Friday, May 29, 2015

सुलझने की ज़द्दोज़हद में

यह 23.02.2013 को लिखा गया एक डायरीनुमा लेख है । इसमें पर्याप्त विषयांतर हैलेकिन चिंता के केन्द्र में हिन्दी विभागों की शिक्षा प्रणाली ही है । उन दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से एम.फिल. कर रहा था । तब कोर्स-वर्क की कई कक्षाएँ प्रो. अपूर्वानंद के साथ निर्धारित थी । वे बहुत नाप-तोल कर बोलते थे और ऐसी ही अपेक्षा शोध छात्रों से करते थे । इसलिए उन्हें कक्षा में सुनना और उनकी कक्षा में बोलना दोनों पर्याप्त मानसिक श्रम का विषय हुआ करता था । लेकिन यह श्रम इस रूप में सार्थक था कि कुछ विचारोत्तेजक बातें होती थीकुछ सीखने को मिल जाता था । बेहतर अभिव्यक्ति के लिए तथ्यों को छोड़कर मूल डायरीनुमा लेख में थोड़े-बहुत ज़ोड़-घटाव की छूट ली गयी है ।

[फोटो:वाया-holtandsons.wordpress.com]


18,19 और 20 फरवरी 2013 (संभवतः) की तीन लगातार कक्षाओं में प्रो. अपूर्वानंद ने कुछ ऐसी बातों पर बल दिया जो उलझन पैदा करने वाली हैं । कक्षा में किसी सेमिनार पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आप लोगों के द्वारा की जाने वाली साहित्य की आलोचना से ‘साहित्यिक आलोचना’ ग़ायब रहती है । उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य के विद्यार्थीजब कोई पर्चा प्रस्तुत करें तो यह ध्यान रखें कि उनकी आलोचना साहित्यिक हो । इसी क्रम में शोधकार्यों के सम्बंध में भी उन्होंने टिप्पणियाँ की की ।  उन्होंने कहा कि हिन्दी के शोध छात्र अपने विषय का चयन कुछ इस तरह से करते हैं - कृति का समाजशास्त्रीय अध्ययनमनोवैज्ञानिक अध्ययनदार्शनिक विवेचनऐतिहासिक विवेचनइत्यादि - दरअसल ऐसे चयन ही अनुपयुक्त हैं । उन्होंने आगे कहा कि दरअसल समाजशास्त्रइतिहासमनोविज्ञान अथवा दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में आप लोगों का प्रशिक्षण नहीं है । ऐसे में इन अनुशासनों के टूल्स के आधार पर आप सही आलोचना कर सकने की स्थिति में नहीं होते हैं । शोध कार्यों को लेकर उनकी टिप्पणी से असहमत होना कठिन है । असल उलझन 'साहित्यिक आलोचना' को लेकर है । अपूर्वानंद जी ने अपने गंभीर स्वर में यह एकाधिक बार बता रखा है कि सवालों का वे स्वागत करते हैं - फिर भी कई बार किसी विषय से सम्बंधित मन की सारी उलझने उन तक प्रेषित करना कठिन हो जाता है । यह उनके व्यक्तित्व की और हम विद्यार्थियों के व्यक्तित्व की सम्मिलित समस्या है । इन कक्षाओं में जो ‘साहित्यिक आलोचना’ है उसको लेकर हमारी समझ ठीक से नहीं बन सकी । यदि साहित्यिक आलोचना नाम की कोई चीज होती है तो अपूर्वानंद जी की जानकारी में शायद यह बात नहीं है कि इस मामले में भी हमारा प्रशिक्षण सिफर है । बात औपचारिक जानकारी की की जाए तो समाजशास्त्रदर्शनशास्त्रइतिहास और मनोविज्ञान जैसे विषय भी किसी न किसी रूप में हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा रहे हैं । हमें स्वीकार करना चाहिए कि अपनी आलोचना अपने पर्चे और अपना शोधप्रबंध तैयार करते हुए दरअसल हम पहले से उपलब्ध आलोचनापर्चे और शोधप्रबंध की शैली का अनुसरण करते हैं । मेरी समझ है कि उपलब्ध पूर्ववर्ती आलोचनाओं में, यदि वे सिर्फ रचना की भाषा, गठन और अभिव्यक्ति की खूबसूरती पर केन्द्रित न हो तो विभिन्न अनुशासनों के ज्ञान की थोड़ी बहुत मिलावट होती ही है । सैद्धांतिक टूल्स, इस्तेमाल न भी किये जाते हों तो भी इनमें इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन और राजनीतिशास्त्र जैसे विषयों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्बंध रखने वाली कुछ शब्दावलियाँ और व्याख्यायों होती ही हैं। अपूर्वानंद जी ने किसका निषेध करना है यह तो बता दिया लेकिन क्या करना है उसको लेकर उलझन में डाल दिया । मुझे आशंका है कि आगे से ‘साहित्यिक आलोचना’ करने के चक्कर में कक्षा के विद्यार्थियों का अब तक का अर्जित ज्ञान दोनों हाथ न खड़े कर दे । कम से कम मेरा ज्ञान तो आत्मसमर्पण कर चुका है । यह सवाल मुझे उलझाता जा रहा है कि साहित्यिक आलोचना माने क्या ? इस विषय में अपूर्वानंद कहीं कोई लेख लिखें, तो शायद कुछ सुलझे ।
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मैं इस उलझन में पड़ा सुलझने का प्रयास कर रहा हूँ । जो साहित्यिक आलोचना हैवह अब तक हमारी पहुँच से बाहर क्यों हैहम ने एम.ए. के दिनों में जिन आलोचकों को बक़ायदा अपने कोर्स में पढ़ा हैक्या उनमें से किसी की आलोचना साहित्यिक नहीं हैयदि है तो यकीन मानिए हम सब उन्हीं पूर्वजों से प्रेरणा लेकर लिख रहे हैं । बेहतर होगा कि साहित्यिक आलोचना को लेकर एक कार्यशाला का आयोजन किया जाए । यह समझना बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम क्या करें कि आलोचनापर्चे और शोध में साहित्य के दायरे से बाहर नहीं जा पाएँ । लेकिन ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन क्यों होने लगा । हिन्दी विभागों में ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन नहीं होता । हिन्दी विभागों ने बदलते समय में साहित्य के शिक्षणप्रशिक्षणशोध के स्वरूपशोध प्रश्ननयी चुनौतियाँ और आलोचना के उत्तर दायित्व जैसे विषयों पर विचार-विमर्श को तिलांजली दे दी है । साहित्य के विद्यार्थियों को साहित्य की उपादेयता तक पर विचार करने का अवसर हिन्दी विभाग उपलब्ध नहीं कराता । ऐसे में हमारा उपहास करना या हमारी वैज्ञानिक समझ पर सवाल उठाना किसी के लिए आसान हैउनके लिए भी जो हमारे शिक्षक हैं और जिनके ऊपर हमारे निर्माण का दायित्व है । वे चाहें तो कुछ अपरिचित और उलझाने वाले जुमले हमारी तरफ फेंक देंऔर अपने दूसरे कामों में लग जाएँ । जिन कक्षाओं में अगंभीरता के उपहास के डर से विद्यार्थी मन की एक-एक गाँठे खोल देने से कतराने लगेंउन कक्षाओं के शिक्षक के लिए ठहर कर सोचने की ज़रूरत नहीं है क्याउन्हें यह ख़ुशफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि ऐसा उनके बौद्धिक व्यक्तित्व के वज़न की वज़ह से होता हैयह जिस वज़ह से होता है उसे बौद्धिक आतंक कहना अधिक उचित होगा । मुझे याद नहीं आता कि कोई ऐसे शिक्षक मिले हों जो कक्षा के विद्यार्थियों से फीडबैक लेने में यकीन करते हों ।
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विश्वविद्यालयों में अनवरत शोधकार्य हो रहे हैं । इन शोधकार्यों की ख़राब गुणवत्ता का रोना भी हमारे शिक्षक रोते रहते हैं । ऐसे में अपना सिर धुन लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता । जो लोग शोध प्रस्ताव को स्वीकृत करते हैंजिनके निर्देशन में शोध कार्य हो रहे हैंजो लोग शोधकार्यों के अंतिम रूप को स्वीकृति देते हैंउनकी लाचारी की कोई ठोस वज़ह हो सकती है क्यासिवाय इसके कि विभाग के शिक्षक अगंभीर हों और विद्यार्थी कामचोरइन दोनों ही स्थितियों में जबतक याराना बना रहेगाकिसी बेहतर शोध की उम्मीद बेमानी है । विद्यार्थी के मानसिक स्तर का बहाना करना हास्यास्पद है । विद्यार्थी इन्हीं विभागों के पाठ्यक्रमों को सफलता पूर्वक पूरा करकेकठिन प्रवेश परीक्षा के माध्यम से अपने कई साथियों को पीछे छोड़कर यहाँ तक पहुँचते हैं । प्रवेश परीक्षा और अन्य परीक्षाओं में कोई धांधली नहीं होती हो तो जाहिर है कि प्रवेश परीक्षाओं के स्वरूप और पाठ्यक्रमों पर सवाल उठेंगे । इन दोनों ही स्थितियों में विद्यार्थियों को कोसते रहने वाले हिन्दी विभागों के शिक्षकों को अपने आत्मालोचन के लिए भी वक्त निकालना चाहिए ।
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हिन्दी विभागों को अब मान लेना चाहिए कि वह ज्ञान के सृजन के केन्द्र नहीं रह गए हैं । अन्य विषयों के विभागों के विषय में मैं बहुत प्रामाणिक तरीके से नहीं लिख सकतालेकिन जितनी जो पुष्ट-अपुष्ट जानकारी है , उस आधार पर यह भी मान लेना चाहिए कि विश्वविद्यालय औपचारिक किताबी ज्ञान और डिग्री देने के ‘प्रतिष्ठान’ मात्र बनकर रह गये हैं । हिन्दी विभागों के विषय में तो दृढ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि वे अपने चुनिंदा अनुगामी विद्यार्थियों के लिए तदर्थ प्राध्यापक का रोजगार भर सृजित कर सकते हैं । इन्हीं नियुक्तियों के गणित में सारा हिन्दी विभाग उलझा हुआ रहता है । मेरे एम.फिल. साक्षात्कार का अनुभव रहा है कि शोध कक्षाओं में प्रवेश के लिए लिये जाने वाले साक्षात्कारों में शिक्षकों के पसंदीदा सवाल- तुलसीसूरकबीरबिहारीघनानंदसे लेकर भारतेन्दु-निराला-नागार्जुन और छायावाद प्रगतिवाद जैसे बिन्दुओं के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं । यह पूछना अक्सर आवश्यक नहीं समझा जाता कि शोध कार्य में तुम्हारी अभिरूचि क्यों हैअपने शोध से तुम क्या योगदान दे सकोगेया अब तक उपलब्ध शोध कार्यों से तुम्हारा शोध कार्य अलग कैसे होगाइत्यादि । इसी तरह तदर्थ नियुक्तियों में यह सवाल पूछे जाने वाले सवाल- रस निष्पत्तिकाव्य हेतुअज्ञेय और महादेवी की कृतियों के नाम और राजभाषा सम्बंधी प्रश्नों तक सिमट कर रह जाते हैं । इस तरह के सवाल पूछने की आवश्यकता महसूस नहीं की जाती कि हिन्दी में बेहतर शिक्षण और नए तरह के शैक्षणिक प्रयोगों के विषय में आपकी राय क्या है?
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लोकतंत्र ज्यों-ज्यों उम्र में बड़ा होता जा रहा हैजनता के पैसों से चलने वाली जनता के प्रति जिम्मेदार संस्थाओं में लोकतंत्र का आयतन उतना ही सिकुड़ता चला जा रहा है । अपने ही विभाग के जिम्मेदार व्यक्तियों तक अपनी प्रतिक्रिया पहुँचानाख़तरे से खाली नहीं रह गया है । कुछ ही शिक्षक अपवाद हैंजिनसे बची उम्मीद भी धुँधली होती जा रही है । 25 नवंबर 2012 को हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित रामविलास शर्मा पर केन्दित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर गोपेशवर सिंह ने किसी प्रसंग में सकारात्मक रूप से प्रसन्न मुद्रा में कहा था कि विद्यार्थी उनसे रोजगार में मदद चाहते हैं ! मैं इसे अपने संदर्भ में खारिज करता हूँ । मुझे इस तरह की किसी कृपा की ज़रूरत नहीं है । मुझे अवसर मिले तो उन्हें कहूँगा कि महोदय मदद ही करनी है तो इस तरह करिए कि व्यवस्था को पारदर्शी बनाइए । लोकतांत्रिकता लाइए । हिन्दी विभाग को ज्ञान के सृजन के मुक्त केन्द्र के रूप में विकसित होने दीजिए । चापलूस और ग़ैरइमानदार विद्यार्थियों के बजाय सही विज़न वाले मेहनतीसंभावनाशीलईमानदार और सवाभिमानी विद्यार्थियों के पक्ष में खड़े होइए । मुझमें यदि अपेक्षित गुणों का अभाव रहा तो मैं अपने लिए रोजगार के कोई अन्य विकल्प तलाश लूँगा ।
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मैं विभाग का एक शोधार्थी हूँ । अवसर मिले तो अध्यापन कार्य को अपना पेशा बनाना चाहता हूं । अपने विभाग और अपने अध्यापकों के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखने का भी यही कारण है । मेरी जानकारी और विश्वास मेंसिर्फ हंगामा खड़ा करने का शौकमुझे बचपन से ही नहीं रहा है । दरअसल शिक्षकों तक सीधे पहुँचने वाले किसी फीडबैक चैनल की व्यवस्था नहीं है और न ही इसे निर्मित करने में किन्हीं की रूचि हैइसलिए कभी सहपाठियों से चर्चा करता हूँ, कभी अन्य माध्यमों का उपयोग करता हूँतो कभी आलोक धन्वा की कविता की बिनभागी लड़कियों की तरह डायरियों में भागता हूँ । एक विद्यार्थी होने के नाते जब मैं अपने समय की अकादमिक विसंगतियों पर सवाल उठा रहा होता हूँतब ख़ुद को भविष्य में एक अच्छे शिक्षक के बतौर निर्मित करने की इच्छा और इसका संकल्प एक बड़े कारक की भूमिका निभा रहा होता है ।

