Saturday, August 24, 2013

दीपांकर भट्टाचार्य के नाम खुला पत्र

साभार-नवभारत टाइम्स
कामरेड, 23 अगस्त 2013 के दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय संस्करण (पृष्ठ सं-10) में प्रकाशित एक ख़बर से व्यथित होकर यह पत्र लिख रहा हूँ । ख़बर में आपके हवाले से कहा गया  है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाकपा (माले) बिहार में अंतिम क्षण तक वाम एकता का प्रयास करती रहेगी । वाम एकता माने- भाकपा, माकपा और भाकपा (माले ) की एकता । सामान्यतः वाम एकता के इस प्रयास को सकारात्मक माना जाएगा लेकिन मेरी समझ इसे सकारात्मक मानने के लिए तैयार नहीं है । पिछले दिनों फेसबुक पर मित्र आकाश ने एक कमेंट कर पूछा- भाकपा (माले) के बारे में आपका क्या खयाल है, जो भाकपा और माकपा की नीतियों का विरोध भी करती है और चुनावी फायदे के लिए गठबंधन भी ? यह कमेंट एक पोस्ट पर किया गया था जिसमें गलत नीतियों की वजह से भाकपा और माकपा को मैंने अप्रासंगिक कहा था । मैं इसे एक वाजिब सवाल मानता हूँ । मैं आइसा का एक बहुत सक्रिय तो नहीं लेकिन समय-समय पर सहयोगी भूमिका निभाने वाला एक सदस्य रहा हूँ । आइसा देश में राजनीतिक विकल्प के तौर पर भाकपा (माले) पर विश्वास जताती है । संभवतः असहज कर देने वाला यह सवाल मेरी तरफ इसी लिए उछाला गया था । मैंने प्रतिउत्तर में लिखा कि भाकपा (माले) को इसका जवाब देना होगा । आज इस खबर को पढ़ते हुए मुझे लगा कि सवाल पूछने का यह सही वक्त है ।

ओम थानवी - आशा है आप इस नाम से परिचित होंगे । फेसबुक के माध्यम से अक्सर ही उनकी एक चिंता मुझ तक पहुँचती है । आशय होता है कि कोई उन्हें बताए कि इस देश में इतनी वामपंथी पार्टियाँ क्यों हैं ? भाकपा है तो फिर माकपा या भाकपा (माले) की क्या जरूरत है ? इसी तर्ज पर वे कहते हैं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के रहते अन्य वामपंथी लेखक संगठनों  जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) की क्या जरूरत आन पड़ी ? उनकी यह जिज्ञासा मुझे बालसुलभ लगती रही है । वामपंथी दलों का विभाजन किन कारणों से हुआ और इस तरह के विभाजन का होना कितना जरूरी था- यह कोई ठीक से समझना न चाहे तो समझा पाना श्रमसाध्य तो हो ही जाता है । ठीक इसी तरह यह मान लेना कि लेखक किसी राजनीतिक विकल्प में आस्था रख सकता है, कई लोगों के लिए बहुत कठीन है ।  वामपंथी राजनीति के प्रति आस्थावान लेखक विभिन्न वामपंथी पार्टियों के समर्थक और उनके लेखक संघों  के सदस्य हो सकते हैं, यह बात भी कुछ लोगों को नहीं पचती । लेकिन ठीक इस समय जब मैं आपको यह खुला पत्र लिख रहा हूँ, मुझे लग रहा है कि जिसे मैं बालसुलभ या अपरिपक्व जिज्ञासा, सवाल या सोच मानता रहा हूँ, उसमें दम है । मेरी नजर में, यह दम आया है वाम एकता की बात करने के बाद ।

कामरेड, हम अपने आंदोलनों में एक नारा देते हैं जिसका आशय होता है- एकीकृत जनता हमेशा विजयी होती है । एकता, एकीकरण जैसे शब्दों के प्रति हमारा सौंदर्यबोध बेहद मजबूत है । वाम एकता सुनते हुए भी सहसा ऐसा ही सौंदर्यबोध जगता है लेकिन यह जल्दी ही विकृत हो जाता है । इतिहास में भाकपा और माकपा ने जो गलतियाँ की है उसका जिक्र भाकपा (माले) के दस्तावेजों में बखूबी हुआ है । इसलिए इतिहास कुरेदने की जरूरत मुझे महसूस नहीं हो रही है । सोचने समझने की उम्र होने पर जो मैंने देखा और समझा है उसी में से कुछ का जिक़्र कर देना काफी है । आशा है आप सिंगुर और नंदीग्राम नहीं भूले होंगे । सिंगुर में सेज (SEZ) कानून के अन्तर्गत टाटा मोटर्स के लिए कारखाना और नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगवाने के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण करने का प्रयास और आंदोलन को कुचलने के लिए हुए जनसंहार और सौकड़ों किसानों पर दर्ज फर्जी मुक्कदमें यह सावित करने के लिए काफी हैं कि खुद को मार्क्सवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने वाली पार्टियाँ वास्तव में मार्क्सवादी हो भी, जरूरी नहीं है । हाल में, क्या वह वामपंथ पर हावी बंगाली अस्मिता नहीं थी, जिसने माकपा को खाँटी कांग्रेसी प्रणव मुखर्जी  को राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन की प्रेरणा दी ? आज भी यह बेहद शर्मनाक लगता है कि इन वामपंथी पार्टियों ने उस कांग्रेस सरकार को सहारा दिया जिसके मुखिया नव उदारवाद मॉडल के मास्टर माइंड मनमोहन सिंह थे।
   
