Sunday, November 11, 2012

अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव और हमारी औपनिवेशिक मानसिकता

साभार : dishtracking.com
अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव सम्पन्न हो चुका है। रोमनी की हार हुई है और ओबामा फिर से राष्ट्रपति चुने गए हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया भारत में भी एक ख़ास तरह का माहौल तैयार करती है। मीडिया में तरह-तरह से इसका विश्लेषण होता है। विश्लेषण जिस वैचारिकी के आधार पर की जाती है, उसका असर जनमानस पर भी पड़ता है। यह चर्चा का विषय बना रहता है कि किसके राष्ट्रपति बनने से भारत को ज़्यादा फ़ायदा होगा। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति की नीतियाँ दुनिया भर के देशों को प्रभावित करती हैं। विचारणीय यह है कि यह प्रभाव कितना सही है। कम से कम हमारे विश्लेषण का वर्तमान तरीका  इसे सही ही ठहराता है। अर्थ और सामरिक शक्ति के केन्द्र के रूप किसी एक देश का या कुछ देशों का स्थापित होना, दुनिया भर केलिए ख़तरनाक है। किसी प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र के द्वारा इसकी संस्तुति और भी ख़तरनाक है। देश की जनता सबसे अधिक देश की मीडिया से प्रभावित होती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की विदेशनीति के मामले में हमारे यहाँ मीडिया प्रायः आलोचनात्मक रुख़ अख़्तियार नहीं कर पाती है। ऐसे में अमेरिका को लेकर देश की सत्ता की सोच ही मीडिया में प्रतिबिम्बित होती है। अमेरिकामुखी होना हमारे यहाँ सत्ता की सोच का बुनियादी हिस्सा बन चुका है। इस सोच ने औपनिवेशिकता का नया मुहाबरा रचा है। इसकी जड़ की तलाश देश की आर्थिक नीतियों पर जा कर ख़त्म होती है। हमारी अर्थव्यवस्था पर पूँजी का दबाव जिस रफ़्तार से बढ़ना शुरू हुआ, हमारी रीड़ की हड्डी उसी रफ़्तार से झुकती चली गयी  जबकि नब्बै के दशक में मनमोहन के आर्थिक उदारवादी मॉडल ने तो हमारी रीड़ की हड्डी तोड़ कर रख दी। सार्वजनिक उपक्रमों को तबाह करने की साज़िश के बीच निजीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश की सुविधाओं का जो झुनझुना देश की जनता को पकड़ाया गया, वह हमें अमेरिका जैसे देश का आर्थिक उपनिवेश बना देने केलिए काफ़ी था। आज अमेरिका का उसकी अर्थनीति को लेकर किया गया मामूली फैसला भी हमारे हितों को प्रभावित करता है।

ऐसे में यह सोचना ज़रूरी है कि जो हो रहा है वह हमारे लिए कितना ख़तरनाक है। देश की मीडिया का भी यह दायित्व है कि जनता को देश की विदेश नीतियों व आर्थिक नीतियों के प्रभावों-कुप्रभावों को लेकर जागरूक बनाए। वैसे बड़े पूँजी घरानों से पोषित या उसके दबाव में काम करने वाली मीडिया से तो इसकी उम्मीद नहीं ही की जा सकती है। समानांतर मीडिया ही यह काम भी कर सकती है। देश की जनता जब देश की आर्थिक, सामरिक व विदेश नीतियों का सच समझकर मतदान करेगी तभी देश सही अर्थों में समप्रभु हो सकेगा। हमारी समप्रभुता आर्थिक और सामरिक साम्राज्यवादी नीतियों के पुरजोर विरोध से पुष्ट होगी। यह बहुत ज़रूरी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को एक राष्ट्र का उसके राष्ट्राध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया से अधिक कुछ भी न समझा जाए। जबतक इसे इससे अधिक समझा जाता रहेगा तब तक यह हमारे औपनिवेशिक मानसिकता को प्रकट करता रहेगा। इस मानसिकता से मुक्ति तभी मिल सकेगी जब हम सत्ता के रूप में सही सोच को चुनेंगे और उस पर यह दबाव बनाए रखेंगे कि आर्थिक,सामरिक और विदेश नीतियों पर भी उसे जनता की अपेक्षा पर खरा उतरना है।

Thursday, September 13, 2012

सवाल हमारी आलोचनादृष्टि का भी है

असीम त्रिवेदी का एक कार्टून जिसपर विवाद है।
साभार: Frontierindia
यह ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए; कि असीम से जुड़े कार्टून विवाद पर लिखना असीम के प्रति सहनुभूति है. इसकी ज़रुरत भी नहीं है. सवाल किसी पक्ष में खड़े होने की है और अपने भीतर के सारे उपापोह ख़त्म कर इस तरह खड़ा होना ज़रूरी है. अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीनने का हक़ हम किसी को नहीं दे सकते हैं. लेकिन यहाँ सिर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल नहीं है. एक बड़ी समस्या कला की ग़लत व्याख्या से पैदा हो रही है. बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबक़ा असीम पर लगाये गए राजद्रोह के आरोप का विरोध कर रहा है. लेकिन यह तबक़ा ऐसा मान कर चलता है कि असीम ने अपनी अभिव्यक्ति केलिए राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमानजनक पयोग किया है;जो एक नैतिक अपराध है. दरअसल कला की सीमा को निर्धारित करने का यत्न किया जा रहा है. यह प्रयास नया नहीं है. हमेशा से होता आया है. मसलन साहित्य की जनोन्मुखता रीतिकाल में ग़ायब रही. यह गायब हुयी नहीं थी; बल्कि की गयी थी. कला और साहित्य को उस समय इसी ढंग से परिभाषित किया जाता था. काव्यशास्त्र और नायिकाभेद तक साहित्य और कला का सौंदर्य अक्षुण्ण है; ऐसा मान लिया गया था. आधुनिक काल में इसे तोड़ा गया. ऐसे ही सौंदर्य के कई बने-बनाये प्रतिमानों का भविष्य में तोड़ा जाना तय होता है.