Wednesday, May 27, 2015

भीतर के खलपात्र

छिटपुट छात्र आंदोलनों से बावस्ता होने के कारण, मुझे अच्छी तरह याद है कि हम ‘छात्र एकता ज़िंदाबाद’ के नारे बहुत उत्साह से लगाया करते थे । यह कुछ और हो या नहीं हो एक किस्म की शुभेच्छा तो है ही । विडंबना यह है कि छात्र आंदोलनों की ही नहीं प्रायः विभिन्न आंदोलनों की यह नियति रही है कि उन्हें एक बड़ी चुनौती अपने बीच से ही मिलती है । ऐसा अक्सर किसी वैचारिक मतभेद की वज़ह से नहीं होता है । इस चुनौती का बड़ा कारण व्यक्तिगत बुनावट है । सामूहिक हित के बरअक्स निजी हित को बहुत अधिक महत्व देना तो एक कारण है ही, दूसरा बड़ा कारण यह है कि अक्सर बड़े से बड़े अहंकारी महत्वाकांक्षियों का स्वाभिमान दो कौड़ी का भी नहीं होता है । वह तमाम समझौते कर सकता है । आप ख़ुद को उनके परम मित्र समझते हों, तब भी समय आने पर आपका हक़ मारकर आपके ऊपर खड़ा हो जाने में भी उन्हें कोई दुविधा नहीं होगी । ऐसे कई पात्रों से मेरा व्यक्तिगत परिचय रहा है । कई बार भेद खुलने तक बहुत आत्मीय रिश्ता भी रहा है । ऐसे लोग कई शक्लों में आपके इर्द-गिर्द मौजूद होते हैं । मसलन कोई बहुत विनम्र, मोहकछवि और मीठा बोलने वाला होगा, कोई इतना संवेदनशील दिखेगा कि आप को ख़ुद पर शर्म आएगी, कोई स्वनाम धन्य युवा कवि होगा तो कोई ताजातरीन 'तीखा' आलोचक कोई संपादकीय में हाथ आजमा रहा होगा, कोई पत्रकारिता में तो कोई ज़ोरदार भाषण करने वाला तेजतर्रार छात्र नेता होगा वगैरह..वगैरह.. । सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ये सभी आप तक प्रगतिशीलता के आवरण में लिपटे हुए आएँगे ।
विश्वविद्यालयों में मैंने देखा है कि अक्सर कक्षा के दस सर्वाधिक मेधावी विद्यार्थी, कक्षा के दस सबसे बड़े दब्बू होते हैं । आप चाहें तो दस तक की गिनती को आगे भी ले जा सकते हैं । नैतिक रूप से पतित होना यदि कुछ होता है तो वह भी आपको इनमें दिख जाएगा । मैं सोचता हूँ कि यदि ऐसा नहीं होता तो विश्वविद्यालयों का हाल कुछ और ही होता, लेकिन दुर्भाग्य से सच यही है । मेरा अनुभव रहा है कि संघर्ष करने का माद्दा रखने वाले विद्यार्थियों में प्रायः मेधा का अभाव रहने पर भी मनुष्य होने की ईमानदार समझ होती है । इस नाते शिक्षा के असल उद्देश्य को वही पूरा कर रहे होते हैं । अकादमिक जगत इतना क्रूर होता है कि मेधा के अभाव को निशाना बना कर एक बेहतर मनुष्य के निर्माण की सारी संभावनाओं को अपने तई पूरी तरह कुचल देने में तनिक भी संकोच नहीं करता है । असल में यह सब जो विसंगतियाँ हैं, अन्याय है, उसकी असल जिम्मेदारी उनकी है जो मेधावी माने जाते हैं ।
यही कारण है कि कई बार मुझे इनकी ‘मेधा’ से घृणा होती है । इस मेधा का दुर्निवार विकास मैं देख पाता हूँ । कइयों को अपने शिक्षकों के रूप में भोग रहा हूँ । कइयों को पूरा देश प्रशासकों के रूप में झेल रहा है, इत्यादि..इत्यादि । मुक्तिबोध ने बौद्धिक वर्ग के क्रीतदास होने की चर्चा की है । यह दासता कितनी बड़ी त्रासदी है, उसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है । कक्षा के 'मेधावी' छात्रों की इस परंपरा का विकास दरअसल एक जड़ परंपरा के फलते-फूलते रहने की गारंटी भी है, कि अकादमिक जगत में जो चलता रहा है, वह चलता रहेगा । इसे अनवरत करने के लिए ही मेधाहीन विद्यार्थियों के लिए भी व्यवस्था के अनुगामी होने पर सफलताएँ सुनिश्चित की जाती हैं । यह स्पष्ट संकेत होता है, कि इस व्यवस्था में प्रवेश की अर्हता योग्यता के बजाय रीढ़ की हड्डी के आभासी झुकाव से तय होती है ।
जब हम एक खल व्यवस्था से जूझ रहे होते हैं, तब भीतर के खल पात्रों को नज़रअंदाज करना एक बड़ी भूल होती है । दरअसल हमें दोनों स्तरों पर संघर्ष करना होता है । हमें हमारे भीतर के खल पात्रों की सार्वजनिक रूप से भर्त्सना करनी होगी । उनकी सफलताओं पर मुखर होकर बार-बार प्रश्नचिह्न लगाना होगा । उनकी सराहना करने के बजाय, उनका बहिष्कार करना होगा । हमें उन्हें भी चैन से बैठने नहीं देना है, उनकी निष्कंटक सफलता सुनिश्चित नहीं होने देनी है, जिन्होंने अपनी सफलता के लिए बेइमान रास्ते का चुनाव किया है । मात्र खल-व्यवस्था के साथ अकेले का संघर्ष हमें दूरगामी सफलता नहीं दिला पाएगा । हमें व्यवस्था से भविष्य के लिए भी खल पात्रों की बेदख़ली सुनिश्चित करनी होगी ।
मुझे पता है कि कोई एक लेख तो छोड़िए दुनिया का बड़े से बड़ा डॉक्टर भी रीढ़ की हड्डी के आभासी झुकाव का इलाज नहीं कर सकता । यह लेख किसी के हृदय परिवर्तन की आशा से लिखा भी नहीं गया है । हाँ उन तक यह प्रेषित ज़रूर करना है कि तुम्हारे सुख को हम अपनी कीमत पर कभी सुनिश्चित नहीं होने देंगे । तुम जो भी हो हमारे मित्र बंधु नहीं हो सकते । हम तुम्हारी शत्रुता की चुनौती को स्वीकार करते हैं, जिस तरह व्यवस्था की ऐसी ही चुनौती को हमने दृढ़ता पूर्वक स्वीकारा है ।

