहुत उत्साह से अपनी कुछ रचनाएँ बाबा नागार्जुन को सुनाई । लेखिका ने लिखा है कि अचानक से बाबा बहुत क्षुब्ध हो गये, और कहने लगे कि इन रचनाओं को लिखते हुए तुम कभी रोई हो ? लिखते हुए कई बार रात-रात भर रोना पड़ता है..वगैरह..वगैरह..। बाबा के लगातार बोलते जाने का सार यह था कि सच्ची अभिव्यक्ति, अभिव्यक्त पात्रों की पीड़ा अथवा विषय की संवेदना को महसूस किये बिना संभव नहीं हो सकती है । शायद नागार्जुन इतने क्षुब्ध हो गये थे कि वे उठ कर चले गये थे । नागार्जुन ने अपनी एक कविता में सृजन की इसी पीड़ा को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है- इंदुमति के मृत्यु शोक से अज रोया या तुम रोए थे ? / कालिदास, सच-सच बतलाना !’ मेरा मानना है कि सृजन के क्रम में ऐसी पीड़ा को अपने भीतर महसूस करना दरअसल सृजनात्मक संघर्ष का पहला अहम हिस्सा है । सृजनात्मक संघर्ष के इस हिस्से को ईमानदारी से निभाने वाले सृजनधर्मी व्यक्तिगत जीवन में भी अत्यंत संवेदनशील नहीं होंगे, इस संदेह का कोई कारण नहीं दिखता । सृजनात्मक संघर्ष का यह हिस्सा अहम है, लेकिन सृजनात्मक संघर्ष का सब कुछ यही नहीं है ।
अंधेरे में कविता में कवि जिस परम अभिव्यक्ति की खोज में छटपटाता हुआ दिखाई देता है, मेरी समझ से सृजनात्मक संघर्ष का वह दूसरा अहम हिस्सा है । अभिव्यक्ति की छटपटाहट क्या सभी सजग सृजनधर्मियों में नहीं होती? इसका घनत्व कम या अधिक हो सकता है, लेकिन प्रत्येक सजग सृजनकर्मी में इसकी उपस्थिति होती ही है । इसके कारण अलग अलग हो सकते हैं । संस्कृत काव्यशास्त्रों में यश और धन के लिए काव्यकर्म का उल्लेख मिलता है, यह आज भी अप्रासंगिक नहीं हुआ है । धन से पारिश्रमिक का अर्थ लगाना गलत होगा । इसे आज के दौर में बड़े पुरस्कारों और आर्थिक फायदे वाले पदों से जोड़ कर देखा जा सकता है । ऐसे सृजन कर्म में भी उम्दा कार्य करने का दबाव होता है । ऐसे सृजन कर्म भी पर्याप्त प्रतिष्ठा हासिल कर लेते हैं । अभिव्यक्ति की आकुलता को इस प्रकार के सृजन कर्म के माध्यम समझने का प्रयास किया जाए तो हम अभिव्यक्ति की छटपटाहट के मर्म को नहीं समझ सकते । ‘अंधेरे में’ की पंक्तियाँ- अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे / तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब- यहाँ हमारी मदद कर सकती हैं । अभिव्यक्ति अथवा सृजन का संघर्ष अभिव्यक्ति के ज़रूरी ख़तरे उठाए बिना बहुत अधूरा है । यह ज़रूरी ख़तरे हमारे समय के मुताबिक तय होते हैं । हम जिस लोकतंत्र में रहते हैं वहाँ, परिवेशगत जमीनी जटिल समस्यायों से जूझने के बजाए उच्चस्थ सत्ता, व्यवस्था और पूँजी प्रतिष्ठानों की आलोचना अधिक सुविधाजनक है । इस तरह की अभिव्यक्ति बहुत हद तक खतरे के दायरे से बाहर है, हालाँकि इस तरह की आलोचना का पर्याप्त महत्व है, और आज भी यह खतरे से एकदम परे नहीं है । अभिव्यक्ति के ख़तरे को समझदारी से परिभाषित किये जाने की जरूरत है । पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश का सृजन कर्म इसका एक उदाहरण हो सकता है, जिन्होंने विसंगतियों के विरूद्ध अपनी निष्ठा के साथ संघर्ष किया और मारे गये । कबीर ने उस दौर में धर्म और जाति व्यवस्था को चुनौती दी थी जिसके सैकड़ों साल बाद और तथाकथित लोकतांत्रिक अधिकारों के रहते भी साम्प्रादायिक और जातीय दबंगई का पार नहीं पाया जा सका है । अभिव्यक्ति की छटपटाहट का मूल्यांकन उसके  प्रयोजन के आधार पर ही किया जाना चाहिए ।
सृजनात्मक संघर्ष का एक और पक्ष उल्लेखनीय है । सृजनधर्मियों की व्यक्तिगत परिस्थिति पर विचार किया जाना भी आवश्यक है । अभावों, व्यक्तिगत सीमा, असुविधा, शारिरिक अथवा मानसिक पीड़ा जैसी कई चुनौतियों के रहते भी सोद्देश्य सृजन के प्रति निष्ठावान रह सकना , निस्संदेह बहुत बड़ा सृजनात्मक संघर्ष है । ऐसे में सृजन बहुत प्रभावशाली नहीं भी हो, तब भी वह सृजनात्मक संघर्ष की महत्वपूर्ण निधि है और इस नाते सम्माननीय भी ।
