Friday, December 12, 2014

हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव परिणाम : 2014-2015

25 सितम्बर 2014 को हुए हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के परिणाम 26 सितम्बर 2014 देर शाम तक घोषित कर दिये गये थे । इस ब्लॉग का पिछला पोस्ट छात्रसंघ चुनाव पर केन्द्रित था । ऐसे में यह ज़रूरी लग रहा था कि चुनाव परिणाम पर कम से कम एक सूचनापरक पोस्ट प्रकाशित किया जाए । खेद है कि यह पोस्ट बहुत देर से संभव हो सका है । संभव है कि आगामी कुछ और पोस्ट इसी खेद के साथ प्रस्तुत किये जाएँ !


परिणाम घोषित हुए करीब ढाई महीने बीत चुके हैं। नव निर्वाचित छात्रसंघ के कार्यों के मूल्यांकन के लिए यह समय हालाँकि पर्याप्त नहीं है, लेकिन छात्रों ने जिस तरह से परिवर्तन में विश्वास जताया है, कुछ अतिरिक्त उम्मीदें बांधी जा सकती हैं। पिछले कई सालों से छात्रसंघ के महत्वपूर्ण पदों पर रहे एसएफआई से विद्यार्थियों की नाराजगी कितनी गहरी थी, यह चुनाव परिणाम से पता चलता है । एसएफआई (SFI) को इस बार महज उपाध्यक्ष के पद से संतोष करना पड़ा । युनाइटेड डेमोक्रेटिक एलायंस (UDA) ने अध्यक्ष, महासचिव और कल्चरल सेकरेट्री का पद हाँसिल किया । संयुक्त सचिव और खेल सचिव ( Sports Secretary) के पद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के खाते में गये ।


इसबार के चुनाव परिणाम कई अर्थों में उल्लेखनीय हैं । यूडीए के मुख्य घटक एएसए (ASA), बीएसएफ (BSF), टीएसए (TSA) जैसे संगठन आंबेडकरवादी विचारधारा के हैं । दलितों पिछड़ों और आदिवासियों के हक़ में आवाज़ बुलंद करने वाले इन संगठनों को विश्वविद्यालय में मिली अभूतपूर्व स्वीकृति को बेहद सकारात्मक माना जा सकता है । किसी सामान्य केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अधिकांश विद्यार्थियों का आंबेडकरवादी राजनीति में विश्वास व्यक्त करना एक ऐतिहासिक महत्व की घटना है । यह चुनाव परिणाम आदिवासी, दलित और पिछड़े तबके से आने वाले विद्यार्थियों की एकता, आत्मविश्वास और राजनीतिक जागरूकता का प्रामाण है । इन संगठनों को मिले समर्थन से यह समझा जा सकता कि इन छात्र संगठनों को उन जातियों के विद्यार्थियों का भी समर्थन मिला है, जो जातियाँ सामाजिक न्याय के रास्ते का अवरोध मानी जाती रही हैं । यूडीए को जिस तरह का समर्थन मिला है वह विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में सामाजिक न्याय के प्रति आस्था को व्यक्त करता है । विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से जिस तरह की परिपक्वता की उम्मीद की जाती है, मुझे लगता है, उसी तरह की परिपक्वता का परिचय हैदराबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने अपने मतदान के माध्यम से दिया है । 
यह चुनाव परिणाम एसएफआई के लिए आत्मसमीक्षा का विषय होना चाहिए । पिछले लेख में कैंपस में विभिन्न राजनीतिक संगठनों की भूमिका के सम्बंध में अल्पावधि में बनी अपनी समझ के आधार पर मैंने थोड़ा बहुत लिखने की कोशिश की थी । निश्चित रूप से कैंपस में संगठनों को अपने प्रति बनने वाली नकारात्मक धारणाओं के निषेध के लिए अथक राजनीतिक प्रयत्न करना होगा । अनिवार्यतः प्रयत्न सिर्फ सैद्धांतिक ही नहीं व्यावहारिक स्तर पर भी होना चाहिए । एबीवीपी जैसे संगठन की लगातार मुखर उपस्थिति उन्माद विरोधी  राजनीति करने वाले विद्यार्थी संगठनों के लिए आने वाले वर्षों में एक बड़ी चुनौती बन सकती है । इस संगठन ने इस बार एसएफआई से करीब 2% अधिक मत हासिल कर उसे जनाधार में पीछे छोड़ दिया है । विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अांतरिक मासिक पत्र यूओएच डिस्पैच (UOH DISPATCH) में दिये गये आंकड़े के अनुसार एबीवीपी को 30% वोट मिले हैं । यह आंकड़ा यूडीए को मिले मतों से महज 1% ही कम है ।  तेलंगाना के सत्तारूढ़ दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) से सम्बद्ध टीएसआरवी (TSRV) ने 5 % वोटों के साथ कैंपस में जो अपनी पैठ बनायी है, अपने पर्याप्त संसाधनों के बल पर उसे गहराई देने का प्रयास जरूर करेगी । एनएसयूआई भी यूडीए जैसे मंच की आड़ में फलने-फूलने के अवसर तालाश सकती है ।

बहरहाल विश्वविद्यालय के नवनिर्वाचित छात्रसंघ पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ, निस्संदेह उनपर भारी जिम्मेदारी है । उम्मीद है कि वे अपनी जिम्मेदारी को निभाने का पूरा प्रयास करेंगे । यूडीए पर जताया गया विश्वास एक नयी परंपरा की शुरूआत है । यूडीए का गुरूत्तर दायित्व है कि वह इस विश्वास पर खरा उतरे और इस परंपरा के विकसित होने में जिन लोगों ने अपना योग दिया है, उन्हें अफसोस करने का मौका न दे । हालाँकि ढाई महीने की इस अवधि में ऐसा उल्लेखनीय कुछ भी नहीं हुआ है, जिस पर संतोष व्यक्त किया जा सके ।




चुनाव परिणाम की खबरों से सम्बंधित कुछ लिंक -

[ सभी तस्वीरें साभार - UOH DISPATCH : A LAB PUBLICATION OF DEPARTMENT OF COMMUNICATION (For Internal Circulation Only) : UNIVERSITY OF HYDERABAD : OCTOBER 2014 : VOL-8 : ISSUE-9 ]

Thursday, September 25, 2014

हैदराबाद विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव : 2014-2015

मैं पिछले साल अक्टूबर के अंत में पहली बार हैदराबाद विश्वविद्यालय आया था । तब यहाँ छात्र संघ चुनाव होने वाले थे । इस तरह संयोग से यहाँ के छात्रसंघ चुनाव प्रक्रिया का प्रत्यक्षदर्शी बन पाने का अवसर मिला था । मैं यहाँ के छात्र संगठनों, उनके आपसी सम्बंधों और समीकरणों की कामचलाऊ समझ के साथ वापस लौटा था । इस बार (25 सितम्बर 2014) के चुनाव में मैं एक मतदाता की हैसियत से भाग लेने जा रहा हूँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थियों को छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा नहीं लेने दिया जाता है । इसलिए एम.फिल. के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के 2012 और 2013 के छात्रसंघ चुनाव में मैं वोट नहीं कर सका था । आज के चुनाव में वोट डालकर एक तरह से मुझे मुझसे छीन लिए गये मताधिकार की वापसी का आभास होगा।

सोच समझ कर वोट डालने की जिम्मेदारी ने कुछ समस्यायें खड़ी कर दी हैं । मैं अब तक बहुत स्पष्ट नहीं हूँ कि अपना वोट किसे दूँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संगठन आइसा (AISA) से जुड़ाव के बाद, वहाँ किसी तरह की दुविधा नहीं रह गयी थी । यहाँ आइसा एक संगठन के बतौर अनुपस्थित है । अब इस संगठन में नहीं होने के बाद भी इसके साथ जुड़ा भावनात्मक रिश्ता खत्म नहीं हुआ है । इस संगठन में रहते हुए बाकी संगठनों के विषय में बनी राय आज भी कायम है । एस.एफ.आई (Students’ Federation of india) को एक ग़ैर जिम्मेदार संगठन के रूप में मुखर होकर पहचानने की शुरूआत आइसा से जुड़ने के बाद के दिनों में ही हुई थी । जेएनयू में आइसा और एसएफआई की प्रतिद्वंद्विता जाहिर है । हमें जेएनयू कैंपस में एसएफआई की अप्रिय गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती थी । मुझे अधिक दिक्कतें एसएफआई के मातृसंगठन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) से रही है । इसे छद्म कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में पहचानने के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ का उल्लेख मैंने माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य को लिखे खुले पत्र में किया था, इसी पत्र के कारण आइसा के कई वरिष्ठ साथियों को मुझसे नाराजगी रही है । वह खुला पत्र इसी ब्लॉग पर लगाया गया था । बहरहाल बताना यह है कि यहाँ एसएफआई एक प्रभावी संगठन है । अनेक मतभेदों के बावज़ूद वामपंथी संगठन होने और कई मुद्दों पर एकमत होने के कारण देश भर में कई जगह आइसा और एसएफआई ने साथ में काम किया है । मुझे याद है अप्रैल' 2013 में पश्चिम बंगाल में एसएफआई के से जुड़े सुदीप्तो की पुलिस हिरासत में मौत के बाद ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ जो आक्रोश सड़कों पर दिखा था, उसमें आइसा की भी सक्रिय भूमिका रही थी । जाहिर है ऐसा सहयोग परस्पर दोनों संगठनों में होता रहा होगा । इसे दोनों संगठनों की परिपक्वता कहा जा सकता है जो बुनियादी तौर पर किसी वामपंथी छात्र संगठन में दिखाई देती है । इसके बावज़ूद यह बड़ा सच है कि दोनों छात्र संगठनों की एक दूसरे को लेकर भारी आलोचना रही है ।