Monday, May 25, 2015

सृजनात्मक संघर्ष


साभारगूगल बुक्स
सृजनात्मक संघर्ष क्या है ? यह सवाल सुनकर, मुझे सबसे पहले मुक्तिबोध का ध्यान आएगा । मुक्तिबोध की एक साहित्यिक की डायरी और लम्बी कविता अंधेरे में दो ऐसे स्रोत रहे हैं, जिनसे मुझे सृजनात्मक संघर्ष अथवा लेखक के आत्मसंघर्ष को समझने में पर्याप्त मदद मिलती है । अपने विवेक से मैं जितना समझ पाया हूँ, उसी आधार पर सृजनात्मक संघर्ष पर कुछ लिखने की छूट ले रहा हूँ ।
लगभग एक सप्ताह पहले अल्पना मिश्र के पिछले जन्मदिन (18 मई 2014) पर स्त्रीकालवेब पोर्टल पर प्रकाशित उनकी पाँच कविताओं को उनके अगले जन्म दिन पर फिर से फेसबुक पर शेयर किया गया था । शेयर किये गये एक लिंक पर आशुतोष कुमार ने अल्पना मिश्र को टैग करते हुए अपनी प्रतिक्रिया इस तरह दी – अल्पना मिश्र का सृजनात्मक संघर्ष एक मिसाल है  । उन्हें बधाई । इस प्रतिक्रिया को पढ़कर मैं देर तक सोचता रहा कि आशुतोष कुमार ने किस आधार पर अल्पना मिश्र के सृजनात्मक संघर्ष को मिसाल कहा होगा ! मुझे लगता है, आशुतोष जी के पास इसका आधार ज़रूर रहा होगा, इस पर फुर्सत से वे लिख भी सकते हैं । तत्काल मन में कोई आधार नहीं भी रहा हो, तो भी मुझे विश्वास है कि भविष्य के लिए, वे अपने विवेक से इसे तैयार कर लेंगे । बहरहाल मुझे स्वीकारना चाहिए कि आशुतोष कुमार की प्रतिक्रिया के कारण ही इस विषय पर विचार करने की मुझे आवश्यकता महसूस हुई है ।
फिर से उसी सवाल पर लौटते हैं कि सृजनात्मक संघर्ष क्या है ! मेरी समझ से सामान्यतः इसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति के लिए किये जाने वाले आत्म और बाह्य संघर्ष के रूप में परिभाषित करने में कोई बुराई नहीं है । ऐसा संघर्ष प्रत्येक सृजनधर्मी कमोबेश करता ही है । अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस आत्म और बाह्य संघर्ष को सूक्ष्मता से समझा जाए । मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन वागर्थ के किसी अंक में कलकत्ता की एक लेखिका के नागार्जुन से हुई भेंट पर लिखे संस्मरणात्मक लेख को पढ़ा था । लेखिका ने बहुत उत्साह से अपनी कुछ रचनाएँ बाबा नागार्जुन को सुनाई । लेखिका ने लिखा है कि अचानक से बाबा बहुत क्षुब्ध हो गये, और कहने लगे कि इन रचनाओं को लिखते हुए तुम कभी रोई हो ? लिखते हुए कई बार रात-रात भर रोना पड़ता है..वगैरह..वगैरह..। बाबा के लगातार बोलते जाने का सार यह था कि सच्ची अभिव्यक्ति, अभिव्यक्त पात्रों की पीड़ा अथवा विषय की संवेदना को महसूस किये बिना संभव नहीं हो सकती है । शायद नागार्जुन इतने क्षुब्ध हो गये थे कि वे उठ कर चले गये थे । नागार्जुन ने अपनी एक कविता में सृजन की इसी पीड़ा को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है- इंदुमति के मृत्यु शोक से अज रोया या तुम रोए थे ? / कालिदास, सच-सच बतलाना !’ मेरा मानना है कि सृजन के क्रम में ऐसी पीड़ा को अपने भीतर महसूस करना दरअसल सृजनात्मक संघर्ष का पहला अहम हिस्सा है । सृजनात्मक संघर्ष के इस हिस्से को ईमानदारी से निभाने वाले सृजनधर्मी व्यक्तिगत जीवन में भी अत्यंत संवेदनशील नहीं होंगे, इस संदेह का कोई कारण नहीं दिखता । सृजनात्मक संघर्ष का यह हिस्सा अहम है, लेकिन सृजनात्मक संघर्ष का सब कुछ यही नहीं है ।
अंधेरे में कविता में कवि जिस परम अभिव्यक्ति की खोज में छटपटाता हुआ दिखाई देता है, मेरी समझ से सृजनात्मक संघर्ष का वह दूसरा अहम हिस्सा है । अभिव्यक्ति की छटपटाहट क्या सभी सजग सृजनधर्मियों में नहीं होती? इसका घनत्व कम या अधिक हो सकता है, लेकिन प्रत्येक सजग सृजनकर्मी में इसकी उपस्थिति होती ही है । इसके कारण अलग अलग हो सकते हैं । संस्कृत काव्यशास्त्रों में यश और धन के लिए काव्यकर्म का उल्लेख मिलता है, यह आज भी अप्रासंगिक नहीं हुआ है । धन से पारिश्रमिक का अर्थ लगाना गलत होगा । इसे आज के दौर में बड़े पुरस्कारों और आर्थिक फायदे वाले पदों से जोड़ कर देखा जा सकता है । ऐसे सृजन कर्म में भी उम्दा कार्य करने का दबाव होता है । ऐसे सृजन कर्म भी पर्याप्त प्रतिष्ठा हासिल कर लेते हैं । अभिव्यक्ति की आकुलता को इस प्रकार के सृजन कर्म के माध्यम समझने का प्रयास किया जाए तो हम अभिव्यक्ति की छटपटाहट के मर्म को नहीं समझ सकते । ‘अंधेरे में’ की पंक्तियाँ- अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे / तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब- यहाँ हमारी मदद कर सकती हैं । अभिव्यक्ति अथवा सृजन का संघर्ष अभिव्यक्ति के ज़रूरी ख़तरे उठाए बिना बहुत अधूरा है । यह ज़रूरी ख़तरे हमारे समय के मुताबिक तय होते हैं । हम जिस लोकतंत्र में रहते हैं वहाँ, परिवेशगत जमीनी जटिल समस्यायों से जूझने के बजाए उच्चस्थ सत्ता, व्यवस्था और पूँजी प्रतिष्ठानों की आलोचना अधिक सुविधाजनक है । इस तरह की अभिव्यक्ति बहुत हद तक खतरे के दायरे से बाहर है, हालाँकि इस तरह की आलोचना का पर्याप्त महत्व है, और आज भी यह खतरे से एकदम परे नहीं है । अभिव्यक्ति के ख़तरे को समझदारी से परिभाषित किये जाने की जरूरत है । पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश का सृजन कर्म इसका एक उदाहरण हो सकता है, जिन्होंने विसंगतियों के विरूद्ध अपनी निष्ठा के साथ संघर्ष किया और मारे गये । कबीर ने उस दौर में धर्म और जाति व्यवस्था को चुनौती दी थी जिसके सैकड़ों साल बाद और तथाकथित लोकतांत्रिक अधिकारों के रहते भी साम्प्रादायिक और जातीय दबंगई का पार नहीं पाया जा सका है । अभिव्यक्ति की छटपटाहट का मूल्यांकन उसके  प्रयोजन के आधार पर ही किया जाना चाहिए ।
सृजनात्मक संघर्ष का एक और पक्ष उल्लेखनीय है । सृजनधर्मियों की व्यक्तिगत परिस्थिति पर विचार किया जाना भी आवश्यक है । अभावों, व्यक्तिगत सीमा, असुविधा, शारिरिक अथवा मानसिक पीड़ा जैसी कई चुनौतियों के रहते भी सोद्देश्य सृजन के प्रति निष्ठावान रह सकना , निस्संदेह बहुत बड़ा सृजनात्मक संघर्ष है । ऐसे में सृजन बहुत प्रभावशाली नहीं भी हो, तब भी वह सृजनात्मक संघर्ष की महत्वपूर्ण निधि है और इस नाते सम्माननीय भी ।
उपर के तीन पैरा में सृजनात्क संघर्ष के सभी आयाम समेट लेने का दावा नहीं किया जा सकता है । फिर भी सृजनात्मक संघर्ष को समझने की जो कोशिश की गयी है, उसमें किसी एक परिस्थिति या बिन्दु को निर्णायक नहीं समझ लिया गया है । मसलन जरूरी नहीं कि सृजनधर्मी आर्थिक अभाव में रहता हो, लेकिन तब भी यह आवश्यक है कि वह अभिव्यक्ति के जरूरी ख़तरे उठाने के लिए आत्मसंघर्ष करता हो और उस पक्ष में खड़ा हो जो न्यासंगत हो । यदि यह आत्मसंघर्ष वास्तविक होगा तो सवाल ही नहीं उठता कि रचनाकार का व्यक्तिगत जीवन उसके सृजन की भावना के विपरीत होगा ।
चूँकि एक विश्वविद्यालयी शिक्षक के सृजन कर्म पर एक विश्वविद्यालयी शिक्षक की टिप्पणी को प्रस्थान बिंदु के रूप में चुना गया था, एक और बिन्दु पर विचार करना आवश्यक है । विश्वविद्यालयी शिक्षकों के सृजनात्मक संघर्ष का मूल्यांकन क्या अन्य लोगों के सृजनात्मक संघर्ष से अलग तरीके से करना चाहिए चाहिए? मेरा उत्तर है- हाँ । यह उत्तर सृजनात्मक संघर्ष पर तीन पैरा में की गयी चर्चा के आधार पर ही दिया जा रहा है । विश्वविद्यालयी शिक्षकों को मिलने वाला अपेक्षाकृत भारी वेतन, विभिन्न सुविधाएँ और पर्याप्त अवकाश जनता के पैसों की बदौलत है । इसलिए उनके ऊपर प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों के बिना भेद-भाव बेहतर निर्माण की है, उपलब्ध ज्ञान के दोषरहित हस्तांतरण और विस्तार की है । इस प्रसंग की तमाम विसंगतियों और कुव्यवस्था से जूझना उनका अनिवार्य दायित्व है । इस तरह उनका प्राथमिक सृजनात्मक संघर्ष विद्यार्थियों के निर्माण का संघर्ष है । यदि वे यहाँ ईमानदार नहीं होंगे तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे किसी किस्म के सृजनात्मक संघर्ष के योग्य नहीं हो सकते । एक विद्यार्थी के नाते अपने किसी शिक्षक के रचनात्मक सृजन से मुझे खुशी होती है, लेकिन मेरे लिए उनके सृजनात्मक संघर्ष को समझने के लिए एक शिक्षक और एक मनुष्य के बतौर उनका आचरण काफी होता है। दुर्भाग्य से विश्वविद्यालयी शिक्षकों ने जिनके ऊपर सृजन की अपेक्षाकृत बड़ी जिम्मेदारी है, आपसी साँठ-गाँठ से ऐसा माहौल तैयार कर लिया है, जहाँ सृजनात्मक संघर्ष से रहित सृजन की जय जयकार हो रही है । विद्यार्थियों के सृजन में लगे शिक्षक और उनका ईमानदार लेखन भी घोर उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं, और विशेष प्रयोजन से कविता संकलन, कथा संकलन, उपन्यास और राग-द्वेष के आधार पर लिखी गयी या संपादित आलोचना की किताब अथवा अभिनंदन ग्रंथ छपवाने वाले प्रोफेसरों को पुरस्कार और सम्मान मिल रहा है, उनकी जयजयकार हो रही है ।
यह समझ में आता है कि किसी कृति मात्र पर चर्चा करते हुए समीक्षक उसे अच्छा, बेहतर, या इच्छा हो तो बहुत उम्दा कह दे, लेकिन यह समझ से परे है कि किसी भी सृजन कर्म को बड़ा सृजनात्मक संघर्ष कहने से पहले गंभीरतापूर्वक सोचा विचारा न जाए । इस तरह की टिप्पणी बहुत सतर्क हो कर ही करनी चाहिए । जाने-अनजाने सृजनात्मक संघर्ष के संदर्भ में चलताऊ टिप्पणी कर के हम अपने उन पूर्वजों और समकालीनों का सिर्फ अपमान ही नहीं करते हैं बल्कि उनके प्रति घोर कृतघ्नता प्रदर्शित करते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन सृजनात्मक संघर्ष के निमित्त समर्पित कर दिया या इस तरह के समर्पण का संकल्प लेकर उसे निभाने में यत्न पूर्वक जुटे हुए हैं। यह हमारी अगली पीढ़ी के प्रति भी अपराध है, जिन तक सृजनात्मक संघर्ष ही नहीं अब तक उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान की सही समझ प्रेषित करना हमारा अपरिहार्य कर्तव्य है ।