हमारे सौंदर्यबोध का अस्सी फ़ीसदी हिस्सा हमारे परिवेश से ही निर्मित होता है. और बचपन से ही हमें प्रतीकों से प्रेम करना सिखाया जाता है. ख़ासतौर पर धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतीकों से. प्राय: उम्र बढ़ने के साथ-साथ हम अपनी व्यक्तिगत सौन्दर्याभिरूची विकसित करने का प्रयास करते हैं. इस क्रम में हमारी समझदारी कई चीजों को लेकर बदलती है. विशेष कर धार्मिक प्रतीकों को लेकर. इसकी वज़ह यह है कि धर्म को लेकर प्रगतिशील चिंतन की परंपरा बहुत मज़बूत हैं. लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों व राष्ट्रवाद पर ऐसी ही चिंतन परंपरा का अभाव है. जो चिंतन उपलब्ध हैं; वे हमें भाते नहीं हैं. ऐसे में सारी कट्टरता हम छोड़ते भी जाते हों; तो राष्ट्र को लेकर हमारी कट्टरता कमोवेश बची रहती है. हम देश के प्रति भावुकता व प्रेम की आड़ में कैसे कट्टर होते जाते हैं; पता ही नहीं चलता है. हम पड़ोसी देश की हरक़तों से तंग आकार सोचते हैं कि यह तो सरकार निक्कमी है; वर्णा हमारी सेना को पड़ोसी देश तबाह करने में घंटा भर भी नहीं लगेगा. आश्चर्यजनक यह है कि ऐसा सोचते हुए हमें उस देश के अपने ही जैसे लोगों का बिल्कुल भी ख़्याल नहीं आता है. अब यह मानसिकता सांप्रदायिक कट्टरता से किस तरह से अलग है; जिसके प्रभाव में किसी एक मोहल्ले की दुर्भाग्यपूर्ण घटना या इस संदर्भ में फैलाया गया अफ़वाह किसी दूसरे मोहल्ले में निर्दोष लोगों के ख़ून से अंजाम तक पहुँचाई जाती है. कट्टरता हमेशा कोरी भावुकता के आड़ में पनपती है. सीमापार आतंकवादियों को भी इसी आधार पर तैयार किया जाता है.

असीम त्रिवेदी से जुड़े कार्टून प्रकरण में हमारी कट्टर मानसिकता और कला के प्रति व्यवस्थित आलोचनादृष्टि के आभाव का ज़बरदस्त असर रहा है. कार्टून में निहित भावना की उचित व्याख्या किये जाने के वज़ाय प्रतीकों के दुरूपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बहस ही हावी रहा. संभवत: ऐसी ही बात कविता या कहानी में कही जाती तो बुद्धिजीवियों को उसके पक्ष में खड़े होने में दिक्कत नहीं होती. मसलन नागार्जुन की पंक्ति- बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू केया धूमिल की पंक्ति- हमारे यहाँ संसद तेली की वह घानी है / जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है” ; इन पंक्तियों को हम यथास्थिति का सटीक वर्णन कहने में संकोच नहीं करेंगे. लेकिन इन्ही भावनाओं का कार्टून रूपांतरण हमें राष्ट्रपिता व संसद का अपमान लग सकता है. सच तो यह है कि कला को लेकर हम में से ज़्यादातर लोगों की समझ बहुत विकसित नहीं है. साहित्य में जिस तरह आलोचना की परंपरा रही है; कला में वैसी ही आलोचना की परंपरा नहीं है. ऐसे में किसी कार्टून को तार्किक ढंग से समझने की ज़रूरत हमें महसूस नहीं होती है. क्या असीम ने कार्टून को जिन प्रतीकों के माध्यम से उठाया है; वह सर्वथा वर्जित है या होना चाहिए? क्या असीम के ये विवादास्पद कार्टून अभिव्यक्ति की दृष्टि से गहरा अर्थ नहीं रखते हैं? असीम ने जिन राष्ट्रीय प्रतीकों की दुर्दशा दिखाई है; वह उनका नहीं वल्कि किसी और का कमाल है. राष्ट्रीय प्रतीकों को संविधान निर्माताओं ने देशवासियों की भावनाओं से जोड़ कर ही स्वीकृत किया था. उन भावनाओं के साथ हो रहे खिलबाड़ ने राष्ट्रीय प्रतीकों की जो दशा की है; असीम ने उसे दिखाया है. देश की दुर्दशा को  दिखाने केलिए राष्ट्रीय प्रतीकों की दुर्दशा को प्रतीक के रूप में दिखाना प्रभावी सृजनशीलता का नमूना है. बड़े तबक़े में एक बौखलाहट देखी जा सकती है. बेहतर तब होता जब प्रतीकों की इस दुर्दशा को देखकर आहत हुए लोग; इसमें निहित देश की दुर्दशा से इतने ही आहत होते. कला को लेकर हमारी अपरिपक्व समझ और हमारी कट्टरता ने अभिव्यक्ति की सीमा निर्धारित करने का जो प्रयास किया है; वह हमारे लिए ही ख़तरनाक सवित होगा.  हमें सोचना चाहिए कि क्या सत्यमेव जयते की भावना पर असत्यमेव जयते या भ्रष्टमेव जयते की भावना हावी नहीं हो गयी है? क्या सत्य की सुरक्षा को सुनिश्चत करने का आश्वासन देते सिंह भेड़िये जैसे धुर्त नहीं हो गए हैं ? क्या संसद भवन में सांसदों के अभद्र आचरण पर हमें शर्म नहीं आती है ? क्या हमें नहीं लगता कि हम सबकी भावनाओं से निर्मित जो हमारा देश है; उसके साथ रोज बलात्कार हो रहा है? कार्टून दृश्य विधा है. हमारी कही गयी बातों की अपेक्षा ज़्यादा मुखर. इसलिए कार्टून में यही अभिव्यक्ति हमें अखड़ती है. इसी विषय वस्तु का यदि फिल्मांकन किया जाये तो बहुत संभव है कि कोरी भावुकता से भरे कट्टर लोग हिंसा तक पर उतारू हो जाएँ. सच तो सिर्फ सच होता है. अभिव्यक्ति की विधा अलग अलग हो सकती है. असीम ने अभिव्यक्ति की विधा के तौर पर कार्टून को चुना है. निश्चत तौर पर यह ज्यादा बेधने वाली विधा है. असीम ने सच को कलाभिव्यक्ति भर दी है. तमाम विसंगतियों के बीच हम यशपाल की कहानी परदाकी तरह अपने प्रतीकों के परदे से ढँके नहीं रह सकते. हमें यह सोचना ही होगा की हमारे सारे प्रतीक किस तरह हमारे और हमारे देश चलाने वालों के आचरण से अपना अर्थ और स्वरूप खोते जा रहे हैं. असीम ने इसी को व्यक्त करने का प्रयास किया है. बहुत ज़रूरी है कि हम असीम के बनाए कार्टूनों की तरह; प्रतीकों के संवेदनशील चरित्र पर भी विचार करें. हमें यह ध्यान रखना चाहिए की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नगाड़े बजा कर भी कहीं हम कला को नष्ट करने का ख़तरनाक तरीका तो नहीं चुनते जा रहे हैं ! बहुत ज़रुरी है कि कला की सुदृढ़ आलोचना परंपरा का विकास हो. अन्यथा कला को लेकर हमारी उथली समझ; कला की सीमा निर्धारित करने का औज़ार बन जाएगी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हुए भी असीम के कार्टून की निंदा करना; प्रगतिशीलता और कला को लेकर हमारी समझ का द्वन्द्व ही है. असीम ने प्रतीकों में निहित भावना और वर्तमान परिस्थिथि में उस भावना की नियति का विरोधाभास (कंट्रास्ट) दिखाने में ज़बरदस्त सफलता पाई है. यह बेहिचक कहा जा जा सकता है कि वे बेहद प्रतिभाशाली कार्टूनिस्ट हैं. और मुक्तिबोध की उस भावना का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जो अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की बात करता है.