यहाँ एड्मीशन के दौरान विभिन्न छात्रसंगठन अपना हेल्प-डेस्क लगाते हैं । मेरे लिए यह अलग अनुभव था कि मुझे एड्मीशन से जुड़े कुछ फार्म एबीवीपी के डेस्क पर उपलब्ध कराए गये । यह वही संगठन है जिसे वामपंथी संगठन अपना चिर प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हैं । इस संगठन का चरित्र लाख ढकने के बावज़ूद कहीं भी कभी भी प्रकट हो जाता है । मेरे एड्मीशन में सबसे अधिक सहयोग एसएफआई के साथियों ने किया था । समय कम था इसलिए मेरे कुछ फार्म तक एसएफआई के कार्यकर्ताओं ने भरे थे । एड्मीशन के समय किये गये सहयोग का संगठनों को चुनाव में बहुत फायदा मिलता है । यह फायदा स्वाभाविक रूप से उनको अधिक मिलेगा जो उस दौरान अधिक सक्रिय रहे होंगे । एक वामपंथी छात्र संगठन, जिसके प्रति मेरी आलोचना रही है, के साथियों ने एड्मीशन के दौरान मेरी जो मदद की इसलिए  उनके प्रति जो मेरी कृतज्ञता है, वह मेरा वोट निर्धारित नहीं कर सकती है । 

एसएफआई यहाँ के यूनियन में रही है । पिछले साल अध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव का पद इसी संगठन के पास था । छात्र राजनीति के लिए बेहतर जगह रखने वाले इस कैंपस में एसएफआई के नेतृत्व वाले छात्रसंघ ने आशा के अनुरूप काम नहीं किया है, ऐसा यहाँ के विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं और अपने अनुभव से भी लगता है । 
यहाँ आम्बेडकर स्टूडेंट्स एशोसिएशन (ASA) को मैंने अधिक सक्रिय देखा है । दलित-आदिवासियों के पक्ष में मुखर इस संगठन ने आम छात्रों की समस्याओं को भी सम्बोधित करने में एक हद तक सफलता पाई है । बहुजन स्टूडेंट्स फ्रंट (BSF ), ट्राइवल स्टूडेन्ट्स फॉरम (TSF) आदि संगठनों के साथ आसा ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक संगठन (UDA) नामक एक साझा फॉरम बनाया है । मैं इस फॉरम के सभी उम्मीदवारों को इस बार वोट करता, यदि कांग्रेस पार्टी का छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन (NSUI) भी इस फॉरम का एक घटक नहीं होता । जहाँ तक मेरी जानकारी है, पिछले साल के चुनाव में एनएसयूआई यूनाइटेड डेमोक्रेटिक संगठन का हिस्सा नहीं था ।

तेलंगाना राज्य बनने के बाद के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति के सत्ता में आने के बाद की ठसक इस दल के छात्र संगठन तेलंगाना राष्ट्र समिति विद्यार्थीविभागम (TRSV) के चुनावी अभियान में महसूस की जा सकती है । ऐसे संगठनों का तेलुगू भाषी विद्यार्थियों, जिनमें आंध्रप्रदेश के विद्यार्थी भी शामिल हैं, और देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्यार्थियों से बने इस कैंपस में कितना जनाधार है, यह चुनाव परिणाम आने के बाद ही ठीक-ठीक पता चल सकेगा ।

एबीवीपी का इस कैंपस में ठीक-ठाक जनाधार है । पिछले साल कल्चरल सेकेरेट्री और स्पोर्ट्स सेकेरेट्री का पद इस संगठन को मिला था । यह संगठन हर कैंपस में विद्यार्थियों को अपने रंग में रंग पाने में कमोबेश कामयाब हो जाता है । फिर भी जेएनयू या हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे कुछ विश्वविद्यालयों का माहौल एबीवीपी जैसे संगठनों के बहुत अनुकूल नहीं है । कुछ और संगठन भी चुनाव में हिस्सेदारी कर रहे होंगे, जिनकी पहुँच मुझतक या मेरी पहुँच उन तक नहीं हो सकी है ।

चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी संगठनों के चुनाव अभियान में बेहतर राजनीतिक प्रशिक्षण के अभाव का असर साफ दिखाई दे रहा था । मुद्दों पर आधारित प्रभावशाली संबोधन कर पाने में लगभग सभी संगठन नाकाम रहे, जबकि यहाँ का माहौल और यहाँ की बनावट बेहतर राजनीतिक संवाद के अनुकूल हैं । संभवतः बेहतर राजनीतिक संवाद के अभाव के कारण ही इस कैंपस में चुनाव को लेकर वैसा ही माहौल नहीं बन पाता जैसा जेएनयू में देखने को मिलता है । मेरे सामने जो समस्या है उसको सुलझा पाना मुझे कठिन लग रहा है ।संभवतः मुझे अपने वोट यूडीए और एसएफआई के बीच उम्मीदवारों के आधार पर बाँटना पड़ेगा । उम्मीद है वोट डालने तक तय कर लूँगा । 

पिछले वर्ष उपाध्यक्ष का पद यूडीए के खाते में गया था । यूडीए; दलित आदिवासियों के पक्ष में बात करते हुए संभवतः खुद को गैर दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के बीच सहज नहीं पाता है । इसकी बड़ी चुनौती ऐसे छात्रों के साथ भी संवाद कायम कर सामाजिक न्याय और आम छात्रों के अधिकारों पर आधारित व्यापक समझदारी बनाने की है, जिसकी इस कैंपस में पर्याप्त संभावना है । इस फॉरम को एनएसयूआई जैसे संगठनों से परहेज करना चाहिए, जिसकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है । 

एसएफआई के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उस कार्यशैली को हाँसिल करने की है, जिसकी अपेक्षा किसी भी वामपंथी छात्र संगठन से की जाती है । इस संगठन में बेहतर की छटपटाहट और आंदोलनधर्मिता का अभाव बहुत निराश करता है । 

Monday, September 23, 2013

चंदू का सपना

चंदू को जानना युवा पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है । वे छात्रराजनीति की क्रांतिकारी धारा के निर्माताओं में से एक हैं और इसी धारा की छात्र राजनीति के दुर्लभ उत्पाद भी हैं । वे बेहतर दुनिया की इच्छा रखने वाले युवाओं की क्या करें क्या न करें वाली स्थिति का समाधान हैं । चंदू का जीवन ही चंदू के विचारों की अभिव्यक्ति है । चंदू के यहाँ कथनी-करनी का भेद नहीं हैं । जब कभी विचारों का संकट पैदा होगा या विचार और कर्म के तालमेल की समस्या आएगी, चंदू याद किये जाएंगे । इस आलेख में चंदू से समंबंधित जिन तथ्यों का उल्लेख है, उनका संदर्भ मुख्यतः तीन स्रोतों से लिया गया है । आलेख के नीचे उन स्रोतों की चर्चा की गयी है ।
साभार-http://www.cpiml.org
हमने समाज से बहुत कुछ लिया है, उसे समाज को लौटाना हमारा दायित्व है - यह हमारे समय में हाशिये का विचार है । पूंजीवादी व्यवस्था का प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ ऐसे विचारों के गायब होने की प्रक्रिया तेज होती जाती है । हमारे देश में नब्बे का दशक ऐसे ही विचारों के विलोप की प्रक्रिया का दशक था । वह दशक बीत गया बल्कि नयी सदी का भी एक दशक बीत गया है । ऐसे विचार हाशिये पर होते हुए भी आज तक मिटे नहीं हैं । ऐसे ही विचारों के प्रभाव से परिवर्तनकामी शक्तियाँ निर्मित होती रहती हैं । सामान्यतः यह निर्माण प्रक्रिया धीमी होती है फिर भी शोषण और अन्याय आधारित व्यवस्था के झंडाबरदार इससे बुरी तरह भयाक्रांत रहते हैं । प्रतिकूल समय में ऐसे विचारों को जिंदा रखने व उसे स्थापित करने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है । ईमानदारी से इस तरह के संघर्ष का संकल्प ले लेने के बाद कोई और विकल्प नहीं बचता । यह खतरे उठाने का संकल्प होता है । कहीं कोई सुविधा नहीं बचती । चंदू ने पूरे होशो-हवास में असुविधा का रास्ता चुना था ।