Friday, December 12, 2014

हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव परिणाम : 2014-2015

25 सितम्बर 2014 को हुए हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के परिणाम 26 सितम्बर 2014 देर शाम तक घोषित कर दिये गये थे । इस ब्लॉग का पिछला पोस्ट छात्रसंघ चुनाव पर केन्द्रित था । ऐसे में यह ज़रूरी लग रहा था कि चुनाव परिणाम पर कम से कम एक सूचनापरक पोस्ट प्रकाशित किया जाए । खेद है कि यह पोस्ट बहुत देर से संभव हो सका है । संभव है कि आगामी कुछ और पोस्ट इसी खेद के साथ प्रस्तुत किये जाएँ !


परिणाम घोषित हुए करीब ढाई महीने बीत चुके हैं। नव निर्वाचित छात्रसंघ के कार्यों के मूल्यांकन के लिए यह समय हालाँकि पर्याप्त नहीं है, लेकिन छात्रों ने जिस तरह से परिवर्तन में विश्वास जताया है, कुछ अतिरिक्त उम्मीदें बांधी जा सकती हैं। पिछले कई सालों से छात्रसंघ के महत्वपूर्ण पदों पर रहे एसएफआई से विद्यार्थियों की नाराजगी कितनी गहरी थी, यह चुनाव परिणाम से पता चलता है । एसएफआई (SFI) को इस बार महज उपाध्यक्ष के पद से संतोष करना पड़ा । युनाइटेड डेमोक्रेटिक एलायंस (UDA) ने अध्यक्ष, महासचिव और कल्चरल सेकरेट्री का पद हाँसिल किया । संयुक्त सचिव और खेल सचिव ( Sports Secretary) के पद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के खाते में गये ।


इसबार के चुनाव परिणाम कई अर्थों में उल्लेखनीय हैं । यूडीए के मुख्य घटक एएसए (ASA), बीएसएफ (BSF), टीएसए (TSA) जैसे संगठन आंबेडकरवादी विचारधारा के हैं । दलितों पिछड़ों और आदिवासियों के हक़ में आवाज़ बुलंद करने वाले इन संगठनों को विश्वविद्यालय में मिली अभूतपूर्व स्वीकृति को बेहद सकारात्मक माना जा सकता है । किसी सामान्य केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अधिकांश विद्यार्थियों का आंबेडकरवादी राजनीति में विश्वास व्यक्त करना एक ऐतिहासिक महत्व की घटना है । यह चुनाव परिणाम आदिवासी, दलित और पिछड़े तबके से आने वाले विद्यार्थियों की एकता, आत्मविश्वास और राजनीतिक जागरूकता का प्रामाण है । इन संगठनों को मिले समर्थन से यह समझा जा सकता कि इन छात्र संगठनों को उन जातियों के विद्यार्थियों का भी समर्थन मिला है, जो जातियाँ सामाजिक न्याय के रास्ते का अवरोध मानी जाती रही हैं । यूडीए को जिस तरह का समर्थन मिला है वह विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों में सामाजिक न्याय के प्रति आस्था को व्यक्त करता है । विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से जिस तरह की परिपक्वता की उम्मीद की जाती है, मुझे लगता है, उसी तरह की परिपक्वता का परिचय हैदराबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने अपने मतदान के माध्यम से दिया है । 
यह चुनाव परिणाम एसएफआई के लिए आत्मसमीक्षा का विषय होना चाहिए । पिछले लेख में कैंपस में विभिन्न राजनीतिक संगठनों की भूमिका के सम्बंध में अल्पावधि में बनी अपनी समझ के आधार पर मैंने थोड़ा बहुत लिखने की कोशिश की थी । निश्चित रूप से कैंपस में संगठनों को अपने प्रति बनने वाली नकारात्मक धारणाओं के निषेध के लिए अथक राजनीतिक प्रयत्न करना होगा । अनिवार्यतः प्रयत्न सिर्फ सैद्धांतिक ही नहीं व्यावहारिक स्तर पर भी होना चाहिए । एबीवीपी जैसे संगठन की लगातार मुखर उपस्थिति उन्माद विरोधी  राजनीति करने वाले विद्यार्थी संगठनों के लिए आने वाले वर्षों में एक बड़ी चुनौती बन सकती है । इस संगठन ने इस बार एसएफआई से करीब 2% अधिक मत हासिल कर उसे जनाधार में पीछे छोड़ दिया है । विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अांतरिक मासिक पत्र यूओएच डिस्पैच (UOH DISPATCH) में दिये गये आंकड़े के अनुसार एबीवीपी को 30% वोट मिले हैं । यह आंकड़ा यूडीए को मिले मतों से महज 1% ही कम है ।  तेलंगाना के सत्तारूढ़ दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) से सम्बद्ध टीएसआरवी (TSRV) ने 5 % वोटों के साथ कैंपस में जो अपनी पैठ बनायी है, अपने पर्याप्त संसाधनों के बल पर उसे गहराई देने का प्रयास जरूर करेगी । एनएसयूआई भी यूडीए जैसे मंच की आड़ में फलने-फूलने के अवसर तालाश सकती है ।

बहरहाल विश्वविद्यालय के नवनिर्वाचित छात्रसंघ पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ, निस्संदेह उनपर भारी जिम्मेदारी है । उम्मीद है कि वे अपनी जिम्मेदारी को निभाने का पूरा प्रयास करेंगे । यूडीए पर जताया गया विश्वास एक नयी परंपरा की शुरूआत है । यूडीए का गुरूत्तर दायित्व है कि वह इस विश्वास पर खरा उतरे और इस परंपरा के विकसित होने में जिन लोगों ने अपना योग दिया है, उन्हें अफसोस करने का मौका न दे । हालाँकि ढाई महीने की इस अवधि में ऐसा उल्लेखनीय कुछ भी नहीं हुआ है, जिस पर संतोष व्यक्त किया जा सके ।




चुनाव परिणाम की खबरों से सम्बंधित कुछ लिंक -

[ सभी तस्वीरें साभार - UOH DISPATCH : A LAB PUBLICATION OF DEPARTMENT OF COMMUNICATION (For Internal Circulation Only) : UNIVERSITY OF HYDERABAD : OCTOBER 2014 : VOL-8 : ISSUE-9 ]

Thursday, September 25, 2014

हैदराबाद विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव : 2014-2015

मैं पिछले साल अक्टूबर के अंत में पहली बार हैदराबाद विश्वविद्यालय आया था । तब यहाँ छात्र संघ चुनाव होने वाले थे । इस तरह संयोग से यहाँ के छात्रसंघ चुनाव प्रक्रिया का प्रत्यक्षदर्शी बन पाने का अवसर मिला था । मैं यहाँ के छात्र संगठनों, उनके आपसी सम्बंधों और समीकरणों की कामचलाऊ समझ के साथ वापस लौटा था । इस बार (25 सितम्बर 2014) के चुनाव में मैं एक मतदाता की हैसियत से भाग लेने जा रहा हूँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थियों को छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा नहीं लेने दिया जाता है । इसलिए एम.फिल. के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के 2012 और 2013 के छात्रसंघ चुनाव में मैं वोट नहीं कर सका था । आज के चुनाव में वोट डालकर एक तरह से मुझे मुझसे छीन लिए गये मताधिकार की वापसी का आभास होगा।

सोच समझ कर वोट डालने की जिम्मेदारी ने कुछ समस्यायें खड़ी कर दी हैं । मैं अब तक बहुत स्पष्ट नहीं हूँ कि अपना वोट किसे दूँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संगठन आइसा (AISA) से जुड़ाव के बाद, वहाँ किसी तरह की दुविधा नहीं रह गयी थी । यहाँ आइसा एक संगठन के बतौर अनुपस्थित है । अब इस संगठन में नहीं होने के बाद भी इसके साथ जुड़ा भावनात्मक रिश्ता खत्म नहीं हुआ है । इस संगठन में रहते हुए बाकी संगठनों के विषय में बनी राय आज भी कायम है । एस.एफ.आई (Students’ Federation of india) को एक ग़ैर जिम्मेदार संगठन के रूप में मुखर होकर पहचानने की शुरूआत आइसा से जुड़ने के बाद के दिनों में ही हुई थी । जेएनयू में आइसा और एसएफआई की प्रतिद्वंद्विता जाहिर है । हमें जेएनयू कैंपस में एसएफआई की अप्रिय गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती थी । मुझे अधिक दिक्कतें एसएफआई के मातृसंगठन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) से रही है । इसे छद्म कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में पहचानने के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ का उल्लेख मैंने माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य को लिखे खुले पत्र में किया था, इसी पत्र के कारण आइसा के कई वरिष्ठ साथियों को मुझसे नाराजगी रही है । वह खुला पत्र इसी ब्लॉग पर लगाया गया था । बहरहाल बताना यह है कि यहाँ एसएफआई एक प्रभावी संगठन है । अनेक मतभेदों के बावज़ूद वामपंथी संगठन होने और कई मुद्दों पर एकमत होने के कारण देश भर में कई जगह आइसा और एसएफआई ने साथ में काम किया है । मुझे याद है अप्रैल' 2013 में पश्चिम बंगाल में एसएफआई के से जुड़े सुदीप्तो की पुलिस हिरासत में मौत के बाद ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ जो आक्रोश सड़कों पर दिखा था, उसमें आइसा की भी सक्रिय भूमिका रही थी । जाहिर है ऐसा सहयोग परस्पर दोनों संगठनों में होता रहा होगा । इसे दोनों संगठनों की परिपक्वता कहा जा सकता है जो बुनियादी तौर पर किसी वामपंथी छात्र संगठन में दिखाई देती है । इसके बावज़ूद यह बड़ा सच है कि दोनों छात्र संगठनों की एक दूसरे को लेकर भारी आलोचना रही है ।