कामरेड, राजनीति में कुछ तर्क पूर्वानुमानित होते हैं । मसलन भाकपा (माले) की ओर से यह तर्क आ सकता है कि साम्प्रदायिक व पूँजीवादी ताकतों को शिकस्त देने के लिए वाम ताकतों का एक होना जरूरी है । इसी तर्क के आधार पर सपा, बसपा, राजद, जद(यू) और लोजपा जैसी अवसरवादी ताक़तों से भी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हाथ मिलाती रही हैं या मिला सकती हैं । मुझे ऐसे तर्क एक साथ कातर और खतरनाक लगते हैं । साम्प्रदायिक ताकतें यदि जोर-तोड़ से सत्ता में आ जाती हैं तो देश बर्वाद हो जाएगा-इस आशंका को हवा देना बंद कर देना चाहिए, विशेष कर जुझारू वामपंथी पार्टियों को । साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कम्युनिस्ट विचारों को ताक पर रख देना कहीं से उचित नहीं है । संसदीय राजनीति में विरोध की भूमिका कभी खत्म नहीं होती है । कायदे से यह होगा कि सत्तासीन साम्प्रादायिक ताकतें जब कभी देश की पंथनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगी, ईमानदार वाम ताकतें संसद से सड़क तक विरोध का ऐसा वातावरण तैयार कर देंगी कि साम्प्रदायिक ताकतों को अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का भलि-भाँति एहसास हो जाएगा । साम्प्रादायिक या पूँजीवादी ताक़तों का सत्ता में आना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन किसी भी खतरनाक मंशा को हम नाकाम कर देंगे - किसी ईमानदार वामपंथी पार्टी का यही स्टेंड हो सकता है । भाकपा और माकपा का ऐसा स्टेन्ड कभी नहीं रहा है । इन पार्टियों ने अपने कम्युनिस्ट चरित्र का अनेक अवसरों पर गला घोंटा है । भाकपा और माकपा जैसी पार्टियों से चुनावी तालमेल भाकपा (माले) को भी इसी कतार में खड़ा कर देगा ।

कामरेड, अपनी गलतियों को मान कर सुधार का संकल्प शुद्धिकरण का प्रयास कहलाता है । माकपा, भाकपा का ऐसे प्रयासों से बैर रहा है । ये पार्टियाँ ऐसा प्रयास भी करती तो उनसे गठबंधन को जायज ठहराया जा सकता था । बड़े जन आंदोलनों में जो दल एक साथ नहीं आ सकते, कम्युनिस्ट मूल्यों के लिए जो साथ लड़ते नहीं, उनमें चुनावी तालमेल ,माफ करिएगा ,घाघ राजनीति का नमूना है ।

अब कुछ बेहद अप्रिय बातें । बिहार इस समय भारी विकल्पहीनता से जूझ रहा है । ऐसे में भाकपा (माले) जिस जनविकल्प की बात करता है, उसकी मजबूत दाबेदारी पेश कर पाने में वह असफल रहा है । बिहार के सड़कों पर सबसे अधिक सक्रिय  दिखने वाली इस पार्टी में संभवतः राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हो गया है । बिहार के अनेक युवाओं से मेरा बहुत निकट का परिचय है जो दिल्ली में रह रहे हैं और माले की राजनीति के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं । दिल्ली में हुए कई जनआंदोलनों में वे खुद को एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित कर चुके हैं । माले बिहार में इस उर्जा का उपयोग कर पाने में असफल रहा है । बहुत संभव है कि इन युवाओं को चंद्रशेखर के रास्ते चलने की अपेक्षा दिल्ली की सड़कें ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा प्रतिष्ठा दिलाने वाली लगती हों । ऐसे माहौल में भाकपा माकपा का दामन थामने का विचार आ सकता है, ऐसा मुझे लगता है । मैं आपसे कहता हूँ और बहुत जोर देकर कहता हूँ कि उन वामपंथी ताकतों का वहिष्कार बेहद जरूरी है जिनकी नीतियों ने वामपंथ के प्रति जनता में मोहभंग पैदा किया है । उग्र राजनीति अक्सर एकाकी होती है । एक बेहतर वाम विकल्प यदि देश के सामने आएगा तो वह वामपंथी राजनीति की बुराइयों का निषेध करते हुए ही आएगा । मुझे आशा है कि भाकपा (माले) भाकपा और माकपा से चुनावी गठबंधन करने का ईरादा छोड़ देगी । इसी क्रम में ध्यान आया कि हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वास प्रस्ताव में उनका समर्थन करने वाली भाकपा की नीतीश सरकार से नजदीकियों की जानकारी होने से आपने इंकार किया है । मुझे हैरानी हुई । भाकपा (माले) ने नीतीश सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरने का साहस लगातार दिखाया है । लेकिन वाम एकता की महत्वाकांक्षा की वजह से भाकपा और जद(यू) की नजदिकियों की सूचना से आपका इंकार करना, बेहतर राजनीति का संकेत नहीं है । मुझे अपनी राजनीतिक समझदारी का गुमान नहीं है । आप चाहें तो मेरी बातों को तार्किक ढंग से नकार कर मुझे समझा सकते हैं । ईमानदार और गैरईमानदार राजनीति का फर्क तो जनता को तय करना है । शुभकामनाओं सहित-

कुमार सौरभ


भास्कर में छपी खबर की पृष्ठ का लिंक - Bhaskar E-paper

Tuesday, June 25, 2013

भ्रामक दलीलों के विरूद्ध

यह प्रतिक्रिया मूल रूप से जनसत्ता के लिए लिखी गयी थी। जनसत्ता ने इसे प्रकाशित नहीं किया। इसे ब्लॉग पर साझा कर रहा हूँ कि कुछ पाठकों तक पहुँचे। निरंजन कुमार के जिस लेख पर यह प्रतिक्रिया लिखी गयी है, वह है- ज्ञान बनाम जीवन-कर्म ई-संस्करण     इसी लेख पर 16 जून 2013 को बजरंग बिहारी तिवारी की प्रतिक्रया जनसत्ता में प्रकाशित हुई है- न ज्ञान न जीवन-कर्म / ई-संस्करण  इस प्रतिक्रिया में व्यक्त तर्कों और विचारों की मौलिकता का दावा विल्कुल भी नहीं है। सारे तर्क और विचार चार-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के विरोध में हुए आंदोलन और उसकी तैयारी के क्रम में निर्मित हुए हैं। मैंने उसे प्रस्तुत भर किया है। कुछ निजी समस्यायों की वजह से इस आंदोलन में सक्रिय नहीं रह पाने का मलाल भी है।