असीम के कुछ इंटरव्यू देखने के बाद उनहें अपरिपक्व व बचकाना कहने का सबको मौका मिल गया है. यह बात सही भी है की असीम ने कई अगंभीर बातें भी की हैं. वे अपनी परिपक्वता का प्रदर्शन नहीं कर सके हैं. लेकिन अपने कार्टून में राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर उनका पक्ष बहुत स्पष्ट है. हमें भी असीम की अभिव्यक्ति को उनके कार्टून में ही ढूँढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. असीम अपनी भावना को बेहद तार्किक ढंग से बोल कर अभिव्यक्त कर सकें; तभी उनके कार्टून की प्रासंगिकता है; हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए. असीम बहुत बौद्धिक हों; यह भी जरुरी नहीं है. वे अपने निजी जीवन में व्यवहार कुशल और अच्छे इन्सान हों; इसकी भी हमें अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. असीम की भावनाएँ सबसे बेहतरीन ढंग से उनके कार्टून में मुखर होती है. और कार्टून की सार्थक व्याख्या ही असीम की भावनाओं और विचारों से हमें जोड़ सकती है.


यह कहना भी सही नहीं है कि असीम ने रातों-रात प्रसिद्द हो जाने का आसान रास्ता चुना है. असीम के ये विवादास्पद कार्टून ताज़ा नहीं हैं. इन्हें बनाते हुए असीम को ऐसा ज़रुर लगा होगा कि लोग ज़्यादा आकर्षित होंगे. देशद्रोह का मुक्कदमा उनपर दायर किया जाएगा और उनकी ग़िरफ्तारी होगी ऐसी कल्पना तो कम से कम उन्होंने भी नहीं की होगी. दरअसल देशद्रोह के मुक्कदमे ने उन्हें बहस के केंद्र में लाने का काम किया है. और अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने की हिम्मत ने उन्हें लोकप्रियता दी है. कुछ स्टंटबाजों की आड़ लेकर अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने वाले लोगों को स्टंटबाज कहने की जो परंपरा विकसित हो रही है; वह ग़लत है. किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले गहराई से विश्लेषण करना आवश्यक है.

Tuesday, September 11, 2012

असीम त्रिवेदी तो कलानुवादक भर हैं : एक छोटी सी टिप्पणी

साभार :indiatoday.intoday.in*
असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी और उनके कार्टून को लेकर कुछ ग़ैरजिम्मेदार बौद्धिक बहसों से गुजरते हुए लगा कि राष्ट्रीय प्रतीक पता नहीं किस लोक से उतार कर भू -लोक के भारतवासियों से इंट्रोड्यूस कराये गए हैं . प्रतीकों की श्रेष्ठता जीवन से ज्यादा दिखने लगे; और आलोचक व मीडिया उसकी व्याख्या इसी तरह करने लगे तो समझना चाहिए कि दुर्दिन आ गए हैं !
तय है कि ये प्रतीक हमारी भावनाओं के प्रतिनिधि के तौर पर निर्मित किये गए होंगे. लेकिन जब भावनाएं लगातार आहत हो रही हों; तब प्रतीकों के क्या मायने रह जाते हैं!! रघुवीर सहाय ने अपनी कविता अधिनायक में लिखा है :
राष्ट्र गीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है / फटा सुथन्ना पहने जिसके गुन हरचरना गाता है !!
नागार्जुन ने तो राष्ट्रपिता गाँधी को भी नहीं छोड़ा : बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के !!
अब इन दोनों काव्यांशों की कल्पना कार्टून के रूप में करें तो असीम आपको कहीं से अराजक नहीं लगेंगे. किसी को रघुवीर और नागार्जुन ही अराजक लगते हों; फिर कोई बहस ही बेकार है !!
असीम के कार्टून को मैं अलग नज़रिये से समझता हूँ. यह प्रतीकों में निहित मूल भावना और वर्तमान परिदृश्य के कंट्रास्ट को दिखाता है . वर्तमान का प्रतीक यही हो सकता है . असीम ने कलानुवाद भर किया है ; कृतिकारों को तो हम सब बखूबी पहचानते हैं !!