यहाँ एड्मीशन के दौरान विभिन्न छात्रसंगठन अपना हेल्प-डेस्क लगाते हैं । मेरे लिए यह अलग अनुभव था कि मुझे एड्मीशन से जुड़े कुछ फार्म एबीवीपी के डेस्क पर उपलब्ध कराए गये । यह वही संगठन है जिसे वामपंथी संगठन अपना चिर प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हैं । इस संगठन का चरित्र लाख ढकने के बावज़ूद कहीं भी कभी भी प्रकट हो जाता है । मेरे एड्मीशन में सबसे अधिक सहयोग एसएफआई के साथियों ने किया था । समय कम था इसलिए मेरे कुछ फार्म तक एसएफआई के कार्यकर्ताओं ने भरे थे । एड्मीशन के समय किये गये सहयोग का संगठनों को चुनाव में बहुत फायदा मिलता है । यह फायदा स्वाभाविक रूप से उनको अधिक मिलेगा जो उस दौरान अधिक सक्रिय रहे होंगे । एक वामपंथी छात्र संगठन, जिसके प्रति मेरी आलोचना रही है, के साथियों ने एड्मीशन के दौरान मेरी जो मदद की इसलिए  उनके प्रति जो मेरी कृतज्ञता है, वह मेरा वोट निर्धारित नहीं कर सकती है । 

एसएफआई यहाँ के यूनियन में रही है । पिछले साल अध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव का पद इसी संगठन के पास था । छात्र राजनीति के लिए बेहतर जगह रखने वाले इस कैंपस में एसएफआई के नेतृत्व वाले छात्रसंघ ने आशा के अनुरूप काम नहीं किया है, ऐसा यहाँ के विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं और अपने अनुभव से भी लगता है । 
यहाँ आम्बेडकर स्टूडेंट्स एशोसिएशन (ASA) को मैंने अधिक सक्रिय देखा है । दलित-आदिवासियों के पक्ष में मुखर इस संगठन ने आम छात्रों की समस्याओं को भी सम्बोधित करने में एक हद तक सफलता पाई है । बहुजन स्टूडेंट्स फ्रंट (BSF ), ट्राइवल स्टूडेन्ट्स फॉरम (TSF) आदि संगठनों के साथ आसा ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक संगठन (UDA) नामक एक साझा फॉरम बनाया है । मैं इस फॉरम के सभी उम्मीदवारों को इस बार वोट करता, यदि कांग्रेस पार्टी का छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन (NSUI) भी इस फॉरम का एक घटक नहीं होता । जहाँ तक मेरी जानकारी है, पिछले साल के चुनाव में एनएसयूआई यूनाइटेड डेमोक्रेटिक संगठन का हिस्सा नहीं था ।

तेलंगाना राज्य बनने के बाद के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति के सत्ता में आने के बाद की ठसक इस दल के छात्र संगठन तेलंगाना राष्ट्र समिति विद्यार्थीविभागम (TRSV) के चुनावी अभियान में महसूस की जा सकती है । ऐसे संगठनों का तेलुगू भाषी विद्यार्थियों, जिनमें आंध्रप्रदेश के विद्यार्थी भी शामिल हैं, और देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्यार्थियों से बने इस कैंपस में कितना जनाधार है, यह चुनाव परिणाम आने के बाद ही ठीक-ठीक पता चल सकेगा ।

एबीवीपी का इस कैंपस में ठीक-ठाक जनाधार है । पिछले साल कल्चरल सेकेरेट्री और स्पोर्ट्स सेकेरेट्री का पद इस संगठन को मिला था । यह संगठन हर कैंपस में विद्यार्थियों को अपने रंग में रंग पाने में कमोबेश कामयाब हो जाता है । फिर भी जेएनयू या हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे कुछ विश्वविद्यालयों का माहौल एबीवीपी जैसे संगठनों के बहुत अनुकूल नहीं है । कुछ और संगठन भी चुनाव में हिस्सेदारी कर रहे होंगे, जिनकी पहुँच मुझतक या मेरी पहुँच उन तक नहीं हो सकी है ।

चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी संगठनों के चुनाव अभियान में बेहतर राजनीतिक प्रशिक्षण के अभाव का असर साफ दिखाई दे रहा था । मुद्दों पर आधारित प्रभावशाली संबोधन कर पाने में लगभग सभी संगठन नाकाम रहे, जबकि यहाँ का माहौल और यहाँ की बनावट बेहतर राजनीतिक संवाद के अनुकूल हैं । संभवतः बेहतर राजनीतिक संवाद के अभाव के कारण ही इस कैंपस में चुनाव को लेकर वैसा ही माहौल नहीं बन पाता जैसा जेएनयू में देखने को मिलता है । मेरे सामने जो समस्या है उसको सुलझा पाना मुझे कठिन लग रहा है ।संभवतः मुझे अपने वोट यूडीए और एसएफआई के बीच उम्मीदवारों के आधार पर बाँटना पड़ेगा । उम्मीद है वोट डालने तक तय कर लूँगा । 

पिछले वर्ष उपाध्यक्ष का पद यूडीए के खाते में गया था । यूडीए; दलित आदिवासियों के पक्ष में बात करते हुए संभवतः खुद को गैर दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के बीच सहज नहीं पाता है । इसकी बड़ी चुनौती ऐसे छात्रों के साथ भी संवाद कायम कर सामाजिक न्याय और आम छात्रों के अधिकारों पर आधारित व्यापक समझदारी बनाने की है, जिसकी इस कैंपस में पर्याप्त संभावना है । इस फॉरम को एनएसयूआई जैसे संगठनों से परहेज करना चाहिए, जिसकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है । 

एसएफआई के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उस कार्यशैली को हाँसिल करने की है, जिसकी अपेक्षा किसी भी वामपंथी छात्र संगठन से की जाती है । इस संगठन में बेहतर की छटपटाहट और आंदोलनधर्मिता का अभाव बहुत निराश करता है । 

Monday, September 23, 2013

चंदू का सपना

चंदू को जानना युवा पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है । वे छात्रराजनीति की क्रांतिकारी धारा के निर्माताओं में से एक हैं और इसी धारा की छात्र राजनीति के दुर्लभ उत्पाद भी हैं । वे बेहतर दुनिया की इच्छा रखने वाले युवाओं की क्या करें क्या न करें वाली स्थिति का समाधान हैं । चंदू का जीवन ही चंदू के विचारों की अभिव्यक्ति है । चंदू के यहाँ कथनी-करनी का भेद नहीं हैं । जब कभी विचारों का संकट पैदा होगा या विचार और कर्म के तालमेल की समस्या आएगी, चंदू याद किये जाएंगे । इस आलेख में चंदू से समंबंधित जिन तथ्यों का उल्लेख है, उनका संदर्भ मुख्यतः तीन स्रोतों से लिया गया है । आलेख के नीचे उन स्रोतों की चर्चा की गयी है ।
साभार-http://www.cpiml.org
हमने समाज से बहुत कुछ लिया है, उसे समाज को लौटाना हमारा दायित्व है - यह हमारे समय में हाशिये का विचार है । पूंजीवादी व्यवस्था का प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ ऐसे विचारों के गायब होने की प्रक्रिया तेज होती जाती है । हमारे देश में नब्बे का दशक ऐसे ही विचारों के विलोप की प्रक्रिया का दशक था । वह दशक बीत गया बल्कि नयी सदी का भी एक दशक बीत गया है । ऐसे विचार हाशिये पर होते हुए भी आज तक मिटे नहीं हैं । ऐसे ही विचारों के प्रभाव से परिवर्तनकामी शक्तियाँ निर्मित होती रहती हैं । सामान्यतः यह निर्माण प्रक्रिया धीमी होती है फिर भी शोषण और अन्याय आधारित व्यवस्था के झंडाबरदार इससे बुरी तरह भयाक्रांत रहते हैं । प्रतिकूल समय में ऐसे विचारों को जिंदा रखने व उसे स्थापित करने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है । ईमानदारी से इस तरह के संघर्ष का संकल्प ले लेने के बाद कोई और विकल्प नहीं बचता । यह खतरे उठाने का संकल्प होता है । कहीं कोई सुविधा नहीं बचती । चंदू ने पूरे होशो-हवास में असुविधा का रास्ता चुना था ।