उपर के तीन पैरा में सृजनात्क संघर्ष के सभी आयाम समेट लेने का दावा नहीं किया जा सकता है । फिर भी सृजनात्मक संघर्ष को समझने की जो कोशिश की गयी है, उसमें किसी एक परिस्थिति या बिन्दु को निर्णायक नहीं समझ लिया गया है । मसलन जरूरी नहीं कि सृजनधर्मी आर्थिक अभाव में रहता हो, लेकिन तब भी यह आवश्यक है कि वह अभिव्यक्ति के जरूरी ख़तरे उठाने के लिए आत्मसंघर्ष करता हो और उस पक्ष में खड़ा हो जो न्यासंगत हो । यदि यह आत्मसंघर्ष वास्तविक होगा तो सवाल ही नहीं उठता कि रचनाकार का व्यक्तिगत जीवन उसके सृजन की भावना के विपरीत होगा ।
चूँकि एक विश्वविद्यालयी शिक्षक के सृजन कर्म पर एक विश्वविद्यालयी शिक्षक की टिप्पणी को प्रस्थान बिंदु के रूप में चुना गया था, एक और बिन्दु पर विचार करना आवश्यक है । विश्वविद्यालयी शिक्षकों के सृजनात्मक संघर्ष का मूल्यांकन क्या अन्य लोगों के सृजनात्मक संघर्ष से अलग तरीके से करना चाहिए चाहिए? मेरा उत्तर है- हाँ । यह उत्तर सृजनात्मक संघर्ष पर तीन पैरा में की गयी चर्चा के आधार पर ही दिया जा रहा है । विश्वविद्यालयी शिक्षकों को मिलने वाला अपेक्षाकृत भारी वेतन, विभिन्न सुविधाएँ और पर्याप्त अवकाश जनता के पैसों की बदौलत है । इसलिए उनके ऊपर प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों के बिना भेद-भाव बेहतर निर्माण की है, उपलब्ध ज्ञान के दोषरहित हस्तांतरण और विस्तार की है । इस प्रसंग की तमाम विसंगतियों और कुव्यवस्था से जूझना उनका अनिवार्य दायित्व है । इस तरह उनका प्राथमिक सृजनात्मक संघर्ष विद्यार्थियों के निर्माण का संघर्ष है । यदि वे यहाँ ईमानदार नहीं होंगे तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे किसी किस्म के सृजनात्मक संघर्ष के योग्य नहीं हो सकते । एक विद्यार्थी के नाते अपने किसी शिक्षक के रचनात्मक सृजन से मुझे खुशी होती है, लेकिन मेरे लिए उनके सृजनात्मक संघर्ष को समझने के लिए एक शिक्षक और एक मनुष्य के बतौर उनका आचरण काफी होता है। दुर्भाग्य से विश्वविद्यालयी शिक्षकों ने जिनके ऊपर सृजन की अपेक्षाकृत बड़ी जिम्मेदारी है, आपसी साँठ-गाँठ से ऐसा माहौल तैयार कर लिया है, जहाँ सृजनात्मक संघर्ष से रहित सृजन की जय जयकार हो रही है । विद्यार्थियों के सृजन में लगे शिक्षक और उनका ईमानदार लेखन भी घोर उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं, और विशेष प्रयोजन से कविता संकलन, कथा संकलन, उपन्यास और राग-द्वेष के आधार पर लिखी गयी या संपादित आलोचना की किताब अथवा अभिनंदन ग्रंथ छपवाने वाले प्रोफेसरों को पुरस्कार और सम्मान मिल रहा है, उनकी जयजयकार हो रही है ।
यह समझ में आता है कि किसी कृति मात्र पर चर्चा करते हुए समीक्षक उसे अच्छा, बेहतर, या इच्छा हो तो बहुत उम्दा कह दे, लेकिन यह समझ से परे है कि किसी भी सृजन कर्म को बड़ा सृजनात्मक संघर्ष कहने से पहले गंभीरतापूर्वक सोचा विचारा न जाए । इस तरह की टिप्पणी बहुत सतर्क हो कर ही करनी चाहिए । जाने-अनजाने सृजनात्मक संघर्ष के संदर्भ में चलताऊ टिप्पणी कर के हम अपने उन पूर्वजों और समकालीनों का सिर्फ अपमान ही नहीं करते हैं बल्कि उनके प्रति घोर कृतघ्नता प्रदर्शित करते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन सृजनात्मक संघर्ष के निमित्त समर्पित कर दिया या इस तरह के समर्पण का संकल्प लेकर उसे निभाने में यत्न पूर्वक जुटे हुए हैं। यह हमारी अगली पीढ़ी के प्रति भी अपराध है, जिन तक सृजनात्मक संघर्ष ही नहीं अब तक उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान की सही समझ प्रेषित करना हमारा अपरिहार्य कर्तव्य है ।