[*असीम त्रिवेदी का विवादास्पद कार्टून जिसकी वज़ह से उन्हें 9 सितम्बर 2012 को गिरफ़्तार किया गया था।]

Sunday, September 2, 2012

दिल्ली विश्वविद्यालय में सुरक्षा और लोकतंत्र का संकट

फैकल्टी आफ आर्ट्स, दिल्ली विश्वविद्यालय
साभार:
www.indiaafricaconnect.in
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव चौदह सितम्बर को होना है. इसी सिलसिले में शुक्रवार;31-08-2012 को विश्विद्यालय के उत्तरी परिसर में छात्र संगठन एनएसयूआई ने एक रैली का आयोजन किया था. कई बसों में भरकर स्कूली लड़के और आवारा क़िस्म के युवाओं को जमा किया गया था. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ देर केलिए कैम्पस में आतंक का माहौल पसर गया था. इन लोगों ने जम कर हंगामा किया. आते जाते छात्रों से बदतमीजी और छात्राओं को प्रताड़ित करने की बहुत सारी घटनाएँ सामने आयीं लेकिन पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहा. एनएसयूआई व इसी की तरह विचारहीनता के शिकार कुछ अन्य छात्र संगठनों द्वारा अराजकता का ऐसा प्रदर्शन इस विश्वविद्यालय केलिए कोई नया अनुभव नहीं है. विश्वविद्यालय प्रशासन से इन्हें शह मिलता रहा है; यह भी किसी से छुपा हुआ नहीं है.
अधिक चिंताजनक एक और विषय इसी घटना की आड़ में पैदा हुआ है. दिखावे में माहिर विश्वविद्यालय के उपकुलपति दिनेश सिंह की पहल पर शनिवार; 01-09-2012 को छात्रो-अविभावकों का उनके साथ सवाल-ज़वाब का एक कार्यक्रम विश्वविद्यालय रग्बी ग्राउंड में रखा गया था. उनके उत्साह का रंग-भंग तब हुआ जब इन्द्रप्रस्थ कॉलेज की एक छात्रा ने एनएसयूआई की उक्त रैली का ज़िक्र करते हुए; अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की पीड़ा सुनाई और विश्वविद्यालय प्रशासन से कैम्पस के असुरक्षित माहौल को लेकर सवाल किये. इस मुद्दे पर  उपकुलपति को काफ़ी फजीहत झेलनी पडी. घिर चुके उपकुलपति ने जल्दी ही कोई ठोस कदम उठाने का आश्वासन दिया. शाम के छः बजे तक मीडिया के ज़रिये यह खबर आने लगी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कैम्पस में किसी भी तरह की रैलियों और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी है.*
अब विचारणीय यह है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उठाया गया यह कदम न्यायोचित है? प्रशासन ने आनन-फानन में अपने नाकारेपन को ढांपने की असफल कोशिश की है या इसमें उसका कोई निहित उद्देश्य है?
विश्वविद्यालय परिसर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. छात्रसंघ चुनाव के दौर में विश्वविद्यालय प्रशासन रैलियों और प्रदर्शनों की वीडिओग्राफी भी करवाता है. वीडिओ फुटेज के सहारे दोषी लड़कों को चिह्नित किया जा सकता है. उन पर कानूनी कारवाई की जा सकती है. मौके पर मौज़ूद मूकदर्शक बने पुलिसकर्मियों पर शिकंजा कसा जा सकता है. भीड़ की अगुआई करने वाले छात्र नेताओं को दण्डित किया जा सकता है. यहाँ तक कि उनमे से छात्रसंघ चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को नामांकन तक से रोका जा सकता है. ऐसा करके अराजक तत्वों को एक कड़ा सन्देश दिया जा सकता है. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है.
पिछले कुछ दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन का रबैया घोर अलोकतांत्रिक रहा है. जिसतरह उपकुलपति और उनकी टीम के उनके विश्वस्त मनमाने ढंग से फैसले ले रहे हैं; शिक्षकों-छात्रों में भारी रोष है. ऐसे में विरोध के स्वर लगातार मुखर हो रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन इन विरोधी स्वरों को दवाने का लगातार प्रयास कर रहा है. कुछ हालिया उदाहरण हमारे सामने हैं. जबकि सेमेस्टर प्रणाली को भारी विरोध के बावजूद लागू करवाने और अब उसकी खामियों के लगातार सामने आने की बात ज्वलंत ही है; कुछ दिनों पहले मेटा यूनिवर्सिटी कांसेप्ट को आपात बैठक के माध्यम से स्वीकृत करवाने के बाद इसे मीडिया के माध्यम से प्रसारित कर दिया गया. विश्वविद्यालय के शिक्षकों-छात्रों को इस मामले विल्कुल विश्वास में नहीं लिया गया.** प्रगतिशील तबके में यह कांसेप्ट संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है. इसे सरकारी युनिवर्सिटियों में प्राइवेट युनिवर्सिटियों की बैकडोर एंट्री की पूर्वपीठिका माना जा रहा है. बीते 24 अगस्त को शिक्षकों छात्रों का एक समूह इस मामले में अपनी आपत्ति दर्ज कराने उपकुलपति कार्यालय के नजदीक पहुंचना चाहता था . कथित तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार ऐसे किसी दल को पुलिस बैरिकेड लगाकर रोका गया.*** प्रशासन से विरोध जताने केलिए 28 अगस्त को हुए शिक्षकों के हड़ताल से भी फासिस्ट तरीके से निपटा गया.**** यहाँ तक कि उन शिक्षकों-छात्रों को चिह्नित कर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर धमकाए जाने का मामला भी प्रकाश में आया है; जो प्रशासन की तानाशाही के विरोध में किये गए प्रदर्शनों का हिस्सा रहे हैं. लेकिन इसी दौर में एनएसयूआई और एबीवीपी जैसे संगठनों को रैलियों प्रदर्शनों की खुली छूट दी गयी थी. 31 अगस्त को कैम्पस में इसी का एक नजारा दिखा था. ऐसे में प्रशासन की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है. जिस तरह से उपकुलपति दिल्ली विश्वविद्यालय को बाजारीकरण और अपने उटपटाँग प्रयोगों का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं; प्रगतिशील ताक़तों के द्वारा उनके विरोधों के तीव्रतम होते जाने की आशंका उन्हें भी है. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि प्रशासन की निगाहें कही और हैं और निशाना कहीं और लगाया गया है. विरोध प्रदर्शनों की संस्कृति को नष्ट कर; प्रशासन अपने नापाक इरादों के रास्ते के सारे अवरोध हँटा देना चाहता है. बीते कई सालों का अनुभव कहता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को अराजक रैलियों से कोई परेशानी नहीं है. परेशानी होती तो यह परंपरा अब तक फलती फूलती नहीं. प्रशासन को दिक्कत है; तो उन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से है; जो मुद्दों के आधार पर प्रशासन को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं.
प्रशासन के इस अप्रत्यक्ष आपातकाल का विरोध नहीं होगा; यह भ्रम प्रशासन को भी नहीं होगा. संभवतः ऐसी स्थिति से निपटने के फासिस्ट तरीक़ों की तैयारी को भी अंतिम रूप दिया जा चुका होगा. बहरहाल रग्बी ग्राउंड में इन्द्रप्रस्थ कालेज की छात्रा द्वारा उपकुलपति को सुनाई गयी कटु आपबीती विश्वविद्यालय की किसी भी छात्रा द्वारा सुनाई जाने वाली इस तरह की अंतिम आपबीती हो; हम यह कामना भर कर सकते हैं. कैम्पस में असुरक्षा को लेकर उठाये गए उसके सवालों को हल करने की ग़ैरईमानदार और ग़ैरज़िम्मेदाराना कोशिश को तो बेनक़ाब होना ही है.