चंद्रशेखर प्रसाद [Chandrashekhar Prasad] उर्फ चंद्रशेखर [Chandrashekhar], जिन्हें प्यार से चंदू [Chandu] कहा जाता था का जन्म 20 सितम्बर 1964 को सिवान [Siwan] जिला मुख्यालय से 2 किमी दूर बिंदुसार [Bindusar] गाँव में हुआ था । वे आठ वर्ष के थे जब उनके पिता जीवन सिंह का देहांत हो गया था । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी । लेकिन माँ कौशल्या देवी चाहती थी कि इकलौते बेटे चंदू की पढ़ाई लिखाई नहीं रूके । चंद्रशेखर ने बारहवीं तक की पढ़ाई सैनिक स्कूल, तिलैया से की । बाद के दिनों में वे नेशनल डिफेंस एकेडमी, पुने में भर्ती हुए । चंदू ने जो विचार और मिजाज पाया था वह सैन्य प्रशिक्षण के माहौल के अनुकूल नहीं था । दो साल बाद उन्होंने एनडीए छोड़ दिया । पटना आ गये । यहाँ  पटना विश्वविद्यालय में वे प्रवेश का प्रयास कर रहे थे । उन्हीं दिनों 15 अप्रैल 1983 को उन्होंने अपनी माँ को एक पत्र लिखा था । यह पत्र चंदू के संघर्ष, उनकी वैचारिक मजबूती और बेहतर दुनिया के लिए उनकी छटपटाहट को प्रकट करता है, इसलिए ऐतिहासिक महत्व का है । पत्र की शुरूआत में चंदू ने एनडीए छोड़ने के बाद की माँ की चिंता को संबोधित किया है । चंदू ने उन्हें  150 /–  के दो ट्यूशन पढ़ाने लगने की सूचना दी है ताकि उनकी माँ आर्थिक चिन्ता से कुछ मुक्त महसूस कर सकें । पटना विश्विद्यालय में सत्र शुरू हो जाने के कारण उस सत्र में प्रवेश की संभावना के क्षीण होने लेकिन प्रयास जारी रखने की सूचना भी उन्होंने अपनी माँ को दी है । लेकिन बाद में यह पत्र सामाजिक चिंताओं पर केन्द्रित हो जाता है और तीव्र से तीव्रतम होता चला जता है । इस पत्र में उन्होंने लिखा है- मुझे इस सामाजिक व्यवस्था से आंतरिक दुश्मनी है क्योंकि मैंने इसकी दी हुई प्रताड़नाओं को भोगा है और तुम्हें भी, अपनी माँ को घुटते हुए देख रहा हूँ । इस व्यवस्था ने हमें पैंतीस साल में कुछ नहीं दिया है सिवाय एक मजबूत बुर्जुआ वर्ग के जो हमें और भी नोच खसोट रहा है । हमको किसी भी प्रकार की सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सुरक्षा नहीं दी गई है । अगर कोई कमजोर को मार देता है तो सब आँख मुँद लेते हैं परंतु किसी मजबूत आदमी को मार देने पर हंगामा हो जाता है । आखिर हमें अपना संवैधानिक अधिकार भी तो नहीं मिल रहा । आजादी के लिए हम यूँ ही नहीं लड़े थे । हमने चाहा था एक देश, जहाँ सब सुखी हों । क्या यही वो सुख है ? ”  पत्र के अंत मे उन्होंने लिखा हैशायद तुम भी किसी दिन गोर्की के उपन्यास माँ की कैरेक्टर बनो और मैं तुम्हारा बेटा उसका नायक जो कभी भी सड़ी हुई व्यवस्था से समझौता नहीं करता ।

पटना विश्वविद्यालय उनकी वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़ाव का पहला गवाह बना । एआइएसएफ [AISF] से अपनी छात्र राजनीति शुरू करने वाले और इस संगठन के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुँचने वाले चंद्रशेखर का आइसा [AISA] के साथ आना एक ऐसी घटना है जिसे समझा जाना बहुत जरूरी है । एआइएसएफ [AISF] और एसएफआइ [SFI] जैसे वामपंथी छात्र संगठन अपने वामपंथी दायित्वों से दूर जाने लगे थे । सिद्धांतों पर बहस करने मात्र से वाम राजनीति नहीं हो सकती । अपने आदर्श कम्युनिस्ट पार्टियों भाकपा और माकपा की तरह इनकी कथनी और करनी में आए फर्क को चंदू ने पहचाना और उन्होंने बतौर एक ईमानदार संगठन आइसा की पहचान की । इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि सीपीआई के कम्युनिस्ट छद्म को समझ पाने के बाद उन्होंने भाकपा (माले) को ईमानदार कम्युनिस्ट ताकत के बतौर पहचाना । यह घटना बताती है कि किसी कम्युनिस्ट संगठन में काम करते हुए भी अपनी आँखों और दिमाग को खोलकर रखना कितना जरूरी होता है ।  सामान्यतः किसी कम्युनिस्ट पार्टी में कार्य करते हुए उसकी नीतियों से असहमत होना कठिन होता है । असहमतियों के स्वागत की संस्कृति यदि उस कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं हो तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं । कम्युनिस्ट राजनीति के बुनियादी कार्यक्रम के प्रति कार्यकर्ताओं की आस्था के कारण वे पार्टी के भीतर अप्रिय स्थिति से बचना चाहते हैं । उन्हें लगता है कि ऐसी स्थिति कम्युनिस्ट कार्यक्रम को कमजोर बनाएगी-हालाँकि यह एक खतरनाक भ्रम मात्र होता है । ऐसी स्थिति खास तौर पर तब बनती है जब देश में कम्युनिस्ट राजनीति मजबूत स्थिति में नहीं हो यानी वह अपनी स्वीकृति के लिए जूझ रही हो । ठीक इससे उलट स्थिति यह भी हो सकती है कि जब कोई कम्युनिस्ट पार्टी मजबूत स्थिति में हो तो उसके कार्यकर्ता पार्टी के गलत लाइन के खिलाफ जाने का साहस आसानी नहीं कर पाएँ । लेकिन इतिहास में कम्युनिस्ट राजनीति में जब कभी कहीं पार्टी के वैचारिक भटकाव के खिलाफ किसी ने मुखर होकर ठोस निर्णय लिया है, परिणाम बेहतर आया है ।

साभार-http://zeenews.india.com
जेएनयू में जब चंद्रशेखर आए थे तब आइसा वहाँ बना नहीं था । यह आइसा के निर्माण का दौर था । चंद्रशेखर में संगठन विस्तार करने की भारी क्षमता थी । तपस रंजन ने अपने आलेख जे.एन.यू. में चंदू की राजनीति : तब और अब में, जब तपस खुद एसएफआइ में थे, और एसएफआइ की नकारात्मक राजनीति से उनमें और उनके संगठन के कई अन्य छात्र नेताओं में निराशा थी, उन दिनों को याद करते हुए लिखा है – इस पूरे समय चंद्रशेखर हमारे साथ गहरा राजनीतिक संवाद बनाए हुए थे । मेरे सवाल एसएफआइ में मेरे प्रशिक्षण के आधार पर ही होते थे लेकिन हँसमुख चंदू ने बड़े धैर्य के साथ हममें आइसा के जुझारू और रचनात्मक प्रयोगों के प्रति विश्वास पैदा किया । इसी आलेख में तपस ने लिखा है- आइसा के नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं के दृढ़निश्चय ने कैंपस के तमाम छात्रों के साथ संवाद बना लिया और मेरे साथ भी । इसके बाद चंदू ही थे जो मुझे और कई दूसरे लोगों को उनकी राजनीतिक बहस हल करके आइसा में ले आए ।

आइसा [AISA] ने जेएनयू [JNU] में अपने निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही वहाँ के छात्रसंघ में अपनी जगह बना ली । पारंपरिक रूप से एसएफआइ का गढ़ रहे जेएनयू में आइसा ने अपने क्रांतिकारी रूझान व सामाजिक न्याय के प्रति अपनी आस्था के बदौलत यह जगह हासिल की थी । यह एसएफआइ की सुविधापरस्त राजनीति का जवाब भी था । चंद्रशेखर 1991-92 और 1992-93 छात्रसंघ चुनाव [JNSU] में आइसा से महासचिव पद के उम्मीदवार थे । लेकिन आइसा और उनकी पहली जीत 1993-94 छात्रसंघ चुनाव में हुई जब वे उपाध्यक्ष [Vice President] चुने गए थे । 1994-95 व फिर 1995-96 में वे इस छात्र संघ के अध्यक्ष [President] रहे । इस दौरान इन्होंने अपनी चिंताओं से मुँह नहीं मोड़ा बल्कि इन्होंने इस अवसर का उपयोग अपने बेहतर राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए किया जिसके माध्यम से वे खुद को आगे की लड़ाई के लिए तैयार कर रहे थे । यह प्रशिक्षण जेएनयू और इससे बाहर के संघर्षो से मिल रहा था । इसी बीच 1995 मे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल में आयोजित इंटरनेशनल यूथ कॉन्फ्रेंस में उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला । यहाँ उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफदारी करने वाले प्रस्तावों के विरोध में तीसरी दुनिया के छात्रों को संगठित करने का प्रयास किया । अंततः उन्होंने तीसरी दुनिया के अपने कुछ मित्रों के साथ उस सम्मेलन का बहिष्कार किया । बाद में कोरियायी प्रशासन के कोप का खतरा उठाते हुए भी उन्होंने वहाँ के उग्र विचारों वाले वामपंथी छात्रनेताओं से सम्पर्क किया । कोरिया का एकीकरण विषय पर छात्र-युवाओं की एक बड़ी रैली आयोजित की गयी जिसे चंदू ने संबोधित किया । इस प्रसंग का उल्लेख दीपांकर भट्टाचार्य ने अपने आलेख ‘Crossing the Barriers’ में किया है । गलत का विरोध करना उनका चरित्र था । गोपाल प्रधान ने चन्द्रशेखर के एम.फिल. लघु शोध प्रबंध- लोकप्रिय संस्कृति का द्वंदात्मक समाजशास्त्र – संदर्भ : बिदेसिया को किताब के रूप में संपादित करते हुए एक घटना का जिक्र किया है जिसे गलत को बर्दाश्त न कर पाने वाले उनके चरित्र की पुष्टि होती है - दिल्ली के बसों में छेड़खानी आम बात है । 670 के किसी बस में कंडक्टर किसी महिला के साथ बदतमीजी कर रहा था । चंदू हत्थे से उखड़ गये । बस वालों ने बस मार्कंडेय सिंह (तत्कालीन गवर्नर, दिल्ली)  के अहाते में रोकी । वहाँ के सुरक्षाकर्मियों के साथ मिलकर कंडक्टर-ड्राइवर ने चंदू को पीटा । कई घंटों की कोशिश के बाद एक पुलिस जिप्सी में शिकायत दर्ज हो सकी लेकिन हुआ कुछ नहीं ।