चंद्रशेखर प्रसाद [Chandrashekhar Prasad] उर्फ चंद्रशेखर [Chandrashekhar], जिन्हें प्यार से चंदू [Chandu] कहा जाता था का जन्म 20 सितम्बर 1964 को सिवान [Siwan] जिला मुख्यालय से 2 किमी दूर बिंदुसार [Bindusar] गाँव में हुआ था । वे आठ वर्ष के थे जब उनके पिता जीवन सिंह का देहांत हो गया था । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी । लेकिन माँ कौशल्या देवी चाहती थी कि इकलौते बेटे चंदू की पढ़ाई लिखाई नहीं रूके । चंद्रशेखर ने बारहवीं तक की पढ़ाई सैनिक स्कूल, तिलैया से की । बाद के दिनों में वे नेशनल डिफेंस एकेडमी, पुने में भर्ती हुए । चंदू ने जो विचार और मिजाज पाया था वह सैन्य प्रशिक्षण के माहौल के अनुकूल नहीं था । दो साल बाद उन्होंने एनडीए छोड़ दिया । पटना आ गये । यहाँ  पटना विश्वविद्यालय में वे प्रवेश का प्रयास कर रहे थे । उन्हीं दिनों 15 अप्रैल 1983 को उन्होंने अपनी माँ को एक पत्र लिखा था । यह पत्र चंदू के संघर्ष, उनकी वैचारिक मजबूती और बेहतर दुनिया के लिए उनकी छटपटाहट को प्रकट करता है, इसलिए ऐतिहासिक महत्व का है । पत्र की शुरूआत में चंदू ने एनडीए छोड़ने के बाद की माँ की चिंता को संबोधित किया है । चंदू ने उन्हें  150 /–  के दो ट्यूशन पढ़ाने लगने की सूचना दी है ताकि उनकी माँ आर्थिक चिन्ता से कुछ मुक्त महसूस कर सकें । पटना विश्विद्यालय में सत्र शुरू हो जाने के कारण उस सत्र में प्रवेश की संभावना के क्षीण होने लेकिन प्रयास जारी रखने की सूचना भी उन्होंने अपनी माँ को दी है । लेकिन बाद में यह पत्र सामाजिक चिंताओं पर केन्द्रित हो जाता है और तीव्र से तीव्रतम होता चला जता है । इस पत्र में उन्होंने लिखा है- मुझे इस सामाजिक व्यवस्था से आंतरिक दुश्मनी है क्योंकि मैंने इसकी दी हुई प्रताड़नाओं को भोगा है और तुम्हें भी, अपनी माँ को घुटते हुए देख रहा हूँ । इस व्यवस्था ने हमें पैंतीस साल में कुछ नहीं दिया है सिवाय एक मजबूत बुर्जुआ वर्ग के जो हमें और भी नोच खसोट रहा है । हमको किसी भी प्रकार की सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सुरक्षा नहीं दी गई है । अगर कोई कमजोर को मार देता है तो सब आँख मुँद लेते हैं परंतु किसी मजबूत आदमी को मार देने पर हंगामा हो जाता है । आखिर हमें अपना संवैधानिक अधिकार भी तो नहीं मिल रहा । आजादी के लिए हम यूँ ही नहीं लड़े थे । हमने चाहा था एक देश, जहाँ सब सुखी हों । क्या यही वो सुख है ? ”  पत्र के अंत मे उन्होंने लिखा हैशायद तुम भी किसी दिन गोर्की के उपन्यास माँ की कैरेक्टर बनो और मैं तुम्हारा बेटा उसका नायक जो कभी भी सड़ी हुई व्यवस्था से समझौता नहीं करता ।

पटना विश्वविद्यालय उनकी वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़ाव का पहला गवाह बना । एआइएसएफ [AISF] से अपनी छात्र राजनीति शुरू करने वाले और इस संगठन के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुँचने वाले चंद्रशेखर का आइसा [AISA] के साथ आना एक ऐसी घटना है जिसे समझा जाना बहुत जरूरी है । एआइएसएफ [AISF] और एसएफआइ [SFI] जैसे वामपंथी छात्र संगठन अपने वामपंथी दायित्वों से दूर जाने लगे थे । सिद्धांतों पर बहस करने मात्र से वाम राजनीति नहीं हो सकती । अपने आदर्श कम्युनिस्ट पार्टियों भाकपा और माकपा की तरह इनकी कथनी और करनी में आए फर्क को चंदू ने पहचाना और उन्होंने बतौर एक ईमानदार संगठन आइसा की पहचान की । इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि सीपीआई के कम्युनिस्ट छद्म को समझ पाने के बाद उन्होंने भाकपा (माले) को ईमानदार कम्युनिस्ट ताकत के बतौर पहचाना । यह घटना बताती है कि किसी कम्युनिस्ट संगठन में काम करते हुए भी अपनी आँखों और दिमाग को खोलकर रखना कितना जरूरी होता है ।  सामान्यतः किसी कम्युनिस्ट पार्टी में कार्य करते हुए उसकी नीतियों से असहमत होना कठिन होता है । असहमतियों के स्वागत की संस्कृति यदि उस कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं हो तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं । कम्युनिस्ट राजनीति के बुनियादी कार्यक्रम के प्रति कार्यकर्ताओं की आस्था के कारण वे पार्टी के भीतर अप्रिय स्थिति से बचना चाहते हैं । उन्हें लगता है कि ऐसी स्थिति कम्युनिस्ट कार्यक्रम को कमजोर बनाएगी-हालाँकि यह एक खतरनाक भ्रम मात्र होता है । ऐसी स्थिति खास तौर पर तब बनती है जब देश में कम्युनिस्ट राजनीति मजबूत स्थिति में नहीं हो यानी वह अपनी स्वीकृति के लिए जूझ रही हो । ठीक इससे उलट स्थिति यह भी हो सकती है कि जब कोई कम्युनिस्ट पार्टी मजबूत स्थिति में हो तो उसके कार्यकर्ता पार्टी के गलत लाइन के खिलाफ जाने का साहस आसानी नहीं कर पाएँ । लेकिन इतिहास में कम्युनिस्ट राजनीति में जब कभी कहीं पार्टी के वैचारिक भटकाव के खिलाफ किसी ने मुखर होकर ठोस निर्णय लिया है, परिणाम बेहतर आया है ।

साभार-http://zeenews.india.com
जेएनयू में जब चंद्रशेखर आए थे तब आइसा वहाँ बना नहीं था । यह आइसा के निर्माण का दौर था । चंद्रशेखर में संगठन विस्तार करने की भारी क्षमता थी । तपस रंजन ने अपने आलेख जे.एन.यू. में चंदू की राजनीति : तब और अब में, जब तपस खुद एसएफआइ में थे, और एसएफआइ की नकारात्मक राजनीति से उनमें और उनके संगठन के कई अन्य छात्र नेताओं में निराशा थी, उन दिनों को याद करते हुए लिखा है – इस पूरे समय चंद्रशेखर हमारे साथ गहरा राजनीतिक संवाद बनाए हुए थे । मेरे सवाल एसएफआइ में मेरे प्रशिक्षण के आधार पर ही होते थे लेकिन हँसमुख चंदू ने बड़े धैर्य के साथ हममें आइसा के जुझारू और रचनात्मक प्रयोगों के प्रति विश्वास पैदा किया । इसी आलेख में तपस ने लिखा है- आइसा के नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं के दृढ़निश्चय ने कैंपस के तमाम छात्रों के साथ संवाद बना लिया और मेरे साथ भी । इसके बाद चंदू ही थे जो मुझे और कई दूसरे लोगों को उनकी राजनीतिक बहस हल करके आइसा में ले आए ।