देव कबीर मलिक के द्वारा डिजाइन किया गया । साभारThe Sunday Guardian

निरंजन कुमार के आलेख ज्ञान बनाम जीवन कर्म’ (जनसत्ता, 2 जून 2013) में संतुलन की बात की गयी है, लेकिन यह आलेख स्वयं में लेखक की असंतुलित दृष्टि का उदाहरण है । इस आलेख में दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वारा स्वीकृत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (Four Year Undergraduate Programme : FYUP) के पक्ष में विश्वविद्यालय प्रशासन के भ्रामक दलीलों को ही आगे बढ़ाने का काम किया गया है । विश्वविद्यालय के उपकुलपति दिनेश सिंह लगातार यह बताने की कोशिश करते रहे हैं कि इस नये ढाँचेके आने से पहले का हमारा स्नातक पाठ्यक्रम किसी काम का नहीं था । निरंजन कुमार भी इसी तर्क पद्धति का अनुसरण करते हैं । उनकी पहली चिंता यह है कि पुराने ढाँचेके किसी भी विषय के स्नातक इस योग्य नहीं होते कि वे एक सक्षम बैंक अधिकारी, पुलिस उपनिरीक्षक या प्रशासनिक अधिकारी बन सके । इस दावे का आधार क्या है यह वे स्पष्ट नहीं कर सके हैं । कभी संघ लोक सेवा आयोग या किसी अन्य जिम्मेदार संस्थान ने यह समस्या उठायी हो कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की वजह से हमारे यहाँ काबिल अधिकारी नहीं आ पाते, कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं है । हमारे यहाँ योग्यता का अभाव कभी समस्या नहीं रही है । रोजगार का अभाव एक समस्या जरूर रही है । किसी और अभाव का जिक्र करना यदि समीचीन है, तो वह है ईमानदारी और इच्छाशक्ति का अभाव जिसकी वजह से अयोग्य व्यक्तियों को भी अवसर मिल जाता है ।

निरंजन कुमार की दूसरी चिंता है कि पुराने ढाँचेके स्नातक सामान्य जीवन में भी संतुलित और जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर नहीं उभर पाते हैं । उनकी बात मान लें तो हमें यह मान लेना होगा कि भारतीय विश्वविद्यालयों के स्नातक अपने जीवन में असंतुलित और गैरजिम्मेदार ही रह जाते हैं । वे लिखते हैं एक व्यक्ति को दैनिक जीवन में में पर्यावरण, स्वास्थ्य, राजनीतिक जीवन, प्रशासन-कानून, आर्थिक परिस्थितियों , सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समायोजन, इतिहास संस्कृति जैसी चीजों से रूबरू होना पड़ता है, जिसके बारे में समान्य स्नातक को सम्यक ज्ञान नहीं होता, चाहे वह किसी वर्ग का हो ।
ज्ञान के जिन क्षेत्रों से वे रूबरू होने की वे बात करते हैं वह सही है । गरबड़ी उनके निष्कर्ष में है । विश्वविद्यालयों में जिस तरह से बोझिल पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों को उलझाए रखने की कोशिश की जा रही है, निरंजन कुमार की सोच भी इसी कोशिश से प्रेरित है । वे यह मान बैठे हैं कि ज्ञान बाँटने का सारा काम कक्षाओं में ही सम्पन्न होता है और दुनिया भर का ज्ञान पाठ्यक्रमों में ही निहित होता है । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लागू करने से कुछ वर्षों पहले भारी विरोध के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में सेमेस्टर व्यवस्था को लागू करने की रणनीति पर भी विचार करना जरूरी है । इसने विद्यार्थियों को पाठ्यक्रमों तक सीमित हो जाने के लिए विवश कर दिया । खेलकूद, सृजनात्मक लेखन, वादविवाद, प्रदर्शनियों, सामाजिक कार्यो व छात्र राजनीति में सक्रियता जैसी अतिरिक्त गतिविधियाँ, विद्यार्थियों के सर्वागीण विकास के लिए जरूरी मानी जाती रही हैं । बोझिल पाठ्यक्रम और निर्धारित अपर्याप्त कक्षाओं के दबाव ने विद्यार्थियों को जरूरी अतिरिक्त गतिविधियों को लेकर हतोत्साहित किया । निरंजन कुमार ज्ञान के जिन क्षेत्रों से वे रूबरू होने को आवश्यक मानते हैं, वह सामान्य ज्ञान का विषय है । इसे पाठ्यक्रमों से बाहर ग्रहण करने की बेहतर संभावनाएँ मौजूद रहती हैं । इसके लिए जरूरी है कि विद्यार्थियों को सोचने समझने का अवकाश उपलब्ध कराया जाए । पाठ्यक्रमों से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी ऑनर्स स्नातक होने के नाते मेरे भी कुछ अनुभव हैं । हिन्दी साहित्य की आलोचना, हिन्दी साहित्य का इतिहास और कक्षाओं में इस पर होने वाली चर्चा हिन्दी के विद्यार्थियों को  इतिहास, मनोविज्ञान, भाषा विज्ञान, नृ-विज्ञान, राजनीति विज्ञान, दर्शन और संस्कृति जैसे विषयों के अध्ययन की प्रेरणा देती है । दरअसल विभिन्न विषयों का आपस में एक रिश्ता होता है । अपने ही विषय के प्रति गहरी अभिरूचि अन्य विषयों की जानकारी प्राप्त करने की प्रेरणा देती है । जब घटनाओं और मुद्दों को बेहतर ढंग समझने और सोचने का परिवेश हो तो निरंजन कुमार की यह आशंका भी गलत सावित होगी कि पुराने ढाँचेके स्नातक रहे संस्कृत, अर्थशास्त्र और गणित के प्राध्यापक को मानवाधिकार और कानून की सामान्य जानकारी नहीं होगी । लेकिन यह तब संभव है जब पाठ्यक्रम सुरूचिपूर्ण हो । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में आधारभूत पाठ्यक्रम छात्रों को उनकी रूचि के विपरीत के विषयों को पढ़ने के लिए बाध्य करेगी । इसकी भयावहता को एक उदाहरण से समझ सकते हैं । दसवीं के बाद कोई विद्यार्थी अपने बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वह गणित या विज्ञान जैसे विषयों के साथ सहज नहीं है । ऐसे में वह बारहवीं मे कला या वाणिज्य संकाय को चुनता है और उसमें बेहतर परिणाम हाँसिल करता है । चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के बाद उस पर क्या बीतेगी जब उसे फिर से गणित और विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ने के लिए बाध्य किया जाएगा । यहाँ तक कि संगीत और फाइन आर्ट जैसे कौशल आधारित ऑनर्स पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों पर भी आधारभूत पाठ्यक्रम और इन विषयों से इतर विषयों को पढ़ने की अनिवार्यता लाद दी गयी है ।