साभार साक्ष्य :

    *http://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Delhi-University-bans-rallies-after-molestation/articleshow/16163636.cms
  **http://www.deccanherald.com/content/265437/duta-opposes-vcs-meta-varsity.html
 ***http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/tp-newdelhi/article3819243.ece   ****http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/tp-newdelhi/article3825938.ece

Sunday, August 12, 2012

यह जनचेतना और जन आकांक्षाओं की हत्यायों का दौर है

यह खबर जनसत्ता(12 अगस्त 2012) के मुखपृष्ठ पर छपी है. 8 अगस्त को पश्चिम बंगाल के बेलपहाड़ी में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक जनसभा को संबोधित करने आयी थीं. शिलादित्य चौधरी नामक एक युवक ने उठकर उनसे सवाल पूछने की गुस्ताख़ी कर दी. सवाल था-किसान मर रहे हैं ; ऐसे में राज्य सरकार उनके लिए क्या कर रही है? आगे उसने टिपण्णी भी जोड़ दी कि सिर्फ झूठे वादे करना पर्याप्त नहीं है. मुख्यमंत्री को युवक का यह सवाल पूछना पसंद नहीं आया. गुस्से में आकार सरेआम उन्होंने उस युवक को माओवादी कहा और उसे गिरफ्तार करने का निर्देश दिया. पुलिस ने ग़ैरजमानती धारा लगाकर उसे अदालत में पेश किया. अदालत ने उसे चौदह दिनों के पुलिस हिरासत में भेज दिया. रेलमंत्री और ममता के ख़ास मुकुल राय ने ममता के बचाव की कोशिश की है. उनके अनुसार वह युवक सवाल करने के बजाय धमकी भरे अंदाज़ में चिल्ला रहा था. मुख्यमंत्री के जेड प्लस सुरक्षा बेड़े में उसने सेंध लगाई थी.* मुकुल की यह बात मान भी ली जाय तो 19 मई के सीएनएन.-आईबीएन के उस टीवी शो के लिए क्या सफाई दी जा सकती है; जिसका सीधा प्रसारण लाखों लोगों ने देखा था. एक छात्रा ने ममता से महिलाओं की लचर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल पूछा था. आवेश में ममता ने उसे माओवादी कहा और कार्यक्रम छोड़ कर चली गयी थीं.** ममता से जुड़े कार्टून विवाद का ज़िक्र भी इस क्रम में होना चाहिए. जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर अम्बिकेश महापात्रा ने ममता विरोधी कुछ कार्टून ईमेल के माध्यम से अपने मित्रो से शेयर किया था. गत अप्रैल महीने में तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने उन्हें बुरी तरह पीटा. इसे पर्याप्त नहीं समझा गया तो बाद में पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले गयी.***