आइसा [AISA] ने जेएनयू [JNU] में अपने निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही वहाँ के छात्रसंघ में अपनी जगह बना ली । पारंपरिक रूप से एसएफआइ का गढ़ रहे जेएनयू में आइसा ने अपने क्रांतिकारी रूझान व सामाजिक न्याय के प्रति अपनी आस्था के बदौलत यह जगह हासिल की थी । यह एसएफआइ की सुविधापरस्त राजनीति का जवाब भी था । चंद्रशेखर 1991-92 और 1992-93 छात्रसंघ चुनाव [JNSU] में आइसा से महासचिव पद के उम्मीदवार थे । लेकिन आइसा और उनकी पहली जीत 1993-94 छात्रसंघ चुनाव में हुई जब वे उपाध्यक्ष [Vice President] चुने गए थे । 1994-95 व फिर 1995-96 में वे इस छात्र संघ के अध्यक्ष [President] रहे । इस दौरान इन्होंने अपनी चिंताओं से मुँह नहीं मोड़ा बल्कि इन्होंने इस अवसर का उपयोग अपने बेहतर राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए किया जिसके माध्यम से वे खुद को आगे की लड़ाई के लिए तैयार कर रहे थे । यह प्रशिक्षण जेएनयू और इससे बाहर के संघर्षो से मिल रहा था । इसी बीच 1995 मे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल में आयोजित इंटरनेशनल यूथ कॉन्फ्रेंस में उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला । यहाँ उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफदारी करने वाले प्रस्तावों के विरोध में तीसरी दुनिया के छात्रों को संगठित करने का प्रयास किया । अंततः उन्होंने तीसरी दुनिया के अपने कुछ मित्रों के साथ उस सम्मेलन का बहिष्कार किया । बाद में कोरियायी प्रशासन के कोप का खतरा उठाते हुए भी उन्होंने वहाँ के उग्र विचारों वाले वामपंथी छात्रनेताओं से सम्पर्क किया । कोरिया का एकीकरण विषय पर छात्र-युवाओं की एक बड़ी रैली आयोजित की गयी जिसे चंदू ने संबोधित किया । इस प्रसंग का उल्लेख दीपांकर भट्टाचार्य ने अपने आलेख ‘Crossing the Barriers’ में किया है । गलत का विरोध करना उनका चरित्र था । गोपाल प्रधान ने चन्द्रशेखर के एम.फिल. लघु शोध प्रबंध- लोकप्रिय संस्कृति का द्वंदात्मक समाजशास्त्र – संदर्भ : बिदेसिया को किताब के रूप में संपादित करते हुए एक घटना का जिक्र किया है जिसे गलत को बर्दाश्त न कर पाने वाले उनके चरित्र की पुष्टि होती है - दिल्ली के बसों में छेड़खानी आम बात है । 670 के किसी बस में कंडक्टर किसी महिला के साथ बदतमीजी कर रहा था । चंदू हत्थे से उखड़ गये । बस वालों ने बस मार्कंडेय सिंह (तत्कालीन गवर्नर, दिल्ली)  के अहाते में रोकी । वहाँ के सुरक्षाकर्मियों के साथ मिलकर कंडक्टर-ड्राइवर ने चंदू को पीटा । कई घंटों की कोशिश के बाद एक पुलिस जिप्सी में शिकायत दर्ज हो सकी लेकिन हुआ कुछ नहीं ।

साभार- http://idubba.com
जेएनयू की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वे अपने गृह-क्षेत्र सिवान लौटे । सिवान उन दिनों सामंती ताकतों का गढ़ हुआ करता था । इन सामंती ताकतों के शोषण के खिलाफ इस जिले में भाकपा (माले) का संघर्ष जारी था । भाकपा (माले) का राजनीतिक पार्टी के तौर पर इस जिले में जनाधार व्यापक होता जा रहा था । यह वहाँ से जनता दल के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन [Shabuddin] को भयभीत कर रहा था । इस स्थिति में शहाबुद्दीन ने खुद को सामंतों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया । शहाबुद्दीन का सिवान में आतंक था । दिनदहाड़े हत्या करवा देने वाले शहाबुद्दीन का कोई बाल भी बाँका नहीं कर पाता था । उसके खिलाफ एक व्यक्ति भी, बतौर गवाह पेश होने के लिए तैयार नहीं होता था । इसी शहाबुद्दीन के साथ  सामंतो का गठजोर हुआ । शहाबुद्दीन ने उन्हें यकीन दिलाया कि भाकपा (माले) से उन्हें सिर्फ वही निजात दिला सकता है । इसके बाद भाकपा (माले) के प्रतिबद्द नेताओं की हत्यायों का सिलसिला सिवान में शुरू हो गया था । सिवान लौटने के अपने फैसले से पूर्व चंदू को वहाँ के हालात की पर्याप्त जानकारी थी । सिवान में भाकपा (माले) के कार्यकर्ताओं पर शहाबुद्दीन-सामंती गठजोर के सुनियोजित हमलों पर उन्होंने कुछ आलेख भी लिखे थे । सिवान में इस जुझारू युवा ने कुछ ही दिनों में जबरदस्त लोकप्रियता हाँसिल कर ली थी । सामंतों के शोषण और दबंगों के आतंक से मुक्ति का भाकपा (माले) का एजेंडा, चंदू निर्भीक होकर आम जनता के बीच ले जा रहे थे । वर्षों से घुट रही सिवान की आम जनता के लिए चंदू आशा की किरण बन कर आए थे । इसलिए निहत्थे चंदू भी शहाबुद्दीन और अन्य सामंतों के लिए भय का विषय हो गये थे । 2 अप्रैल 1997 को भाकपा (माले) ने बिहार बंद का आह्वान किया था । इसी सिलसिले में 31 मार्च 1997 को सिवान के जेपी चौक पर चंदू  एक नुक्कड़ सभा को संबोधित कर रहे थे । तभी मोटर साइकिल सवार कुछ लोगों ने उन पर और भीड़ पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी । यह दिन दहाड़े किया गया जघन्य और कायरतापूर्ण कृत्य था । इस हमले में चंद्रशेखर के अलावा माले नेता श्यामनारायण यादव और भुट्टन मियाँ की मौत हो गयी थी । वहाँ मौजूद लोगों ने हत्यारों की पहचान शहाबुद्दीन के गुर्गों के रूप में की थी । इस घटना के बाद देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों और उसके दमन के प्रयास का भी अपना एक ऐतिहासिक महत्व है । इस घटना के बाद चंदू का अपने माँ को लिखे पत्र का गोर्की के उपन्यास माँ की चर्चा वाला अंश तब अक्षरशः सच साबित हो गया जब चंदू की माँ बेटे के हत्यारों को फाँसी दिलाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शनों में नेतृत्वकारी भूमिका में आ गयी । एक और प्रसंग चंदू की माँ की गरिमा को बहुत बढ़ा देता है । तात्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने तत्काल राहत के बतौर चंदू की माँ को एक लाख रूपये का चेक भेजा था । चंदू की माँ ने वह चेक लौटाते हुए प्रधानमंत्री को लिखा- इस एवज में कोई भी राशि लेना मेरे लिए अपमानजनक है ।इसी पत्र में उन्होंने लिखा है- मुझे यह जानकर और भी दुख हुआ कि इसकी सिफारिश आपके गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त ने की थी, वे उस पार्टी के महासचिव रह चुके हैं जहाँ से मेरे बेटे ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी । मुझ अनपढ़ गंवार माँ के सामने आज यह बात और भी साफ हो गयी कि मेरे बेटे ने बहुत जल्दी ही उनकी पार्टी क्यों छोड़ दी । इस पत्र के माध्यम से मैं आपके साथ साथ उन पर भी लानतें भेज रही हूँ जिन्होंने मेरे साथ यह घिनौना मजाक किया है और मेरे बेटे के जान की ऐसी कीमत लगायी है । एक ऐसी माँ के लिए जिसका इतना बड़ा और इकलौता बेटा मार दिया गया हो- और जो यह भी जानती हो कि उसका कातिल कौन है – एक मात्र काम जो हो सकता है,वह यह है कि कातिल को सजा मिले । मेरा मन तभी शांत होगा महोदय । इस पत्र को पढ़ते हुए लगता है कि चंदू के चंदू होने में उनकी माँ कौशल्या देवी के विचारों और व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी । यह दीगर है कि शहाबुद्दीन को आज तक सजा नहीं मिल सकी है ।

जेएनयू [JNU] को क्रांतिकारी वाम राजनीति [Revolutionary Left Politics] का पाठशाला माना जाता है । जेएनयू के किले में क्रांति की बात करना अनुकूल है और अक्सर लोगों को अपना दोहरा चरित्र आनंद देता है । लेकिन चंदू ने यह साबित किया कि वे दोहरेपन के खिलाफ थे । वे भविष्य में पूछे जाने वाले सवालों की कल्पना कर पा रहे थे, और भविष्य में इन सवालों के आगे शर्मिंदा नहीं होना चाहते थे । वे कहते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी कि तब आप कहाँ थे, जब रोज के रोज लोग मारे जा रहे थे ? तब आप कहाँ थे, जब कमजोरों की आवाजों को कुचला जा रहा था ? जेएनयू में अपनी महात्वाकांक्षा को स्पष्ट करते हुए चंदू ने कहा था- हम अगर कहीं जाएँगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाज की शक्ति होगी जिसे डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं । इसलिए अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह की तरह शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी न कि जेनयू से इलेक्शन में काट-जोड़ कर जीतने या हारने की महत्वाकांक्षा होगी। तब यह बात कई लोगों को अविश्वसनीय लगी होगी ।