निरंजन कुमार ने आलेख की शुरूआत में दो बिन्दुओं को विचारणीय माना है । पहला- शिक्षा, खास तौर पर उच्च शिक्षा के उद्देश्य क्या हैं? दूसरा- हमारी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर ये परिवर्तन क्या आवश्यक हैं? इन दोनों ही बिन्दुओं पर वे ठीक से अपनी बात नहीं रख सके हैं । उनके आलेख से यह आभास जरूर मिलता है कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य है देश के लिए बैंक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों को तैयार करना । देश में इस कार्य के लिए पुलिस प्रशिक्षण अकादेमी और प्रशासनिक अकादेमी जैसी प्रशिक्षण देने वाली संस्थाएँ भी हैं, संभवतः उन्हें  इस बात का स्मरण नहीं रहा होगा । उनके अनुसार अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से भिन्न आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन के शैक्षणिक प्रणाली का अनुसरण भी सही है । इस समझदारी पर क्यों न अफसोस हो । विशेषज्ञता प्रदान करना हमारे यहाँ उच्च शिक्षा प्रणाली की विशेषता रही है । इसी प्रणाली ने अपने-अपने क्षेत्र के कई धुरंधर इस देश को दिए हैं । इस शिक्षा पद्दति की ही ताकत है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओवामा सार्वजनिक मंच से अपने देश के विद्यार्थियों को भारतीय छात्रों की क्षमता के प्रति आगाह करते हैं । एक ही कक्षा के एक ही छात्र में वकील, डाक्टर, इंजिनियर, साहित्य आलोचक, मनोवैज्ञानिक, इतिहासविद व अन्य विशेषज्ञों जैसी विशेषज्ञता के एक साथ आ जाने की कल्पना सुंदर तो लग सकती है, लेकिन यह अव्यवहारिक है ।

निरंजन कुमार बड़ी चालाकी से उन सारे सवालों से बच निकलते हैं जो चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लेकर उठाये जा रहे हैं । एक बड़ा सवाल खतरनाक मंशा का है । हमारे देश में उच्च शिक्षा तक कम विद्यार्थियों की ही पहुँच हो पाती है । इन में से भी कई स्नातक कार्यक्रम पूरा नहीं कर पाते हैं । दूर दराज के व वंचित तबके के विद्यार्थियों के लिए एक बड़ा कारण आर्थिक असमर्थता और बोझिल पाठ्यक्रम होता है । जब पाठ्यक्रम चार वर्ष का होगा तो एक और अतिरिक्त वर्ष का बोझ छात्रों को उठाना होगा । आधारभूत पाठ्यक्रम, जिसे पहले के दो वर्ष में पढ़ना है, इसमें उन छात्रों के असफल रहने की आशंका ज्यादा है, जो पिछड़े राज्यों के शिक्षा बोर्डों से आते हैं । शोषित व वंचित तबके के उन छात्रों की असफलता की आशंका भी ज्यादा है, जिन्हें साधारण स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी लगातार मशक्कत करना पड़ती है । ऐसे में ये छात्र दो वर्ष तक भी अपने पाठ्यक्रम से जूझ सकेंगे, इसमें संदेह है । किसी तरह दो साल पूरा कर डिप्लोमा पाने में ये सफल रहे तो समस्या यह है कि जिस डिप्लोमा की कोई पहचान नहीं है, जिसके बारे में यूजीसी का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है, उसका महत्व क्या होगा ? हमारे यहाँ डिप्लोमा कार्यक्रम कौशल विशेष को प्रदान करने वाला पाठ्यक्रम रहा है । चार वर्षीय पाठ्यक्रम के दो वर्षों के पाठ्यक्रम को पढ़कर छात्रों में भला किस तरह का कौशल विकसित होगा सिवाय पाठ्यक्रम प्रदत खिचड़ी ज्ञान के ! जाहिर है उन्हें रोजगार मिलने की संभावना बहुत कम होगी । उनकी प्रतिस्पर्धा उन छात्रों से होगी जो कौशल विशेष से सम्पन्न होंगे । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में तीन वर्ष पूरा करने के बाद स्नातक की डिग्री मिल जाएगी । यह ऑनर्स नहीं होगा । विश्वविद्यालय में पहले भी ऑनर्स के अलावा पास कोर्स पाठ्यक्रम रहा है । यह  ऑनर्स पाठ्यक्रम के समानांतर एक स्वतंत्र पाठ्यक्रम हुआ करता था । लेकिन अब ऐसी डिग्री चार वर्षीय पाठ्यक्रम को तीसरे वर्ष में अधूरा छोड़ जाने वाले छात्रों को मिलेगी । ऐसे में पाठ्यक्रम को सफलता पूर्वक पूरा करने वाले छात्रों से वे हमेशा कमतर माने जाएँगे । ठीक इसी तरह चार वर्ष में ऑनर्स पाठ्यक्रम को पूरा करने वाले छात्र भी देश भर की प्रतियोगिता परीक्षाओं में तीन वर्षीय स्नातक करने वालो छात्रों के समकक्ष ही माने जाएँगे । इस अतिरिक्त एक वर्ष को लेकर विश्वविद्यालय और निरंजन कुमार दोनो का ही तर्क यह है कि यह एक वर्ष उन छात्रों के लिए लाभदायक है जो उच्चतर शिक्षा में जाने के इच्छुक हैं । आखिर मास्टर कार्यक्रम के रहते इसकी जरूरत ही क्या थी कि स्नातक कार्यक्रम को शोध प्रशिक्षण के लिए एक वर्ष और बढ़ा दिया जाए । कहा यह जा रहा है कि चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को पूरा करने वाले छात्रों को इस विश्वविद्यालय से एक वर्ष में मास्टर डिग्री मिल जाएगी । यह एक और छलावा है । एक वर्ष में मास्टर डिग्री देने का अर्थ यह हुआ कि इसके पहले से निर्धारित दो वर्षों में से एक वर्ष की पढ़ाई पहले ही पूरी कर ली गयी है । अन्य विश्वविद्यालय मास्टर की डिग्री देने में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को ऐसी ही सुविधा देंगे, इसके संकेत तो दूर-दूर तक नहीं हैं । यानी ऑनर्स डिग्री को हाँसिल करने के लिए एक और अतिरिक्त वर्ष जान बूझ कर थोप दिया गया है । यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा यह है कि स्नातक की डिग्री उन्हीं छात्रों तक पहुँच सके, जो आर्थिक रूप से सवल हैं और समाज के उँचे तबके से आते हैं । विश्वविद्यालय प्रशासन की इच्छा है कि उच्चतर शिक्षा तक आर्थिक व सामाजिक रूप से  पिछड़े तबके की पहुँच ही न हो सके । उच्चतर शिक्षा के माध्यम से जो रोजगार हाँसिल होते हैं वहाँ एक खास वर्ग का दबदबा हो । इस तरह चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम अपने चरित्र में आरक्षण जैसी सामाजिक न्याय की व्यवस्था को भी तकनीकी रूप से मात देने का हथियार बन सकता है । जिस तरह उच्च शिक्षा तक छात्रों की पहुँच व स्नातक पूरा न कर पाना एक बड़ी समस्या रही है, इसके जड़ तक पहुँच कर इसे हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए था । इसके विपरीत विश्वविद्यालय द्वारा मल्टि एक्जिट पोइंटका प्रचार दरअसल स्नातक की पढ़ाई को बीच में छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करेगा ।