दूसरी खबर उत्तर प्रदेश से है. यह 12 अगस्त 2012 के दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संस्करण के पृष्ठ 11 पर छपी है. चुनाव प्रचार के दौरान वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दसवीं और बारहवीं पास करने वाले छात्रों को टेबलेट और लैपटॉप देने का वादा किया था. लेकिन उनकी ताजपोशी के लगभग चार महीने बीत जाने के बावज़ूद भी उनका यह वादा पूरा नहीं हो सका है. ऐसे में दसवीं पास करने वाले एक ही गाँव के दो छात्रों धर्मेन्द्र यादव और मित्रसेन यादव को किसी श्रोत से अखिलेश का मोबाइल नंबर मिल गया. उत्साह से लवरेज इन छात्रों ने सीधे मुख्यमंत्री को फोन लगा दिया. मुख्यमंत्री ने फोन उठाया तो पूछा की ये दोनों चीजें कब तक मिलेंगी ? संभवतः फोन एकाधिक बार किया गया. इन छात्रों को मुख्यमंत्री से कोई संतोषप्रद ज़वाब या फोन कहाँ करना है सम्बन्धी सुझाव भले ही नहीं मिला हो; लेकिन एसटीएफ की कस्टडी ज़रूर मिल गयी. एसटीएफ की एक टीम संत कबीर नगर जिले के इनके गाँव चिलौना पहुँच गयी. अपराधियों को पकड़ने के अंदाज़ में इन दोनों को इनके घरों से उठा लिया गया. मुख्यमंत्री को सीधे फोन करना उनकी सुरक्षा में सेंध माना गया. पंद्रह घंटे की पूछताछ व दुबारा फोन न करने की हिदायत के बाद ही दोनों को छोड़ा गया.****

ये कुछ ऐसी घटनाएँ हैं; जिन्हें मीडिया कवरेज मिला है. ऐसी ही अन्य सभी घटनाओं के साथ ऐसा ही नहीं होता है.
रामलीला मैदान में 9 अगस्त की सुबह से बाबा रामदेव डट गए थे. मीडिया को इस बात की परवाह कैसे हो सकती थी की जनता कहीं और भी आंदोलित हो सकती है. हिन्दू जैसे कुछेक समाचार पत्रों को छोड़कर यह खबर कहीं नहीं दिखी. 9 अगस्त को आइसा और इनौस से जुड़े अठारह राज्यों से आए हजारों छात्रों-युवाओं ने पूर्व निर्धारित संसद मार्च को अंज़ाम देने की कोशिश की. जंतर मंतर से निकल कर संसद मार्ग पर बढ़ रहे युवाओं की संख्या इतनी ज्यादा थी की संसद मार्ग कुछ घंटों केलिए पूरी तरह से जाम हो गया था. इन लोगों की तीन मांगें थी. पहली की सामान शिक्षा को हमारा अधिकार बनाया जाय. दूसरी सम्मान के साथ सभी केलिए रोजगार सुनिश्चित किया जाय. तीसरी मांग थी भ्रष्टाचार और कोरपोरेट लूट को रोकने केलिए कारगर कदम उठाये जाय. यह जत्था अहिंसक ढंग से विरोध प्रदर्शन करते हुए संसद की ओर बढ़ रहा था. दो बेरिकेड इन युवाओं ने पार कर लिया. जोश भरे नारे लगाये जा रहे थे. तभी दिल्ली पुलिस और एसएसबी के जवानों ने बिना किसी चेतावनी के ताबड़तोड़ लाठी चार्ज शुरू कर दिया. इसमें कई युवा गंभीर रूप से चोटिल हुए; जिनमें कई छात्राएं भी शामिल थीं.***** क्या देश भर से आए इन छात्रों-नौज़बनों की इन जायज़ मांगों पर सरकार का कोई नुमाइंदा आकर उनकी मांगों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने का आश्वासन नहीं दे सकता था ? हक़ मांगने वालों से क्या सिर्फ सरकार की लाठियाँ ही बात कर सकती है ?

अन्ना आन्दोलन के क्रम में मंत्रियों,सांसदों,विधायकों के घर के बाहर धरना पर बैठे लोगों को भी लाठियां ही मिली थी. अपवाद ही कहीं कोई नेता घर से बहार निकला हो और लोगों से बात करने की दिलेरी दिखाई हो.

यह जनचेतना और जनआकांक्षाओं की हत्यायों का दौर है. स्थितियां ऐसी निर्मित की जा रही हैं कि  पढ़ाई;नौकरी व व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के अतिरिक्त किसी को कुछ और नहीं सूझे. कहीं अपवादस्वरूप जनचेतना या जनाकांक्षा उभर कर सामने आए तो उसे कुचल देना; सरकारी नीति का अहम हिस्सा बन चुका है. कोई नेता या नौकरशाह जनता की जरुरत जानने इस आशंका से बाहर नहीं निकलता कि ऐसे तो रोज-रोज कई मांगें उठने लगेंगी. शासन और प्रशासन के लोगों ने सार्वजनिक जिम्मेदारी कंधे पर लेने के बावज़ूद सार्वजानिक जीवन जीना छोड़ देने का अपराध किया है. ये दोनों कुनबे ऐसे लोगों के द्वारा संचालित हो रहे हैं; जो नितांत रूप से व्यक्तिगत,स्वार्थी और अहंकारी हैं. आश्चर्यजनक रूप से जनतंत्र उनकी इन प्रवृतियों को फलने-फूलने की सुविधाएँ उपलब्ध करा रहा है. जनता और जनता के हित के मुद्दे सिर्फ़ चुनावी विषय बन कर रह गए हैं. बाद में संसद सर्वोच्च होता है. इतना कि जनता कि आवाज़ वहां तक पहुँचे तो उसकी मर्यादा भंग होती है. हक़ का एक सवाल इसकी इयत्ता का संकट खड़ा कर देता है. एक आम आदमी के द्वारा की गयी आलोचना पर यह सर्वोच्च संस्था विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव पर तल्लीनता से बहस करता है. हम इस ख़ुशफ़हमी में नहीं जी सकते कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं. हमारे यहाँ लोकतंत्र की सीढ़ियाँ चढ़ सत्ता तक पहुँची ताक़तें अपना पूरा ज़ोर लोकतान्त्रिक संस्कृति को बर्बाद करने में लगा रही हैं. प्रशासन इसमें हमेशा से सहयोग करता रहा है. लोकतान्त्रिक मूल्यों की लगातार हत्याएं हो रही हैं. बचे मूल्यों की हत्या की ख़तरनाक साज़िशें रची जा रही है. हत्यारे निश्चिन्त हैं कि कोई कानून कोई जनांदोलन उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता.