कई लोगों के लिए सिवान एक दुःस्वप्न है । चंदू सिवान के लिए सुंदर सपने देखा करते थे । उनके लिए सिवान, सिवान नहीं था- सिवान एक जिम्मेदारी थी जिससे वे मुँह नहीं मोड़ सकते थे । धीरेन्द्र झा ने अपने आलेख नई पीढ़ी के प्रकाश स्तंभ थे कॉ. चंदू में तात्कालीन माले [CPI-ML] महासचिव विनोद मिश्र के उस सवाल की चर्चा की है जो उन्होंने पटना के पार्टी कार्यालय में धीरेन्द्र से चंदू की उपस्थिति में पूछा था । सवाल था- चंदू को युवा संगठन की बागडोर देना कैसा रहेगा ? धीरेन्द्र ने लिखा है कि उन के कुछ बोलने से पहले ही चंदू बोल पड़े- मुझे अब सीवान में ही रहने दीजिए । किसान संघर्षों और ग्रामीण गरीबों की राजनीतिक दावेदारी के स्थापित हो रहे नए-नए इतिहास से अभी तो मेरा तादम्य स्थापित होना शुरू ही हुआ है । मैंने सीपीआइ के जमाने में भी ऐसा सपना पाला था, लेकिन सीपीआइ के सत्ता में समाहित होने की प्रक्रिया के चलते किसान संघर्षों से उनके विलगाव को हमने करीब से देखा है । इसलिए मुझे इतिहास ने जो यह अवसर प्रदान किया है उसमें ही रमने दीजिए ।  ऐसी थी चंदू की प्रतिवद्धता जबकि दिल्ली तब भी सुविधाजनक शहर हुआ करता था । जेएनयू का कैंपस तब भी खूबसूरत था । बिहार तक रेल तब भी तय घंटे से कई घंटे देरी से पहुँचती थी । बिजली तब भी वहाँ घंटों गायब रहती थी । एक सिरफिरा शासक तब भी वहाँ राज करता था । वे कहते थे - गाँव के लोग खुश होंगे कि अपना लड़का पढ़-लिख कर वापस आया है ।

चंदू का सपना शोषित पीड़ित जनता की मुक्ति का सपना था । सड़ी हुई व्यवस्था को उखाड़ पेंकने का सपना था । शोषकों, अत्याचारियों को जनता की चेतना के बल पर परास्त करने का सपना था । कुल मिला कर एक सुंदर दुनिया का सपना था । ऐसे सपने हम सबने देखे हैं । इस तरह इन सपनों में कुछ खास नहीं है । खास है इसे पूरा करने का तरीका । खास है उस रास्ते का चुना जाना जिस रास्ते पर पता नहीं होता कि कब सीना छलनी हो जाए । खास है वह साहस जो चंदू में था । चंद्रशेखर इस तरह युगों तक प्रासंगिक बने रहेंगे । क्रांति के सपने बेचने वाले दोहरे चरित्र के लोगों पर हँसते रहेंगे । हँसेगें नहीं बस थोड़ा सा मुस्करा देंगे । चंद्रशेखर की मुस्कान बहुत आकर्षक थी, बहुत अर्थपूर्ण । पोस्टरों से निकल कर चंदू लेकिन यह पूछने नहीं आएँगे कि तुम सब जो यह नारा देते हो कि मेरे सपने को मंजिल तक पहुँचाओगे, वह पता है कैसे पहुँचा सकोगे ? लेकिन जब कभी चंद्रशेखर के सपने पूरा करने के संकल्प पर ईमानदारी से विचार किया जाएगा तो वह रास्ता भी दिख जाएगा । चंदू ने सिर्फ सपने नहीं देखे थे,  उसे पूरा करने के रास्ते भी तैयार किये थे । छेनी-हथोड़ों से पथरीली मिट्टियों को तराश कर तैयार किये गये उन रास्तों पर लंबे चुभने वाले घास जरूर उग आए हैं ।

 सिवान में स्थापित चंदू की आदमकद प्रतिमा
साभार-
 http://idubba.files.wordpress.com

संदर्भ स्रोत-
1. अजय भारद्वाज के द्वारा बनायी गयी चंदू पर केन्द्रित डाक्युमेंट्री- एक मिनट का मौन । चंदू पर किया गया यह एक महत्वपूर्ण काम है । चंदू के जीवन, विचारों, उनके संघर्ष, उनकी शहादत और उसके बाद के अभूतपूर्व छात्र-युवा-जन आंदोलनों को इस डाक्युमेंट्री में बेहतरीन ढंग से संजोया गया है । यू-ट्यूब पर इस डाक्युमेंट्री को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें- एक मिनट का मौन
2. आइसा का केन्द्रीय मुखपत्र- नई पीढ़ी का मार्च 2008 का अंक । यह अंक चंद्रशेखर पर केन्द्रित है । इसे चंदू की शहादत के एक दशक पूरा होने के अवसर पर प्रकाशित किया गया था । इस आलेख में जिन अन्य आलेखों की चर्चा है वे इसी पत्रिका में प्रकाशित हैं । 
संपादन - रवि राय, परवेज़, दीपक, क्रांतिबोध, अवधेश / विशेष संपादन सहयोग- मृत्युंजय / आवरण व सज्जा-अशोक सिद्धार्थ.  
प्रकाशक – इंद्रेश मैखुरी, यू-90, शकरपुर, नई दिल्ली.
3. चंदू के द्वारा जेएनयू के राजनीति विज्ञान विभाग में जमा कराए गए एम.फिल. लघु शोध प्रबंध – लोकप्रिय संस्कृति का द्वंदात्मक समाजशास्त्र – संदर्भ : बिदेसिया, इसे किताब के रूप मे गोपाल प्रधान ने संपादित किया है । गोपाल प्रधान ने इसकी भूमिका में चंदू से जुड़े कुछ प्रसंगों का जिक्र किया है । इस भूमिका के कुछेक प्रसंग इस आलेख में आए हैं ।  
प्रकाशक - सांस्कृतिक संकुल, जन संस्कृति मंच, टी-10, पंचपुष्प अपार्टमेन्ट, अशोक नगर, इलाहाबाद-211001 (उत्तर प्रदेश)


Saturday, August 24, 2013

दीपांकर भट्टाचार्य के नाम खुला पत्र

साभार-नवभारत टाइम्स
कामरेड, 23 अगस्त 2013 के दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय संस्करण (पृष्ठ सं-10) में प्रकाशित एक ख़बर से व्यथित होकर यह पत्र लिख रहा हूँ । ख़बर में आपके हवाले से कहा गया  है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाकपा (माले) बिहार में अंतिम क्षण तक वाम एकता का प्रयास करती रहेगी । वाम एकता माने- भाकपा, माकपा और भाकपा (माले ) की एकता । सामान्यतः वाम एकता के इस प्रयास को सकारात्मक माना जाएगा लेकिन मेरी समझ इसे सकारात्मक मानने के लिए तैयार नहीं है । पिछले दिनों फेसबुक पर मित्र आकाश ने एक कमेंट कर पूछा- भाकपा (माले) के बारे में आपका क्या खयाल है, जो भाकपा और माकपा की नीतियों का विरोध भी करती है और चुनावी फायदे के लिए गठबंधन भी ? यह कमेंट एक पोस्ट पर किया गया था जिसमें गलत नीतियों की वजह से भाकपा और माकपा को मैंने अप्रासंगिक कहा था । मैं इसे एक वाजिब सवाल मानता हूँ । मैं आइसा का एक बहुत सक्रिय तो नहीं लेकिन समय-समय पर सहयोगी भूमिका निभाने वाला एक सदस्य रहा हूँ । आइसा देश में राजनीतिक विकल्प के तौर पर भाकपा (माले) पर विश्वास जताती है । संभवतः असहज कर देने वाला यह सवाल मेरी तरफ इसी लिए उछाला गया था । मैंने प्रतिउत्तर में लिखा कि भाकपा (माले) को इसका जवाब देना होगा । आज इस खबर को पढ़ते हुए मुझे लगा कि सवाल पूछने का यह सही वक्त है ।