एक अतिरिक्त वर्ष के पाठ्यक्रम से विश्वविद्यालय पर अतिरिक्त हजारो छात्रों का दबाव बढ़ेगा । यह आशंका अतिरंजित नहीं है कि ऐसे में ढाँचागत अभाव को पूरा करने के बहाने निजी विश्वविद्यालयों को घुसपैठ का अवसर दे दिया जाएगा । जामिया मिलिया के साथ मिलकर दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा शुरू किये गए मेटा यूनिवर्सिटी प्रोग्राम में कोरपोरेट भागीदारी की झलक विश्वविद्यालय प्रशासन के कोरपोरेट प्रेम का बेहतरीन परिचय देती है ।
          
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम विश्वविद्यालय शिक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ कर रख देगा । यह ज्ञान और विशेषज्ञता के उत्पादन को खत्म कर देगा । थोक में बेरोजगारों की ऐसी फौज तैयार होगी जो कॉरपोरेट घराने के लिए सस्ते श्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए मजबूर होगी ।

निरंजन कुमार ने चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लोकतांत्रिक पद्धति से स्वीकृत किये जाने का जिक्र किया है । यही तो दुर्भाग्यपूर्ण है । यह भ्रम कई लोगों को हो जाता है कि सत्ता के जो भागीदार होते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार का मनमाना प्रयोग भी जिंदा लोकतंत्र का उदाहरण है । उचित होता कि निरंजन कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के द्वारा  चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के लगातार विरोध की चर्चा करते । यह भी बताते कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस शिक्षक संघ से संवाद स्थापित करना भी उचित नहीं समझता रहा है । बल्कि छात्रों-शिक्षकों के विरोध के दमन में लगातार सक्रिय रहा है ।
                     
महज कुछ दिनों में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम की घोषणा से लेकर इसे लागू करवाने तक का कार्य सम्पन्न हो गया । ऐसे में निरंजन कुमार का यह दावा हास्यास्पद लगता है कि पाठ्यक्रम का निर्माण हरबड़ी में नहीं किया गया है । निरंजन कुमार ने लिखा है कि चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का विरोध एक खास विचारधारा के शिक्षक कर रहे हैं । बेहतर होता कि वे इस खास विचारधाराको स्पष्ट करने का साहस दिखाते । निश्चित रूप से यह खास विचारधाराछात्रों का हित चाहने वाली और सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाली विचारधारा है । इस तरह निरंजन कुमार का यह दावा विल्कुल सही है कि इस विरोध को सभी शिक्षकों का विरोध समझना गलत है !!

Sunday, June 9, 2013

विकल्पहीनता और विकल्प

साभार : दी इंडियन एक्सप्रेस                           
बिहार का महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव पिछले दिनों चर्चा का विषय बना रहा । नीतीश कुमार ने जनता से विकास और सुशासन का दावा करते हुए वोट मांगे थे । इस तरह यह जद (यू) और राजद के बीच का चुनाव नहीं रह गया था । यह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के लिए नाक की लड़ाई बन चुकी थी । नीतीश कुमार के सुशासन और विकास के दावे को जनता ने खारिज कर दिया । राजद प्रत्याशी प्रभुनाथ सिंह ने जद (यू) के उम्मीदवार पीके शाही को करीब एक लाख सैंतीस हजार मतों के भारी अंतर से पराजित कर दिया । चुनाव परिणाम ने लालू प्रसाद यादव को खुश होने का मौका दिया है । मीडिया उन्हें पर्याप्त तबज्जो दे रही है । लालू भी अपनी वापसी के दावे करने से चूक नहीं रहे हैं । जद (यू) का कहना है कि राजद को महज एक लोकसभा उपचुनाव में मिली जीत पर इतना इतराना नहीं चाहिए । जद (यू) के अनुसार इस चुनाव परिणाम को पूरे बिहार का जनादेश समझना गलत है । पार्टी अपनी झेंप मिटाने के लिए कुछ भी कहे, यह चुनाव परिणाम नीतीश कुमार के अति आत्मविश्वास को जबरदस्त चुनौती देता है ।
बिहार की जनता ने आठ वर्ष पहले राजद से बुरी तरह ऊब कर नीतीश को सत्ता सौंपी थी । लालू प्रसाद यादव और बाद में उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री के रूप में करीब पन्द्रह वर्षों तक बिहार में सत्ता का सुख भोगा था । इस कालखंड में बिहार का पिछड़ापन बढ़ता ही चला गया था । अपराध का ग्राफ बढ़ने लगा था । शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई बुनियादी सेवाओं की बदहाली से आम जनता परेशान हो गयी थी । उन्नीस सौ नब्बे के विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव का मुख्यमंत्री के रूप में चुना जाना एक सुखद संकेत माना गया था । इसे गरीबों-पिछड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी के रूप में देखा गया था । लेकिन लालू प्रसाद यादव बाद में जातीय गणित में माहिर हो गये । यह रास्ता उन्हें ज्यादा सुविधाजनक लगा । कुशासन की परंपरा फलने-फूलने लगी । बिहार में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बढ़ती चली गयी । गंभीर समस्यायों से जूझते बिहार को लालू यादव के तिलिस्म से बाहर आने में पन्द्रह वर्ष लग गये ।
2005 में नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने भारी आशा के साथ सत्ता सौंपी थी । जनादेश ने लालू प्रसाद की राजनीति को पूरी तरह नकार दिया था । शुरू में नीतीश कुमार जनता की आशा पर खरे उतरते दिखे थे । अपराध का ग्राफ घटा था और भ्रष्टाचार के कम होने व बदहाली से उबरने के संकेत मिलने लगे थे । धीरे-धीरे यह उत्साह खत्म होने लगा । नीतीश की सरकार भी कागजी उपलब्धियों की सरकार बनने लगी । पन्द्रह वर्ष के कुशासन के बदले सुशासन का सिर्फ ढोल पीटा जा रहा था । बिहार की मीडिया को सत्ता ने इस तरह प्रभावित किया कि नीतीश सरकार की प्रशंसा में वह अब तक लिप्त रहती है । मीडिया ने जो माहौल तैयार किया उससे नीतीश कुमार की छवि राष्ट्रीय स्तर पर एक सक्षम नेता के रूप में उभरी । अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर भी उन्हें पहचान मिली । इसी माहौल में नीतीश कुमार 2010 में दुबारा सत्ता में लौटे । जनता के लिए लालू-राज की भयावहता की तुलना में यह फिर भी बेहतर विकल्प था ।
नीतीश कुमार की दूसरी पारी में जनता को हकीकत से रूबरू होने का ज्यादा मौका मिला है । इस बार नीतीश का अहंकार कई मौकों पर साफ दिख जाता है । सरकार को एक व्यक्ति की सरकार बना देने में नीतीश ने कोई कसर नहीं छोड़ी है । राज्य के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की  समस्यायों को लेकर नीतीश बात तक करने को तैयार नहीं होते हैं । जनता के सड़कों पर उतरने से भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । तस्लीमुद्दीन जैसे आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को अपनी पार्टी में जगह देने से उन्हें परहेज नहीं रह गया है । रणवीर सेना के राजनीतिक दलों से सम्बंध की जाँच के लिए बने अमीर दास आयोग को भंग करने का फैसला लेकर नीतीश  सरकार ने दलित नरसंहार को लेकर न्याय की आशा पर पानी फेरने का काम किया है । मतलब साफ है कि पिछड़े की राजनीति करने वाले नीतीश कुमार सवर्ण भूमिहारों की नाराजगी की चिंता करने लगे हैं । मंत्रियों और उनके सम्बंधियों को सस्ते दरों पर भूमि आवंटित करने के मामले पर भी नीतीश कुमार चुप ही रहे हैं । बाढ़ राहत घोटाले की जाँच भी सरकार ठीक ढंग से नहीं करा सकी है । भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने के बावजूद नरेन्द्र मोदी से विरोध का उनका नाटक भी लोगों को रास नहीं आ रहा है । कुल मिला कर नीतीश कुमार जनता की नजरों में एक गैर ईमानदार, तानाशाह, बड़बोले और दोहरा चरित्र रखने वाले नेता के तौर पर स्थापित होते जा रहे हैं । हालाँकि मीडिया के हीरो वे आज भी हैं । ऐसे में महाराजगंज उपचुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी को मिली करारी हार को नीतीश सरकार के प्रति जनता में व्याप्त भारी रोष की के रूप में देखा जाना उचित है । अभी तो यह नहीं लग रहा है कि जद (यू) इस चुनाव परिणाम से सबक लेने के मूड में है ।

महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव का परिणाम एक बड़ी समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचता है । इस परिणाम में विकल्पहीनता के संकेत निहित हैं । नीतीश से ऊब चुकी जनता के पास क्या सिर्फ उसी राजनीति की ओर लौट जाने का रास्ता शेष बचा है, जिसके कारण लगातार पन्द्रह वर्षों तक उसने ने यंत्रणा भोगी है ? इस बीच मीडिया ने यह जताने की कोशिश की है कि लालू अब बदल गये हैं । लेकिन यह सच नहीं है । पिछले कुछ वर्षों से सत्ता में नहीं होने से उनका रूतबा कम जरूर हो गया है, लेकिन तेबर अब भी वही है । पिछले आठ वर्षों में एक बार भी ऐसा अवसर नहीं आया है जब वे सही राजनीति के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखा सके हैं । उनके पास अपनी गलती को सुधारने के पर्याप्त अवसर थे लेकिन उन्होंने इसे गँवा दिया । पहली बार जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे तब लालू प्रसाद के लिए बेहतर होता कि वे बिहार में विपक्ष की राजनीति करते । लेकिन तब सत्ता सुख की लालसा में केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय में जमे रहे । नीतीश कुमार की दूसरी पारी में भी उन के लिए अवसर था । लेकिन इस बार भी उपेक्षा झेलने के बावजूद यूपीए सरकार के हर सही गलत फैसले में वे तरफदारी करते नजर आते हैं, गोया उनका यही काम हो । नीतीश कुमार के निरंकुश होते जाने का बड़ा कारण वहाँ विपक्ष नाम की चीज का नहीं होना रहा है । लालू प्रसाद की राजनीति में कोई सकारात्मक परिवर्तन आ गया है, इस निष्कर्ष पर पहुँचना मूर्खता है । रेल मंत्रालय में रहते हुए उनके विकास के दावे का सच भी अब सबके सामने आ रहा है । उनकी राजनीति को समझने के लिए उनका एक हालिया बयान महत्वपूर्ण है । प्रभु चावला के साथ एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार कानून फालतू है, यदि वे सत्ता में आए तो इसे हँटा देंगे । क्या नीतीश को नकारने का मन बना चुकी जनता ऐसे ही नेता को फिर से मौका देने के लिए मजबूर होगी ? या उस रामविलास पासवान के पास लौटेगी जिसकी अवसरवादी राजनीति को वह पहले ही खारिज कर चुकी है ? क्या जनता कांग्रेस पार्टी को मौका देगी जिसकी सरकार के कारनामे को लेकर बिहार ही नहीं देश भर में गुस्सा है ? या अंत में उसी भाजपा-जद (यू) गठबंधन को फिर से सत्ता सौंप देगी जिससे वह परेशान है ? ऐसी स्थितियाँ बनती हैं तो बिहार के दुर्भाग्य को विस्तार ही मिलेगा इसमें संदेह नहीं है ।
साभार : प्रतिरोध डाट कॉम

यह वह समय है जब बिहार की जनता को विकल्प चाहिए । सड़क पर विपक्ष की राजनीति करने व वैचारिक अराजकता से मुक्त होने का दावा करने वाली पार्टियों के लिए यह सही समय है कि वह खुद को एक बेहतर और सक्षम विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करे । इस समय जनता तक पहुँचने के लिए इन राजनीतिक ताकतों को उन रास्तों का चयन करना होगा जो जनता के दिलों तक पहुँचती है । वैचारिक राजनीति की आत्ममुग्धता से बाहर आकर उन्हें राज्य के कोने-कोने में जनता तक पहुँचने के लिए सघन अभियान चलाना होगा । 2014 के लोक सभा चुनाव तक यदि वे ऐसा करने में सफल होते हैं तो बिहार का उसके दुर्भाग्य से निकास की संभावना बची रहेगी । अन्यथा यह मान लेना होगा कि दुर्दशा बिहार की नियति है, यह भी कि बेहतर  और समानांतर राजनीति का दावा करने वाले राजनीतिक दलों मे राजनीति करने की इच्छाशक्ति मर चुकी है ।