साभार- http://idubba.com
जेएनयू की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वे अपने गृह-क्षेत्र सिवान लौटे । सिवान उन दिनों सामंती ताकतों का गढ़ हुआ करता था । इन सामंती ताकतों के शोषण के खिलाफ इस जिले में भाकपा (माले) का संघर्ष जारी था । भाकपा (माले) का राजनीतिक पार्टी के तौर पर इस जिले में जनाधार व्यापक होता जा रहा था । यह वहाँ से जनता दल के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन [Shabuddin] को भयभीत कर रहा था । इस स्थिति में शहाबुद्दीन ने खुद को सामंतों के मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया । शहाबुद्दीन का सिवान में आतंक था । दिनदहाड़े हत्या करवा देने वाले शहाबुद्दीन का कोई बाल भी बाँका नहीं कर पाता था । उसके खिलाफ एक व्यक्ति भी, बतौर गवाह पेश होने के लिए तैयार नहीं होता था । इसी शहाबुद्दीन के साथ  सामंतो का गठजोर हुआ । शहाबुद्दीन ने उन्हें यकीन दिलाया कि भाकपा (माले) से उन्हें सिर्फ वही निजात दिला सकता है । इसके बाद भाकपा (माले) के प्रतिबद्द नेताओं की हत्यायों का सिलसिला सिवान में शुरू हो गया था । सिवान लौटने के अपने फैसले से पूर्व चंदू को वहाँ के हालात की पर्याप्त जानकारी थी । सिवान में भाकपा (माले) के कार्यकर्ताओं पर शहाबुद्दीन-सामंती गठजोर के सुनियोजित हमलों पर उन्होंने कुछ आलेख भी लिखे थे । सिवान में इस जुझारू युवा ने कुछ ही दिनों में जबरदस्त लोकप्रियता हाँसिल कर ली थी । सामंतों के शोषण और दबंगों के आतंक से मुक्ति का भाकपा (माले) का एजेंडा, चंदू निर्भीक होकर आम जनता के बीच ले जा रहे थे । वर्षों से घुट रही सिवान की आम जनता के लिए चंदू आशा की किरण बन कर आए थे । इसलिए निहत्थे चंदू भी शहाबुद्दीन और अन्य सामंतों के लिए भय का विषय हो गये थे । 2 अप्रैल 1997 को भाकपा (माले) ने बिहार बंद का आह्वान किया था । इसी सिलसिले में 31 मार्च 1997 को सिवान के जेपी चौक पर चंदू  एक नुक्कड़ सभा को संबोधित कर रहे थे । तभी मोटर साइकिल सवार कुछ लोगों ने उन पर और भीड़ पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी । यह दिन दहाड़े किया गया जघन्य और कायरतापूर्ण कृत्य था । इस हमले में चंद्रशेखर के अलावा माले नेता श्यामनारायण यादव और भुट्टन मियाँ की मौत हो गयी थी । वहाँ मौजूद लोगों ने हत्यारों की पहचान शहाबुद्दीन के गुर्गों के रूप में की थी । इस घटना के बाद देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों और उसके दमन के प्रयास का भी अपना एक ऐतिहासिक महत्व है । इस घटना के बाद चंदू का अपने माँ को लिखे पत्र का गोर्की के उपन्यास माँ की चर्चा वाला अंश तब अक्षरशः सच साबित हो गया जब चंदू की माँ बेटे के हत्यारों को फाँसी दिलाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शनों में नेतृत्वकारी भूमिका में आ गयी । एक और प्रसंग चंदू की माँ की गरिमा को बहुत बढ़ा देता है । तात्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने तत्काल राहत के बतौर चंदू की माँ को एक लाख रूपये का चेक भेजा था । चंदू की माँ ने वह चेक लौटाते हुए प्रधानमंत्री को लिखा- इस एवज में कोई भी राशि लेना मेरे लिए अपमानजनक है ।इसी पत्र में उन्होंने लिखा है- मुझे यह जानकर और भी दुख हुआ कि इसकी सिफारिश आपके गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त ने की थी, वे उस पार्टी के महासचिव रह चुके हैं जहाँ से मेरे बेटे ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी । मुझ अनपढ़ गंवार माँ के सामने आज यह बात और भी साफ हो गयी कि मेरे बेटे ने बहुत जल्दी ही उनकी पार्टी क्यों छोड़ दी । इस पत्र के माध्यम से मैं आपके साथ साथ उन पर भी लानतें भेज रही हूँ जिन्होंने मेरे साथ यह घिनौना मजाक किया है और मेरे बेटे के जान की ऐसी कीमत लगायी है । एक ऐसी माँ के लिए जिसका इतना बड़ा और इकलौता बेटा मार दिया गया हो- और जो यह भी जानती हो कि उसका कातिल कौन है – एक मात्र काम जो हो सकता है,वह यह है कि कातिल को सजा मिले । मेरा मन तभी शांत होगा महोदय । इस पत्र को पढ़ते हुए लगता है कि चंदू के चंदू होने में उनकी माँ कौशल्या देवी के विचारों और व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी । यह दीगर है कि शहाबुद्दीन को आज तक सजा नहीं मिल सकी है ।

जेएनयू [JNU] को क्रांतिकारी वाम राजनीति [Revolutionary Left Politics] का पाठशाला माना जाता है । जेएनयू के किले में क्रांति की बात करना अनुकूल है और अक्सर लोगों को अपना दोहरा चरित्र आनंद देता है । लेकिन चंदू ने यह साबित किया कि वे दोहरेपन के खिलाफ थे । वे भविष्य में पूछे जाने वाले सवालों की कल्पना कर पा रहे थे, और भविष्य में इन सवालों के आगे शर्मिंदा नहीं होना चाहते थे । वे कहते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी कि तब आप कहाँ थे, जब रोज के रोज लोग मारे जा रहे थे ? तब आप कहाँ थे, जब कमजोरों की आवाजों को कुचला जा रहा था ? जेएनयू में अपनी महात्वाकांक्षा को स्पष्ट करते हुए चंदू ने कहा था- हम अगर कहीं जाएँगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाज की शक्ति होगी जिसे डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं । इसलिए अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह की तरह शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी न कि जेनयू से इलेक्शन में काट-जोड़ कर जीतने या हारने की महत्वाकांक्षा होगी। तब यह बात कई लोगों को अविश्वसनीय लगी होगी ।

कई लोगों के लिए सिवान एक दुःस्वप्न है । चंदू सिवान के लिए सुंदर सपने देखा करते थे । उनके लिए सिवान, सिवान नहीं था- सिवान एक जिम्मेदारी थी जिससे वे मुँह नहीं मोड़ सकते थे । धीरेन्द्र झा ने अपने आलेख नई पीढ़ी के प्रकाश स्तंभ थे कॉ. चंदू में तात्कालीन माले [CPI-ML] महासचिव विनोद मिश्र के उस सवाल की चर्चा की है जो उन्होंने पटना के पार्टी कार्यालय में धीरेन्द्र से चंदू की उपस्थिति में पूछा था । सवाल था- चंदू को युवा संगठन की बागडोर देना कैसा रहेगा ? धीरेन्द्र ने लिखा है कि उन के कुछ बोलने से पहले ही चंदू बोल पड़े- मुझे अब सीवान में ही रहने दीजिए । किसान संघर्षों और ग्रामीण गरीबों की राजनीतिक दावेदारी के स्थापित हो रहे नए-नए इतिहास से अभी तो मेरा तादम्य स्थापित होना शुरू ही हुआ है । मैंने सीपीआइ के जमाने में भी ऐसा सपना पाला था, लेकिन सीपीआइ के सत्ता में समाहित होने की प्रक्रिया के चलते किसान संघर्षों से उनके विलगाव को हमने करीब से देखा है । इसलिए मुझे इतिहास ने जो यह अवसर प्रदान किया है उसमें ही रमने दीजिए ।  ऐसी थी चंदू की प्रतिवद्धता जबकि दिल्ली तब भी सुविधाजनक शहर हुआ करता था । जेएनयू का कैंपस तब भी खूबसूरत था । बिहार तक रेल तब भी तय घंटे से कई घंटे देरी से पहुँचती थी । बिजली तब भी वहाँ घंटों गायब रहती थी । एक सिरफिरा शासक तब भी वहाँ राज करता था । वे कहते थे - गाँव के लोग खुश होंगे कि अपना लड़का पढ़-लिख कर वापस आया है ।

चंदू का सपना शोषित पीड़ित जनता की मुक्ति का सपना था । सड़ी हुई व्यवस्था को उखाड़ पेंकने का सपना था । शोषकों, अत्याचारियों को जनता की चेतना के बल पर परास्त करने का सपना था । कुल मिला कर एक सुंदर दुनिया का सपना था । ऐसे सपने हम सबने देखे हैं । इस तरह इन सपनों में कुछ खास नहीं है । खास है इसे पूरा करने का तरीका । खास है उस रास्ते का चुना जाना जिस रास्ते पर पता नहीं होता कि कब सीना छलनी हो जाए । खास है वह साहस जो चंदू में था । चंद्रशेखर इस तरह युगों तक प्रासंगिक बने रहेंगे । क्रांति के सपने बेचने वाले दोहरे चरित्र के लोगों पर हँसते रहेंगे । हँसेगें नहीं बस थोड़ा सा मुस्करा देंगे । चंद्रशेखर की मुस्कान बहुत आकर्षक थी, बहुत अर्थपूर्ण । पोस्टरों से निकल कर चंदू लेकिन यह पूछने नहीं आएँगे कि तुम सब जो यह नारा देते हो कि मेरे सपने को मंजिल तक पहुँचाओगे, वह पता है कैसे पहुँचा सकोगे ? लेकिन जब कभी चंद्रशेखर के सपने पूरा करने के संकल्प पर ईमानदारी से विचार किया जाएगा तो वह रास्ता भी दिख जाएगा । चंदू ने सिर्फ सपने नहीं देखे थे,  उसे पूरा करने के रास्ते भी तैयार किये थे । छेनी-हथोड़ों से पथरीली मिट्टियों को तराश कर तैयार किये गये उन रास्तों पर लंबे चुभने वाले घास जरूर उग आए हैं ।

 सिवान में स्थापित चंदू की आदमकद प्रतिमा
साभार-
 http://idubba.files.wordpress.com

संदर्भ स्रोत-
1. अजय भारद्वाज के द्वारा बनायी गयी चंदू पर केन्द्रित डाक्युमेंट्री- एक मिनट का मौन । चंदू पर किया गया यह एक महत्वपूर्ण काम है । चंदू के जीवन, विचारों, उनके संघर्ष, उनकी शहादत और उसके बाद के अभूतपूर्व छात्र-युवा-जन आंदोलनों को इस डाक्युमेंट्री में बेहतरीन ढंग से संजोया गया है । यू-ट्यूब पर इस डाक्युमेंट्री को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें- एक मिनट का मौन
2. आइसा का केन्द्रीय मुखपत्र- नई पीढ़ी का मार्च 2008 का अंक । यह अंक चंद्रशेखर पर केन्द्रित है । इसे चंदू की शहादत के एक दशक पूरा होने के अवसर पर प्रकाशित किया गया था । इस आलेख में जिन अन्य आलेखों की चर्चा है वे इसी पत्रिका में प्रकाशित हैं । 
संपादन - रवि राय, परवेज़, दीपक, क्रांतिबोध, अवधेश / विशेष संपादन सहयोग- मृत्युंजय / आवरण व सज्जा-अशोक सिद्धार्थ.  
प्रकाशक – इंद्रेश मैखुरी, यू-90, शकरपुर, नई दिल्ली.
3. चंदू के द्वारा जेएनयू के राजनीति विज्ञान विभाग में जमा कराए गए एम.फिल. लघु शोध प्रबंध – लोकप्रिय संस्कृति का द्वंदात्मक समाजशास्त्र – संदर्भ : बिदेसिया, इसे किताब के रूप मे गोपाल प्रधान ने संपादित किया है । गोपाल प्रधान ने इसकी भूमिका में चंदू से जुड़े कुछ प्रसंगों का जिक्र किया है । इस भूमिका के कुछेक प्रसंग इस आलेख में आए हैं ।  
प्रकाशक - सांस्कृतिक संकुल, जन संस्कृति मंच, टी-10, पंचपुष्प अपार्टमेन्ट, अशोक नगर, इलाहाबाद-211001 (उत्तर प्रदेश)