ओम थानवी - आशा है आप इस नाम से परिचित होंगे । फेसबुक के माध्यम से अक्सर ही उनकी एक चिंता मुझ तक पहुँचती है । आशय होता है कि कोई उन्हें बताए कि इस देश में इतनी वामपंथी पार्टियाँ क्यों हैं ? भाकपा है तो फिर माकपा या भाकपा (माले) की क्या जरूरत है ? इसी तर्ज पर वे कहते हैं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के रहते अन्य वामपंथी लेखक संगठनों  जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) की क्या जरूरत आन पड़ी ? उनकी यह जिज्ञासा मुझे बालसुलभ लगती रही है । वामपंथी दलों का विभाजन किन कारणों से हुआ और इस तरह के विभाजन का होना कितना जरूरी था- यह कोई ठीक से समझना न चाहे तो समझा पाना श्रमसाध्य तो हो ही जाता है । ठीक इसी तरह यह मान लेना कि लेखक किसी राजनीतिक विकल्प में आस्था रख सकता है, कई लोगों के लिए बहुत कठीन है ।  वामपंथी राजनीति के प्रति आस्थावान लेखक विभिन्न वामपंथी पार्टियों के समर्थक और उनके लेखक संघों  के सदस्य हो सकते हैं, यह बात भी कुछ लोगों को नहीं पचती । लेकिन ठीक इस समय जब मैं आपको यह खुला पत्र लिख रहा हूँ, मुझे लग रहा है कि जिसे मैं बालसुलभ या अपरिपक्व जिज्ञासा, सवाल या सोच मानता रहा हूँ, उसमें दम है । मेरी नजर में, यह दम आया है वाम एकता की बात करने के बाद ।

कामरेड, हम अपने आंदोलनों में एक नारा देते हैं जिसका आशय होता है- एकीकृत जनता हमेशा विजयी होती है । एकता, एकीकरण जैसे शब्दों के प्रति हमारा सौंदर्यबोध बेहद मजबूत है । वाम एकता सुनते हुए भी सहसा ऐसा ही सौंदर्यबोध जगता है लेकिन यह जल्दी ही विकृत हो जाता है । इतिहास में भाकपा और माकपा ने जो गलतियाँ की है उसका जिक्र भाकपा (माले) के दस्तावेजों में बखूबी हुआ है । इसलिए इतिहास कुरेदने की जरूरत मुझे महसूस नहीं हो रही है । सोचने समझने की उम्र होने पर जो मैंने देखा और समझा है उसी में से कुछ का जिक़्र कर देना काफी है । आशा है आप सिंगुर और नंदीग्राम नहीं भूले होंगे । सिंगुर में सेज (SEZ) कानून के अन्तर्गत टाटा मोटर्स के लिए कारखाना और नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगवाने के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण करने का प्रयास और आंदोलन को कुचलने के लिए हुए जनसंहार और सौकड़ों किसानों पर दर्ज फर्जी मुक्कदमें यह सावित करने के लिए काफी हैं कि खुद को मार्क्सवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने वाली पार्टियाँ वास्तव में मार्क्सवादी हो भी, जरूरी नहीं है । हाल में, क्या वह वामपंथ पर हावी बंगाली अस्मिता नहीं थी, जिसने माकपा को खाँटी कांग्रेसी प्रणव मुखर्जी  को राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन की प्रेरणा दी ? आज भी यह बेहद शर्मनाक लगता है कि इन वामपंथी पार्टियों ने उस कांग्रेस सरकार को सहारा दिया जिसके मुखिया नव उदारवाद मॉडल के मास्टर माइंड मनमोहन सिंह थे।
   
कामरेड, राजनीति में कुछ तर्क पूर्वानुमानित होते हैं । मसलन भाकपा (माले) की ओर से यह तर्क आ सकता है कि साम्प्रदायिक व पूँजीवादी ताकतों को शिकस्त देने के लिए वाम ताकतों का एक होना जरूरी है । इसी तर्क के आधार पर सपा, बसपा, राजद, जद(यू) और लोजपा जैसी अवसरवादी ताक़तों से भी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हाथ मिलाती रही हैं या मिला सकती हैं । मुझे ऐसे तर्क एक साथ कातर और खतरनाक लगते हैं । साम्प्रदायिक ताकतें यदि जोर-तोड़ से सत्ता में आ जाती हैं तो देश बर्वाद हो जाएगा-इस आशंका को हवा देना बंद कर देना चाहिए, विशेष कर जुझारू वामपंथी पार्टियों को । साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कम्युनिस्ट विचारों को ताक पर रख देना कहीं से उचित नहीं है । संसदीय राजनीति में विरोध की भूमिका कभी खत्म नहीं होती है । कायदे से यह होगा कि सत्तासीन साम्प्रादायिक ताकतें जब कभी देश की पंथनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगी, ईमानदार वाम ताकतें संसद से सड़क तक विरोध का ऐसा वातावरण तैयार कर देंगी कि साम्प्रदायिक ताकतों को अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का भलि-भाँति एहसास हो जाएगा । साम्प्रादायिक या पूँजीवादी ताक़तों का सत्ता में आना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन किसी भी खतरनाक मंशा को हम नाकाम कर देंगे - किसी ईमानदार वामपंथी पार्टी का यही स्टेंड हो सकता है । भाकपा और माकपा का ऐसा स्टेन्ड कभी नहीं रहा है । इन पार्टियों ने अपने कम्युनिस्ट चरित्र का अनेक अवसरों पर गला घोंटा है । भाकपा और माकपा जैसी पार्टियों से चुनावी तालमेल भाकपा (माले) को भी इसी कतार में खड़ा कर देगा ।

कामरेड, अपनी गलतियों को मान कर सुधार का संकल्प शुद्धिकरण का प्रयास कहलाता है । माकपा, भाकपा का ऐसे प्रयासों से बैर रहा है । ये पार्टियाँ ऐसा प्रयास भी करती तो उनसे गठबंधन को जायज ठहराया जा सकता था । बड़े जन आंदोलनों में जो दल एक साथ नहीं आ सकते, कम्युनिस्ट मूल्यों के लिए जो साथ लड़ते नहीं, उनमें चुनावी तालमेल ,माफ करिएगा ,घाघ राजनीति का नमूना है ।

अब कुछ बेहद अप्रिय बातें । बिहार इस समय भारी विकल्पहीनता से जूझ रहा है । ऐसे में भाकपा (माले) जिस जनविकल्प की बात करता है, उसकी मजबूत दाबेदारी पेश कर पाने में वह असफल रहा है । बिहार के सड़कों पर सबसे अधिक सक्रिय  दिखने वाली इस पार्टी में संभवतः राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हो गया है । बिहार के अनेक युवाओं से मेरा बहुत निकट का परिचय है जो दिल्ली में रह रहे हैं और माले की राजनीति के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं । दिल्ली में हुए कई जनआंदोलनों में वे खुद को एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित कर चुके हैं । माले बिहार में इस उर्जा का उपयोग कर पाने में असफल रहा है । बहुत संभव है कि इन युवाओं को चंद्रशेखर के रास्ते चलने की अपेक्षा दिल्ली की सड़कें ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा प्रतिष्ठा दिलाने वाली लगती हों । ऐसे माहौल में भाकपा माकपा का दामन थामने का विचार आ सकता है, ऐसा मुझे लगता है । मैं आपसे कहता हूँ और बहुत जोर देकर कहता हूँ कि उन वामपंथी ताकतों का वहिष्कार बेहद जरूरी है जिनकी नीतियों ने वामपंथ के प्रति जनता में मोहभंग पैदा किया है । उग्र राजनीति अक्सर एकाकी होती है । एक बेहतर वाम विकल्प यदि देश के सामने आएगा तो वह वामपंथी राजनीति की बुराइयों का निषेध करते हुए ही आएगा । मुझे आशा है कि भाकपा (माले) भाकपा और माकपा से चुनावी गठबंधन करने का ईरादा छोड़ देगी । इसी क्रम में ध्यान आया कि हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वास प्रस्ताव में उनका समर्थन करने वाली भाकपा की नीतीश सरकार से नजदीकियों की जानकारी होने से आपने इंकार किया है । मुझे हैरानी हुई । भाकपा (माले) ने नीतीश सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरने का साहस लगातार दिखाया है । लेकिन वाम एकता की महत्वाकांक्षा की वजह से भाकपा और जद(यू) की नजदिकियों की सूचना से आपका इंकार करना, बेहतर राजनीति का संकेत नहीं है । मुझे अपनी राजनीतिक समझदारी का गुमान नहीं है । आप चाहें तो मेरी बातों को तार्किक ढंग से नकार कर मुझे समझा सकते हैं । ईमानदार और गैरईमानदार राजनीति का फर्क तो जनता को तय करना है । शुभकामनाओं सहित-