Tuesday, March 5, 2013

शशि की स्मृति में

शशि शेखर
बीते वर्ष की कई अच्छी-बुरी यादें हैं। बुरी यादों में से एक है हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग के होनहार छात्र शशि शेखर का जाना। 16 नवम्बर 2012, पंखे से झूलती उसकी देह की कल्पना से भी सिहर जाता हूँ। 


शशि ने यह तस्वीर स्कूल के दिनों में बनायी थी।



मेरी स्मृति ठीक है तो पहली बार 2010 के जुलाई-अगस्त महीने में मैंने उसे यू-स्पेशल बुक शॉप में देखा था । सेतु ने बताया था कि यही शशि शेखर है। इसी के बी.ए. फस्ट इयर में 80 % के लगभग अंक आए हैं। हिन्दी में इतने अंक लाना बहुत बड़ी बात है। वह टहलते हुए रैक पर किताबें देख रहा था। मैं उसके पास गयामैं ने पूछा- कैसे और क्या लिखते हो कि इतने अंक आ जाते हैं उसने थोड़ा मुस्कुराते हुए बहुत धीमे से कुछ कहा था। उसने क्या कहा तब भी मैं समझ नहीं सका था या अब मुझे याद नहीं है। उसके चेहरे के एक्सप्रेशन से जरूर महसूस हुआ था कि ऐसे सवाल सुन-सुन कर वह ऊब चुका है।

एम.ए.(हिन्दी) की हमारी क्लासेज फैकल्टि ऑफ आर्ट्स में हुआ करती थी। एनरॉलमेन्ट हिन्दू कॉलेज में था। हिन्दू कॉलेज के छात्रो से खास कर अंडर ग्रेजुएट छात्रो से परिचय न के बराबर था। शहीद भगत सिंह कॉलेज का मेरा मित्र सेतु उसी साल (2010 में) माइग्रेशन कराकर बी.ए.(हिन्दी ऑनर्स) थर्ड इयर में हिन्दू कॉलेज आ गया था। मेरे विपरीत उसमें घुलने-मिलने की भारी क्षमता है। वह और शशि भी काफी घुल-मिल गए थे। सेतु बताया करता था कि शशि शेखर जिनियस है। किसी में परफैक्शन नहीं हो तो उसे 80% अंक नहीं आ सकते हैं, यह मैं अपने अनुभव से जानता हूँ। मैं ने उसकी लिखी कविताएँ और लेख हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग की दीवार पत्रिका पर देखी थी। उसकी लिखावट बहुत सुंदर थी। उसका व्यक्तित्व सौम्य था। उसके प्रति स्नेह और सम्मान दोनों आता था।
26 फरवरी 2011 को हिन्दू कॉलेज के हिन्दी विभाग ने एक दिन के लोकल ट्रिप का कार्यक्रम रखा था। एम.ए. के छात्र भी जा सकते थे। मैं गया था। लोदी गार्डेन, मुगल गार्डेन और हिरण पार्क मे हम लोग घूमने गए थे। वे लोग जो परिवार के साथ रहते हैं अपने घरों से ज्यादा भोजन लेकर आए थे। ज्यादा इसलिए कि उसमें हम जैसे लड़के-लड़कियों का हिस्सा भी था जिनके लिए भोजन बना कर ला पाना कठिन था। लोदी गार्डेन में हम लोग खाने बैठे थे। मेरे बगल में सेतु और उसके बगल में शशि बैठा था। वह अल्प भोजी नहीं था। वह जितनी धीमी गति से बोला करता था, उतनी ही धीमी गति से खाता भी था। सबके खाकर उठ जाने के कुछ देर बाद ही वह उठा था। सेतु ने उससे मजाक में कुछ कहा भी था ।

उसके साथ सबसे अधिक समय तब बीता था जब हम कथाकार उदय प्रकाश के यहाँ गए थे। हिन्दू कॉलेज वाली ट्रिप से ठीक एक दिन पहले यानी 25 फरवरी 2011 को। हिन्दू कॉलेज की वार्षिक पत्रिका- इन्द्रप्रस्थके लिए उन से साक्षात्कार लेने कॉलेज से एक टीम गयी थी। शशि के अलावा अनुपमा, अदिति, असीम, संजीव और सेतु के साथ मैं भी था। वह उस दिन उत्साह में  था। लेकिन उदय प्रकाश के साथ दो-तीन घंटे तक चले साक्षात्कार में वह एक भी सवाल नहीं पूछ सका था। लौटते हुए इसका उसे मलाल था। संभवतः हम लोगों द्वारा लगातार पूछे जा रहे सवालों के बीच अपने विनम्र और संकोची स्वभाव के कारण वह सवाल नहीं पूछ पा रहा था। बाहर आकर उसने प्रतिक्रिया दी। असीम तो आलोचना पर ही उन्हें घेरे हुए था। आप तो रेपिड फायर राउंड लेकर बैठ गए- सेतु से कहा। मेरे लिए कहा- भैया भाषा के सवाल पर ही अटके रहे। उसकी प्रतिक्रिया बता रही थी कि हम सब ने अच्छा साक्षात्कार नहीं लिया है। मैं ने उससे कहा था कि कुछ तुम्हारे सवाल थे तो तुम्हें पूछना चाहिए था न, तुम चुप क्यों रहे ? शायद उसने कहा था कि आप लोगों ने मौका ही कब दिया या उसने कोई जवाब नहीं दिया था।
उदय प्रकाश का यह दो-तीन घंटे का साक्षात्कार हमने रिकॉर्ड किया था। इसे लिपिबद्ध करना आसान नहीं था। इसके कई अंशों को एडिट भी करना था। इस काम में शशि को किसी से खास मदद नहीं मिल सकी थी। इस तरह मेहनत का यह काम उसने अपने ही बूते किया था। 'इन्द्रप्रस्थ' में वह साक्षात्कार छप कर आया। उसने बहुत सारे अंश अपने विवेक से हँटा दिए थे। उदय प्रकाश के उत्तर में से मुख्य अंश को छाँटकर उसने उसकी भाषा को भी दुरूस्त कर दिया था। इसे पढ़ते हुए मुझे लगा था कि यह लड़का संभावनाओं से भरा हुआ है। यह भविष्य मे बहुत बेहतर करेगा।