साभार संदर्भ :



Friday, August 10, 2012

आत्मसाक्षी संकल्प

गुरु जी ने नवागंतुक विद्यार्थियों को एक-एक सुग्गा दिया. सुग्गे पिंजरे में बंद थे.गुरु जी ने कहा- तुम लोग आश्रम से बहार जाओ. सुग्गे को ऐसी स्थिति में मुक्त कर देना जब ऐसा करते हुए कोई न देख रहा हो. इस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कर आओ ; तब अध्ययन-अध्यापन का कार्य शुरू होगा.
एक विद्यार्थी को छोड़कर बाँकी एक-आध-दो दिनों में आश्रम लौट आये. सबने गुरु जी से उस क्षण का ब्यौरा सुनाया; जब उसने सुग्गे को मुक्त किया था. कइयों ने कहा- गुरु जी ऐसा एकांत बहुत मुश्किल से मिल सका; तभी तो एक से ज्यादा दिन लग गये. जो विद्यार्थी नहीं लौटा था; महीनों नहीं लौटा. आश्रम में पढ़ने पढ़ाने का कार्य शुरू हो गया. लौट कर नहीं आने वाले विद्यार्थी को प्रायः भुला ही दिया गया.
वह भादो की एक सुबह थी . मेघ छाये हुए थे. ठंडी हवा बह रही थी. हल्की बूंदा-बाँदी हो रही थी. गुरु जी की अगुआई में सारे विद्यार्थी आश्रम की खेत में काम कर रहे थे. कुछ घंटे बीते होंगे. एक फटेहाल किशोर उन्हीं की और बढ़ा आ रहा था. केश बेतरतीब ढंग से कंधे तक झूल रहे थे. उसके हाथ में एक पिंजरा था. पिंजरे में कोई पंछी. जिन विद्यार्थियों का ध्यान उधर गया; उन्होंने सोचा; कोई बहेलिया होगा. गुरु जी का ध्यान भी उस ओर गया. जैसे अचानक कुछ याद आ गया हो. विद्यार्थियों से कहा- तुम लोग काम में जुटे रहना; मैं अभी आया. गुरु जी उसी ओर लपके जिस ओर से वह किशोर चला आ रहा था. पास आते ही वह किशोर गुरु जी के पैरों पर गिर पड़ा. आंसू की बुँदे गुरू जी ने अपने पैरों पर महसूस की. बाजू से पकड़ कर उसे उठाया; पहचाना और छाती से लगा लिया. किशोर ने रुंधे गले से कहा- गुरु जी मैं सुग्गा को मुक्त नहीं कर सका ! अध्ययन के सौभग्य से वंचित ही रहूँगा अब !! आंसू थम नहीं रहे थे. गुरु जी ने स्नेह से कंधे थपथपाए . माथे पर हाथ फेरा. बोले- बहुत थके मालूम पड़ते हो. अच्छे से नहा-धो लो. भोजन का समय होने वाला है. खाकर आराम करना. शाम में हम बातें करेंगे.
शाम में बूंदा-बाँदी रुक चुकी थी. लेकिन मेघ अब भी तैर रहे थे. ठंडी हवा अब भी बह रही थी. मिट्टी की गंध हवा में घुल मिल गयी थी. गुरु जी बरगद के नीचे बने चबूतरे पर बैठे थे. विद्यार्थी नीचे दरी बिछाकर. वह विद्यार्थी जो आज आश्रम लौटा था; सबसे पीछे गुमसुम बैठा था. गुरु जी ने उसे बुलाया. स्नेह से अपने पास चबूतरे पर बैठाया. बोले- अब सुनाओ वत्स; तुम सुग्गा को क्यों नहीं मुक्त कर सके ?!!
विद्यार्थी के चेहरे पर उदासी आसानी से पढ़ी जा सकती थी. बाँकी विद्यार्थियों की ऑंखें उसी के चेहरे पर टिकी थी. स्तब्धता थी. थोड़ी ही देर में विद्यार्थी के चेहरे पर कई भाव आये और गये. उसने बोलना शुरू किया- गुरु जी; जब आपने पिंजरे में बंद सुग्गे; हमें सौंपे थे ; तब मुझे लगा था की आश्रम से बाहर जाते ही इसे मुक्त करने के लिए एकांत तलाश लूँगा और जल्दी ही लौट आऊंगा. लेकिन दिन का समय था. बहुत सारे पथिक आ जा रहे थे. ऐसे में मेरा सोचा संभव नहीं हो सका.
फिर रात हुई. अँधेरे में मैं चिड़िया को छोड़ने चला. छोड़ने ही वाला था कि लगा टिमटिमाते हुए तारे जैसे आसमान की ऑंखें हों ! मैंने तय किया कि ऐसे स्थान की खोज करूँगा जहाँ सूर्य चाँद और तारों की किरणे भी नहीं पहुँच पाती हों. कई दिनों तक भटकता रहा. फिर एक वैसी जगह मिल ही गयी. अनुकूल क्षण समझ कर जैसे ही सुग्गा को मुक्त करने लगा कि बचपन में दादा जी की सिखायी एक बात याद आ गयी. यह कि ईश्वर सब जगह होते हैं. वे हमें देख रहे होते हैं. इस विचार के आते ही मैं परेशान हो गया और सुग्गा को मुक्त नहीं कर सका. मेरे कई दिन अंतर्द्वंद्व में बीते. मन में तर्क वितर्क चलता