कुमार सौरभ


भास्कर में छपी खबर की पृष्ठ का लिंक - Bhaskar E-paper

Tuesday, June 25, 2013

भ्रामक दलीलों के विरूद्ध

यह प्रतिक्रिया मूल रूप से जनसत्ता के लिए लिखी गयी थी। जनसत्ता ने इसे प्रकाशित नहीं किया। इसे ब्लॉग पर साझा कर रहा हूँ कि कुछ पाठकों तक पहुँचे। निरंजन कुमार के जिस लेख पर यह प्रतिक्रिया लिखी गयी है, वह है- ज्ञान बनाम जीवन-कर्म ई-संस्करण     इसी लेख पर 16 जून 2013 को बजरंग बिहारी तिवारी की प्रतिक्रया जनसत्ता में प्रकाशित हुई है- न ज्ञान न जीवन-कर्म / ई-संस्करण  इस प्रतिक्रिया में व्यक्त तर्कों और विचारों की मौलिकता का दावा विल्कुल भी नहीं है। सारे तर्क और विचार चार-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के विरोध में हुए आंदोलन और उसकी तैयारी के क्रम में निर्मित हुए हैं। मैंने उसे प्रस्तुत भर किया है। कुछ निजी समस्यायों की वजह से इस आंदोलन में सक्रिय नहीं रह पाने का मलाल भी है।

देव कबीर मलिक के द्वारा डिजाइन किया गया । साभारThe Sunday Guardian

निरंजन कुमार के आलेख ज्ञान बनाम जीवन कर्म’ (जनसत्ता, 2 जून 2013) में संतुलन की बात की गयी है, लेकिन यह आलेख स्वयं में लेखक की असंतुलित दृष्टि का उदाहरण है । इस आलेख में दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वारा स्वीकृत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (Four Year Undergraduate Programme : FYUP) के पक्ष में विश्वविद्यालय प्रशासन के भ्रामक दलीलों को ही आगे बढ़ाने का काम किया गया है । विश्वविद्यालय के उपकुलपति दिनेश सिंह लगातार यह बताने की कोशिश करते रहे हैं कि इस नये ढाँचेके आने से पहले का हमारा स्नातक पाठ्यक्रम किसी काम का नहीं था । निरंजन कुमार भी इसी तर्क पद्धति का अनुसरण करते हैं । उनकी पहली चिंता यह है कि पुराने ढाँचेके किसी भी विषय के स्नातक इस योग्य नहीं होते कि वे एक सक्षम बैंक अधिकारी, पुलिस उपनिरीक्षक या प्रशासनिक अधिकारी बन सके । इस दावे का आधार क्या है यह वे स्पष्ट नहीं कर सके हैं । कभी संघ लोक सेवा आयोग या किसी अन्य जिम्मेदार संस्थान ने यह समस्या उठायी हो कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की वजह से हमारे यहाँ काबिल अधिकारी नहीं आ पाते, कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं है । हमारे यहाँ योग्यता का अभाव कभी समस्या नहीं रही है । रोजगार का अभाव एक समस्या जरूर रही है । किसी और अभाव का जिक्र करना यदि समीचीन है, तो वह है ईमानदारी और इच्छाशक्ति का अभाव जिसकी वजह से अयोग्य व्यक्तियों को भी अवसर मिल जाता है ।

निरंजन कुमार की दूसरी चिंता है कि पुराने ढाँचेके स्नातक सामान्य जीवन में भी संतुलित और जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर नहीं उभर पाते हैं । उनकी बात मान लें तो हमें यह मान लेना होगा कि भारतीय विश्वविद्यालयों के स्नातक अपने जीवन में असंतुलित और गैरजिम्मेदार ही रह जाते हैं । वे लिखते हैं एक व्यक्ति को दैनिक जीवन में में पर्यावरण, स्वास्थ्य, राजनीतिक जीवन, प्रशासन-कानून, आर्थिक परिस्थितियों , सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समायोजन, इतिहास संस्कृति जैसी चीजों से रूबरू होना पड़ता है, जिसके बारे में समान्य स्नातक को सम्यक ज्ञान नहीं होता, चाहे वह किसी वर्ग का हो ।
ज्ञान के जिन क्षेत्रों से वे रूबरू होने की वे बात करते हैं वह सही है । गरबड़ी उनके निष्कर्ष में है । विश्वविद्यालयों में जिस तरह से बोझिल पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों को उलझाए रखने की कोशिश की जा रही है, निरंजन कुमार की सोच भी इसी कोशिश से प्रेरित है । वे यह मान बैठे हैं कि ज्ञान बाँटने का सारा काम कक्षाओं में ही सम्पन्न होता है और दुनिया भर का ज्ञान पाठ्यक्रमों में ही निहित होता है । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लागू करने से कुछ वर्षों पहले भारी विरोध के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में सेमेस्टर व्यवस्था को लागू करने की रणनीति पर भी विचार करना जरूरी है । इसने विद्यार्थियों को पाठ्यक्रमों तक सीमित हो जाने के लिए विवश कर दिया । खेलकूद, सृजनात्मक लेखन, वादविवाद, प्रदर्शनियों, सामाजिक कार्यो व छात्र राजनीति में सक्रियता जैसी अतिरिक्त गतिविधियाँ, विद्यार्थियों के सर्वागीण विकास के लिए जरूरी मानी जाती रही हैं । बोझिल पाठ्यक्रम और निर्धारित अपर्याप्त कक्षाओं के दबाव ने विद्यार्थियों को जरूरी अतिरिक्त गतिविधियों को लेकर हतोत्साहित किया । निरंजन कुमार ज्ञान के जिन क्षेत्रों से वे रूबरू होने को आवश्यक मानते हैं, वह सामान्य ज्ञान का विषय है । इसे पाठ्यक्रमों से बाहर ग्रहण करने की बेहतर संभावनाएँ मौजूद रहती हैं । इसके लिए जरूरी है कि विद्यार्थियों को सोचने समझने का अवकाश उपलब्ध कराया जाए । पाठ्यक्रमों से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी ऑनर्स स्नातक होने के नाते मेरे भी कुछ अनुभव हैं । हिन्दी साहित्य की आलोचना, हिन्दी साहित्य का इतिहास और कक्षाओं में इस पर होने वाली चर्चा हिन्दी के विद्यार्थियों को  इतिहास, मनोविज्ञान, भाषा विज्ञान, नृ-विज्ञान, राजनीति विज्ञान, दर्शन और संस्कृति जैसे विषयों के अध्ययन की प्रेरणा देती है । दरअसल विभिन्न विषयों का आपस में एक रिश्ता होता है । अपने ही विषय के प्रति गहरी अभिरूचि अन्य विषयों की जानकारी प्राप्त करने की प्रेरणा देती है । जब घटनाओं और मुद्दों को बेहतर ढंग समझने और सोचने का परिवेश हो तो निरंजन कुमार की यह आशंका भी गलत सावित होगी कि पुराने ढाँचेके स्नातक रहे संस्कृत, अर्थशास्त्र और गणित के प्राध्यापक को मानवाधिकार और कानून की सामान्य जानकारी नहीं होगी । लेकिन यह तब संभव है जब पाठ्यक्रम सुरूचिपूर्ण हो । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में आधारभूत पाठ्यक्रम छात्रों को उनकी रूचि के विपरीत के विषयों को पढ़ने के लिए बाध्य करेगी । इसकी भयावहता को एक उदाहरण से समझ सकते हैं । दसवीं के बाद कोई विद्यार्थी अपने बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वह गणित या विज्ञान जैसे विषयों के साथ सहज नहीं है । ऐसे में वह बारहवीं मे कला या वाणिज्य संकाय को चुनता है और उसमें बेहतर परिणाम हाँसिल करता है । चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के बाद उस पर क्या बीतेगी जब उसे फिर से गणित और विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ने के लिए बाध्य किया जाएगा । यहाँ तक कि संगीत और फाइन आर्ट जैसे कौशल आधारित ऑनर्स पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों पर भी आधारभूत पाठ्यक्रम और इन विषयों से इतर विषयों को पढ़ने की अनिवार्यता लाद दी गयी है ।

निरंजन कुमार ने आलेख की शुरूआत में दो बिन्दुओं को विचारणीय माना है । पहला- शिक्षा, खास तौर पर उच्च शिक्षा के उद्देश्य क्या हैं? दूसरा- हमारी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर ये परिवर्तन क्या आवश्यक हैं? इन दोनों ही बिन्दुओं पर वे ठीक से अपनी बात नहीं रख सके हैं । उनके आलेख से यह आभास जरूर मिलता है कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य है देश के लिए बैंक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों को तैयार करना । देश में इस कार्य के लिए पुलिस प्रशिक्षण अकादेमी और प्रशासनिक अकादेमी जैसी प्रशिक्षण देने वाली संस्थाएँ भी हैं, संभवतः उन्हें  इस बात का स्मरण नहीं रहा होगा । उनके अनुसार अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से भिन्न आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन के शैक्षणिक प्रणाली का अनुसरण भी सही है । इस समझदारी पर क्यों न अफसोस हो । विशेषज्ञता प्रदान करना हमारे यहाँ उच्च शिक्षा प्रणाली की विशेषता रही है । इसी प्रणाली ने अपने-अपने क्षेत्र के कई धुरंधर इस देश को दिए हैं । इस शिक्षा पद्दति की ही ताकत है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओवामा सार्वजनिक मंच से अपने देश के विद्यार्थियों को भारतीय छात्रों की क्षमता के प्रति आगाह करते हैं । एक ही कक्षा के एक ही छात्र में वकील, डाक्टर, इंजिनियर, साहित्य आलोचक, मनोवैज्ञानिक, इतिहासविद व अन्य विशेषज्ञों जैसी विशेषज्ञता के एक साथ आ जाने की कल्पना सुंदर तो लग सकती है, लेकिन यह अव्यवहारिक है ।