शशि से मेरी कभी लम्बी अनौपचारिक बातचीत नहीं हुई थी। बाद में जब वह मिलता तो हालचाल या मुस्कुराहट भर से हमारा काम चल जाता था। वह कम से कम बोला करता था। अपने निकट के लोगों से सम्भव है वह खुल कर बोलता हो। वामपंथी छात्र संगठन आइसा से जुड़े सन्नी ने मुझे बताया था कि शशि फस्ट इयर में इस छात्र संगठन में बेहद सक्रिय रहा था। वह ट्यूशन पढ़ाया करता था। लौटते हुए उनसे अक्सर समसामयिक विषयों पर बहस किया करता था। लेकिन सेकेन्ड इयर में उसकी सक्रियता धीरे-धीरे कम होती गयी। सन्नी का मानना है कि वह कैरियर का दबाव महसूस करने लगा था। सेकेंड इयर का परीक्षा परिणाम उसकी आशा के अनुरूप नहीं था। ऐसे में सांगठनिक सम्पर्क से उसने खुद को पूरी तरह से काट लिया था। बहुत संभव है कि इसके कारण वैचारिक द्वंद्व से उपजे हुए हों।

इस दुखद घटना से कुछ महीने पहले मैंने शशि शेखर के फेसबुक वाल पर यूजीसी के एक स्कालरशिप योजना का लिंक शेयर किया था। यह स्कॉलरशिप विश्वविद्यालय में पढ़ रहे एम.ए. के उन विद्यार्थियों के लिए था जो बी.ए. में विश्वविद्यालय का रेंक होल्डर रहा हो। लिंक के साथ मैंने लिखा था- तुम्हारे लिए। उसने प्रतिक्रिया दी थी- SO SWEET OF YOU BHAIYA!!
संभवतः उससे अंतिम भेंट फैकल्टि ऑफ आर्ट्स में हुई थी। वह चलते हुए मिल गया था। मैंने उससे स्कॉलरशिप फॉर्म भरा या नहीं यह पूछा था। वह मेरी बात ठीक से समझ नहीं सका था। जब उसने समझा तो धीरे से कहा- हाँ, भर दिया।

शशि का इस तरह चला जाना बहुत टीस देता है। न्यूज चैनलों और अखबारों में पुलिस के हवाले से उसके नोटबुक में लिखे जिन पंक्तियों को उसके सुसाइड नोट के रूप में दिखाया गया वह था : It’s my story: Can we do nothing for the dead? And for a long time the answer has been nothing’ *
[यह मेरी कहानी है : क्या हम मृतकों के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं ? और लम्बे समय से इसका उत्तर है- कुछ भी नहीं।]
दरअसल यह निर्मल वर्मा की कहानी परिंदेका एक अंश है, इसके वाक्यांश It’s my story को छोड़कर।  कहानी की शुरुआत कैथरीन मेन्सफील्ड के इसी वाक्य को कोट करते हुए की गयी है। यह कहानी शशि की कक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। ऐसे में इसे सुसाइड नोट कहना कितना उचित है ? हालाँकि It’s my story का लिखा होना, जैसा कि अखबारों में बताया गया है, खटकता है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह नोटबुक जिस छात्र का था, वह बहुत क्रियेटिव था। कुछ अनाम प्राध्यापकों के हवाले से यह भी छापा गया था कि वह मृत्यु के बाद के जीवन पर लगातार शोधरत था। उसने एक-दो दिन पहले कुछ प्राध्यापकों से इस विषय पर लम्बी चर्चा भी की थी। ये खबरें भी अपुष्ट हैं। और इसे नोटबुक में लिखी पंक्तियों के आगे की मनगढ़ंत कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।


13 मार्च 2012 को हस्ताक्षर पत्रिका के लिए साक्षात्कार के क्रम में कुंवर नारायण के साथ।
शशि शेखर मेधावी था। उससे इर्ष्या की जा सकती थी। उस पर गर्व किया जा सकता था। वह कविताएँ लिखा करता था। मैंने सुना है वह नियमित डायरी लिखा करता था। उसे पत्र लिखने में भी रूचि थी। मैं दृढ़ विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इतनी कम उम्र में भी उसके विचार जहाँ दर्ज होंगे महत्व के होंगे। शशि की जिनसे भी अनौपचारिक बातचीत होती थी वे उसकी वैचारिकी को अपनी स्मृति के सहारे कलमबद्ध कर सकें तो बड़ी बात होगी। उसकी डायरी और पत्र प्रकाश में लाये जा सके तो उसकी प्रतिभा से लोग परिचित हो सकेंगे। उसके असाइनमेंट्स भी महत्व के होंगे।** कुछ ऐसे संस्मरण जो उसकी मनोदशा की पड़ताल करे, लिखे जा सके तो एक बड़ा भ्रम खत्म होगा। यह सब काम शशि के करीब रहे लोगों को करना चाहिए। उससे तो बहुत सारी शिकायतें हैं। जो कम बोला करते हैं उन्हें ऐसे चुपचाप नहीं चल देना चाहिए। उसके साथ एक बड़ी सम्भावना का अंत हो गया। उसकी वैचारिकी और सृजन को सहेजा जा सका तो उसके लिए बड़ी श्रद्धांजलि होगी।


* शशि शेखर से जुड़ी खबरें :
2. नवभारत टाइम्स

** हिन्दू कॉलेज की वे पत्रिकाएँ जिन से शशि का गहरा जुड़ाव रहा है उन पत्रिकाओं को शशि की रचनात्मकता को सामने लाने का कार्य जरूर करना चाहिए।

शशि शेखर की  कुछ प्रकशित रचनाओं के लिंक :
1. शब्दों में छिपी रोशनी : नरेश सक्सेना के कविता संग्रह 'सुनो चारुशीला' की समीक्षा / जनसत्ता,14 अक्टुबर 2012
2. बतकही के बहाने : स्वयं प्रकाश के साक्षात्कारों के संकलन 'और फिर बयाँ अपना' की समीक्षा / जनसत्ता, 15 जनवरी 2012
[सारी तस्वीरें शशि शेखर (Shashi Shekharके फेसबुक प्रोफाइल से से ली गयी हैं।]