रहा. इस तरह एक दिन मेरे दिमाग में कई तार्किक बातें आयीं. यह कि चाँद-सूरज-तारे; ये सब तो खगोलीय पिंड हैं; ये भला देखने कैसे लगेंगे ! और ईश्वर को मैं ने तो कभी देखा ही नहीं. ईश्वर का अस्तित्व भी है; इसका कोई प्रमाण तो मुझे मिला नहीं. मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि ईश्वर अज्ञानी मनुष्यों की कपोल कल्पना मात्र है. जैसे मेरा अंतर्द्वंद्व खत्म हो गया हो. खुश होकर एक रात; रात इसलिए कि कोई अन्य प्राणी न देख सके; मैं एक निर्जन में उसे मुक्त करने चला. मुक्त करने ही वाला था कि मुझे पहली बार खुद का ध्यान आया. मैंने पहली बार सोचा कोई नहीं देख रहा हो तब भी मैं तो देख रहा हूँ. अँधेरे में भी थोडा-थोडा. ऑंखें बंद कर लूँ तो भी सब महसूस तो करूँगा ही.मैं हर किसी की नजरों से इस घटना को छुपा लूँ लेकिन खुद से कैसे !!
मैं समझ गया कि ऐसे अपने सुग्गा को कभी मुक्त नहीं कर सकूँगा. मैंने अब इस सम्बन्ध में सोचना छोड़ दिया. निराशा में निरुद्देश्य भटकता रहा. मन का चोर कहता कि सुग्गा को छोड़ दूं और खुद के देखने की बात छुपा लूँ तो शायद गुरु जी का ध्यान न जाए फिर मैं विद्याध्ययन शुरू कर सकूँगा. लेकिन अपने ही अनुभव को झूठ में बदलने कि हिम्मत नहीं हुई. एक झूठ मेरे मन में चुभता रहता. मन अशांत रहता. मैंने सोचा अब अध्यन तो कर नहीं सकूँगा; घर जाकर अपनी अयोग्यता कि बात किस मुँह कहूँगा. विचलित मन मुझे भटकाता रहा. कंद मूल मेरे आहार बने. कहीं कोई बस्ती मिलती तो लोग भिक्षुक समझ कर कुछ अन्न दे देते. सुग्गा के जीवित रहने का भी यही आधार था. लेकिन एक दिन मन में आया कि यूँ भागते रहना गलत है. मुझे अपनी अयोग्यता; अपना सच स्वीकार लेना चाहिए. मैं खुद से छल नहीं कर सकता. मैंने तय किया कि आपके पास लौटूंगा और सब सच बताकर; आपसे घर जाने की आज्ञा माँगूंगा. इमानदारी से कुछ काम करके गुजारे लायक अर्जित कर ही लूँगा. अब मुझे आदेश दें गुरुवर. रुंधे हुए गले से निकले स्वर में भी दृढ़ता हो सकती है; यह उसके संवाद बोलने के ढंग से पता चल रहा था. गुरु जी कुछ देर मौन रहे. फिर उन्होंने उस विद्यार्थी से कहा- वत्स अपना पिंजरा ले आओ. सुग्गा ने तुम्हारी अंतर्द्वंद्व के कारण व्यर्थ ही कष्ट सहा है; गुरु जी मुस्कुराये. लाओ उसे मुक्त किया जाये ताकि तुम विद्याध्ययन शुरू कर सको. विद्यार्थी का चेहरा ख़ुशी से दमक उठा. दौर कर वह पिंजरा ले आया. गुरु जी ने पिंजरा अपने हाथ में ले लिया. कहने लगे- वत्स जो कार्य मैंने तुम सबको सौंपा था; उसे केवल तुम ने ही सफलता पूर्वक पूरा किया है. इस कार्य के पीछे का उद्देश्य ही तुम सबके भीतर के आत्मसाक्षी को जगाना था. तुम इस तरह न आते तो यही सब मैं दीक्षांत समारोह में समझाता. आशा करता हूँ सभी विद्यार्थियों को तुमसे प्रेरणा मिली होगी. कहते हुए गुरु जी ने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया. सुग्गा ने उड़ान भरी. विद्यार्थियों के सिर के ऊपर से दूर क्षितिज की ओर. सब सिर उठाकर तब तक ताकते रहे जब तक वह सुग्गा ओझल नहीं हो गया !!
किसी बाल पत्रिका में यह कहानी पढ़ी थी. जितना याद रहा उसे कल्पना का पुट देकर अपने ढंग से लिख दिया है. इस कहानी की मेरे मन पर गहरी छाप है !!
आत्मसाक्षी  रेणु की एक कहानी का शीर्षक है. उनकी यह कहानी मेरे दिल में बसी हुई है. इस कहानी पर मामूली सी टिप्पणी बेमानी होगी. कोशिश करूँगा कि यह कहानी ब्लॉग पर लगा सकूँ.
अंत में विनम्रतापूर्वक यह कि ब्लॉग लिखने की शुरुआत कर रहा हूँ. आप सबकी प्रतिक्रिया;सबका सुझाव मेरे लिए बेहद ज़रूरी है. इस आत्मसाक्षी संकल्प में कभी अहंकार की बू आये या मैं भटकता हुआ दिखूँ तो मेरे मित्र मुझे निस्संकोच टोकेंगे/ फटकारेंगे उनसे इतनी उम्मीद तो कर ही सकता हूँ.