निरंजन कुमार बड़ी चालाकी से उन सारे सवालों से बच निकलते हैं जो चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लेकर उठाये जा रहे हैं । एक बड़ा सवाल खतरनाक मंशा का है । हमारे देश में उच्च शिक्षा तक कम विद्यार्थियों की ही पहुँच हो पाती है । इन में से भी कई स्नातक कार्यक्रम पूरा नहीं कर पाते हैं । दूर दराज के व वंचित तबके के विद्यार्थियों के लिए एक बड़ा कारण आर्थिक असमर्थता और बोझिल पाठ्यक्रम होता है । जब पाठ्यक्रम चार वर्ष का होगा तो एक और अतिरिक्त वर्ष का बोझ छात्रों को उठाना होगा । आधारभूत पाठ्यक्रम, जिसे पहले के दो वर्ष में पढ़ना है, इसमें उन छात्रों के असफल रहने की आशंका ज्यादा है, जो पिछड़े राज्यों के शिक्षा बोर्डों से आते हैं । शोषित व वंचित तबके के उन छात्रों की असफलता की आशंका भी ज्यादा है, जिन्हें साधारण स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी लगातार मशक्कत करना पड़ती है । ऐसे में ये छात्र दो वर्ष तक भी अपने पाठ्यक्रम से जूझ सकेंगे, इसमें संदेह है । किसी तरह दो साल पूरा कर डिप्लोमा पाने में ये सफल रहे तो समस्या यह है कि जिस डिप्लोमा की कोई पहचान नहीं है, जिसके बारे में यूजीसी का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है, उसका महत्व क्या होगा ? हमारे यहाँ डिप्लोमा कार्यक्रम कौशल विशेष को प्रदान करने वाला पाठ्यक्रम रहा है । चार वर्षीय पाठ्यक्रम के दो वर्षों के पाठ्यक्रम को पढ़कर छात्रों में भला किस तरह का कौशल विकसित होगा सिवाय पाठ्यक्रम प्रदत खिचड़ी ज्ञान के ! जाहिर है उन्हें रोजगार मिलने की संभावना बहुत कम होगी । उनकी प्रतिस्पर्धा उन छात्रों से होगी जो कौशल विशेष से सम्पन्न होंगे । चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में तीन वर्ष पूरा करने के बाद स्नातक की डिग्री मिल जाएगी । यह ऑनर्स नहीं होगा । विश्वविद्यालय में पहले भी ऑनर्स के अलावा पास कोर्स पाठ्यक्रम रहा है । यह  ऑनर्स पाठ्यक्रम के समानांतर एक स्वतंत्र पाठ्यक्रम हुआ करता था । लेकिन अब ऐसी डिग्री चार वर्षीय पाठ्यक्रम को तीसरे वर्ष में अधूरा छोड़ जाने वाले छात्रों को मिलेगी । ऐसे में पाठ्यक्रम को सफलता पूर्वक पूरा करने वाले छात्रों से वे हमेशा कमतर माने जाएँगे । ठीक इसी तरह चार वर्ष में ऑनर्स पाठ्यक्रम को पूरा करने वाले छात्र भी देश भर की प्रतियोगिता परीक्षाओं में तीन वर्षीय स्नातक करने वालो छात्रों के समकक्ष ही माने जाएँगे । इस अतिरिक्त एक वर्ष को लेकर विश्वविद्यालय और निरंजन कुमार दोनो का ही तर्क यह है कि यह एक वर्ष उन छात्रों के लिए लाभदायक है जो उच्चतर शिक्षा में जाने के इच्छुक हैं । आखिर मास्टर कार्यक्रम के रहते इसकी जरूरत ही क्या थी कि स्नातक कार्यक्रम को शोध प्रशिक्षण के लिए एक वर्ष और बढ़ा दिया जाए । कहा यह जा रहा है कि चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को पूरा करने वाले छात्रों को इस विश्वविद्यालय से एक वर्ष में मास्टर डिग्री मिल जाएगी । यह एक और छलावा है । एक वर्ष में मास्टर डिग्री देने का अर्थ यह हुआ कि इसके पहले से निर्धारित दो वर्षों में से एक वर्ष की पढ़ाई पहले ही पूरी कर ली गयी है । अन्य विश्वविद्यालय मास्टर की डिग्री देने में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को ऐसी ही सुविधा देंगे, इसके संकेत तो दूर-दूर तक नहीं हैं । यानी ऑनर्स डिग्री को हाँसिल करने के लिए एक और अतिरिक्त वर्ष जान बूझ कर थोप दिया गया है । यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा यह है कि स्नातक की डिग्री उन्हीं छात्रों तक पहुँच सके, जो आर्थिक रूप से सवल हैं और समाज के उँचे तबके से आते हैं । विश्वविद्यालय प्रशासन की इच्छा है कि उच्चतर शिक्षा तक आर्थिक व सामाजिक रूप से  पिछड़े तबके की पहुँच ही न हो सके । उच्चतर शिक्षा के माध्यम से जो रोजगार हाँसिल होते हैं वहाँ एक खास वर्ग का दबदबा हो । इस तरह चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम अपने चरित्र में आरक्षण जैसी सामाजिक न्याय की व्यवस्था को भी तकनीकी रूप से मात देने का हथियार बन सकता है । जिस तरह उच्च शिक्षा तक छात्रों की पहुँच व स्नातक पूरा न कर पाना एक बड़ी समस्या रही है, इसके जड़ तक पहुँच कर इसे हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए था । इसके विपरीत विश्वविद्यालय द्वारा मल्टि एक्जिट पोइंटका प्रचार दरअसल स्नातक की पढ़ाई को बीच में छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करेगा ।

एक अतिरिक्त वर्ष के पाठ्यक्रम से विश्वविद्यालय पर अतिरिक्त हजारो छात्रों का दबाव बढ़ेगा । यह आशंका अतिरंजित नहीं है कि ऐसे में ढाँचागत अभाव को पूरा करने के बहाने निजी विश्वविद्यालयों को घुसपैठ का अवसर दे दिया जाएगा । जामिया मिलिया के साथ मिलकर दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा शुरू किये गए मेटा यूनिवर्सिटी प्रोग्राम में कोरपोरेट भागीदारी की झलक विश्वविद्यालय प्रशासन के कोरपोरेट प्रेम का बेहतरीन परिचय देती है ।
          
चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम विश्वविद्यालय शिक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ कर रख देगा । यह ज्ञान और विशेषज्ञता के उत्पादन को खत्म कर देगा । थोक में बेरोजगारों की ऐसी फौज तैयार होगी जो कॉरपोरेट घराने के लिए सस्ते श्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए मजबूर होगी ।

निरंजन कुमार ने चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को लोकतांत्रिक पद्धति से स्वीकृत किये जाने का जिक्र किया है । यही तो दुर्भाग्यपूर्ण है । यह भ्रम कई लोगों को हो जाता है कि सत्ता के जो भागीदार होते हैं, उनके द्वारा अपने अधिकार का मनमाना प्रयोग भी जिंदा लोकतंत्र का उदाहरण है । उचित होता कि निरंजन कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के द्वारा  चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के लगातार विरोध की चर्चा करते । यह भी बताते कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस शिक्षक संघ से संवाद स्थापित करना भी उचित नहीं समझता रहा है । बल्कि छात्रों-शिक्षकों के विरोध के दमन में लगातार सक्रिय रहा है ।
                     
महज कुछ दिनों में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम की घोषणा से लेकर इसे लागू करवाने तक का कार्य सम्पन्न हो गया । ऐसे में निरंजन कुमार का यह दावा हास्यास्पद लगता है कि पाठ्यक्रम का निर्माण हरबड़ी में नहीं किया गया है । निरंजन कुमार ने लिखा है कि चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का विरोध एक खास विचारधारा के शिक्षक कर रहे हैं । बेहतर होता कि वे इस खास विचारधाराको स्पष्ट करने का साहस दिखाते । निश्चित रूप से यह खास विचारधाराछात्रों का हित चाहने वाली और सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाली विचारधारा है । इस तरह निरंजन कुमार का यह दावा विल्कुल सही है कि इस विरोध को सभी शिक्षकों का विरोध समझना गलत है !!