Saturday, August 24, 2013

दीपांकर भट्टाचार्य के नाम खुला पत्र

साभार-नवभारत टाइम्स
कामरेड, 23 अगस्त 2013 के दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय संस्करण (पृष्ठ सं-10) में प्रकाशित एक ख़बर से व्यथित होकर यह पत्र लिख रहा हूँ । ख़बर में आपके हवाले से कहा गया  है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाकपा (माले) बिहार में अंतिम क्षण तक वाम एकता का प्रयास करती रहेगी । वाम एकता माने- भाकपा, माकपा और भाकपा (माले ) की एकता । सामान्यतः वाम एकता के इस प्रयास को सकारात्मक माना जाएगा लेकिन मेरी समझ इसे सकारात्मक मानने के लिए तैयार नहीं है । पिछले दिनों फेसबुक पर मित्र आकाश ने एक कमेंट कर पूछा- भाकपा (माले) के बारे में आपका क्या खयाल है, जो भाकपा और माकपा की नीतियों का विरोध भी करती है और चुनावी फायदे के लिए गठबंधन भी ? यह कमेंट एक पोस्ट पर किया गया था जिसमें गलत नीतियों की वजह से भाकपा और माकपा को मैंने अप्रासंगिक कहा था । मैं इसे एक वाजिब सवाल मानता हूँ । मैं आइसा का एक बहुत सक्रिय तो नहीं लेकिन समय-समय पर सहयोगी भूमिका निभाने वाला एक सदस्य रहा हूँ । आइसा देश में राजनीतिक विकल्प के तौर पर भाकपा (माले) पर विश्वास जताती है । संभवतः असहज कर देने वाला यह सवाल मेरी तरफ इसी लिए उछाला गया था । मैंने प्रतिउत्तर में लिखा कि भाकपा (माले) को इसका जवाब देना होगा । आज इस खबर को पढ़ते हुए मुझे लगा कि सवाल पूछने का यह सही वक्त है ।

ओम थानवी - आशा है आप इस नाम से परिचित होंगे । फेसबुक के माध्यम से अक्सर ही उनकी एक चिंता मुझ तक पहुँचती है । आशय होता है कि कोई उन्हें बताए कि इस देश में इतनी वामपंथी पार्टियाँ क्यों हैं ? भाकपा है तो फिर माकपा या भाकपा (माले) की क्या जरूरत है ? इसी तर्ज पर वे कहते हैं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के रहते अन्य वामपंथी लेखक संगठनों  जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) की क्या जरूरत आन पड़ी ? उनकी यह जिज्ञासा मुझे बालसुलभ लगती रही है । वामपंथी दलों का विभाजन किन कारणों से हुआ और इस तरह के विभाजन का होना कितना जरूरी था- यह कोई ठीक से समझना न चाहे तो समझा पाना श्रमसाध्य तो हो ही जाता है । ठीक इसी तरह यह मान लेना कि लेखक किसी राजनीतिक विकल्प में आस्था रख सकता है, कई लोगों के लिए बहुत कठीन है ।  वामपंथी राजनीति के प्रति आस्थावान लेखक विभिन्न वामपंथी पार्टियों के समर्थक और उनके लेखक संघों  के सदस्य हो सकते हैं, यह बात भी कुछ लोगों को नहीं पचती । लेकिन ठीक इस समय जब मैं आपको यह खुला पत्र लिख रहा हूँ, मुझे लग रहा है कि जिसे मैं बालसुलभ या अपरिपक्व जिज्ञासा, सवाल या सोच मानता रहा हूँ, उसमें दम है । मेरी नजर में, यह दम आया है वाम एकता की बात करने के बाद ।

कामरेड, हम अपने आंदोलनों में एक नारा देते हैं जिसका आशय होता है- एकीकृत जनता हमेशा विजयी होती है । एकता, एकीकरण जैसे शब्दों के प्रति हमारा सौंदर्यबोध बेहद मजबूत है । वाम एकता सुनते हुए भी सहसा ऐसा ही सौंदर्यबोध जगता है लेकिन यह जल्दी ही विकृत हो जाता है । इतिहास में भाकपा और माकपा ने जो गलतियाँ की है उसका जिक्र भाकपा (माले) के दस्तावेजों में बखूबी हुआ है । इसलिए इतिहास कुरेदने की जरूरत मुझे महसूस नहीं हो रही है । सोचने समझने की उम्र होने पर जो मैंने देखा और समझा है उसी में से कुछ का जिक़्र कर देना काफी है । आशा है आप सिंगुर और नंदीग्राम नहीं भूले होंगे । सिंगुर में सेज (SEZ) कानून के अन्तर्गत टाटा मोटर्स के लिए कारखाना और नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगवाने के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण करने का प्रयास और आंदोलन को कुचलने के लिए हुए जनसंहार और सौकड़ों किसानों पर दर्ज फर्जी मुक्कदमें यह सावित करने के लिए काफी हैं कि खुद को मार्क्सवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने वाली पार्टियाँ वास्तव में मार्क्सवादी हो भी, जरूरी नहीं है । हाल में, क्या वह वामपंथ पर हावी बंगाली अस्मिता नहीं थी, जिसने माकपा को खाँटी कांग्रेसी प्रणव मुखर्जी  को राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन की प्रेरणा दी ? आज भी यह बेहद शर्मनाक लगता है कि इन वामपंथी पार्टियों ने उस कांग्रेस सरकार को सहारा दिया जिसके मुखिया नव उदारवाद मॉडल के मास्टर माइंड मनमोहन सिंह थे।
   
कामरेड, राजनीति में कुछ तर्क पूर्वानुमानित होते हैं । मसलन भाकपा (माले) की ओर से यह तर्क आ सकता है कि साम्प्रदायिक व पूँजीवादी ताकतों को शिकस्त देने के लिए वाम ताकतों का एक होना जरूरी है । इसी तर्क के आधार पर सपा, बसपा, राजद, जद(यू) और लोजपा जैसी अवसरवादी ताक़तों से भी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हाथ मिलाती रही हैं या मिला सकती हैं । मुझे ऐसे तर्क एक साथ कातर और खतरनाक लगते हैं । साम्प्रदायिक ताकतें यदि जोर-तोड़ से सत्ता में आ जाती हैं तो देश बर्वाद हो जाएगा-इस आशंका को हवा देना बंद कर देना चाहिए, विशेष कर जुझारू वामपंथी पार्टियों को । साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कम्युनिस्ट विचारों को ताक पर रख देना कहीं से उचित नहीं है । संसदीय राजनीति में विरोध की भूमिका कभी खत्म नहीं होती है । कायदे से यह होगा कि सत्तासीन साम्प्रादायिक ताकतें जब कभी देश की पंथनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगी, ईमानदार वाम ताकतें संसद से सड़क तक विरोध का ऐसा वातावरण तैयार कर देंगी कि साम्प्रदायिक ताकतों को अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का भलि-भाँति एहसास हो जाएगा । साम्प्रादायिक या पूँजीवादी ताक़तों का सत्ता में आना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन किसी भी खतरनाक मंशा को हम नाकाम कर देंगे - किसी ईमानदार वामपंथी पार्टी का यही स्टेंड हो सकता है । भाकपा और माकपा का ऐसा स्टेन्ड कभी नहीं रहा है । इन पार्टियों ने अपने कम्युनिस्ट चरित्र का अनेक अवसरों पर गला घोंटा है । भाकपा और माकपा जैसी पार्टियों से चुनावी तालमेल भाकपा (माले) को भी इसी कतार में खड़ा कर देगा ।

कामरेड, अपनी गलतियों को मान कर सुधार का संकल्प शुद्धिकरण का प्रयास कहलाता है । माकपा, भाकपा का ऐसे प्रयासों से बैर रहा है । ये पार्टियाँ ऐसा प्रयास भी करती तो उनसे गठबंधन को जायज ठहराया जा सकता था । बड़े जन आंदोलनों में जो दल एक साथ नहीं आ सकते, कम्युनिस्ट मूल्यों के लिए जो साथ लड़ते नहीं, उनमें चुनावी तालमेल ,माफ करिएगा ,घाघ राजनीति का नमूना है ।

अब कुछ बेहद अप्रिय बातें । बिहार इस समय भारी विकल्पहीनता से जूझ रहा है । ऐसे में भाकपा (माले) जिस जनविकल्प की बात करता है, उसकी मजबूत दाबेदारी पेश कर पाने में वह असफल रहा है । बिहार के सड़कों पर सबसे अधिक सक्रिय  दिखने वाली इस पार्टी में संभवतः राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हो गया है । बिहार के अनेक युवाओं से मेरा बहुत निकट का परिचय है जो दिल्ली में रह रहे हैं और माले की राजनीति के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं । दिल्ली में हुए कई जनआंदोलनों में वे खुद को एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित कर चुके हैं । माले बिहार में इस उर्जा का उपयोग कर पाने में असफल रहा है । बहुत संभव है कि इन युवाओं को चंद्रशेखर के रास्ते चलने की अपेक्षा दिल्ली की सड़कें ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा प्रतिष्ठा दिलाने वाली लगती हों । ऐसे माहौल में भाकपा माकपा का दामन थामने का विचार आ सकता है, ऐसा मुझे लगता है । मैं आपसे कहता हूँ और बहुत जोर देकर कहता हूँ कि उन वामपंथी ताकतों का वहिष्कार बेहद जरूरी है जिनकी नीतियों ने वामपंथ के प्रति जनता में मोहभंग पैदा किया है । उग्र राजनीति अक्सर एकाकी होती है । एक बेहतर वाम विकल्प यदि देश के सामने आएगा तो वह वामपंथी राजनीति की बुराइयों का निषेध करते हुए ही आएगा । मुझे आशा है कि भाकपा (माले) भाकपा और माकपा से चुनावी गठबंधन करने का ईरादा छोड़ देगी । इसी क्रम में ध्यान आया कि हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वास प्रस्ताव में उनका समर्थन करने वाली भाकपा की नीतीश सरकार से नजदीकियों की जानकारी होने से आपने इंकार किया है । मुझे हैरानी हुई । भाकपा (माले) ने नीतीश सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरने का साहस लगातार दिखाया है । लेकिन वाम एकता की महत्वाकांक्षा की वजह से भाकपा और जद(यू) की नजदिकियों की सूचना से आपका इंकार करना, बेहतर राजनीति का संकेत नहीं है । मुझे अपनी राजनीतिक समझदारी का गुमान नहीं है । आप चाहें तो मेरी बातों को तार्किक ढंग से नकार कर मुझे समझा सकते हैं । ईमानदार और गैरईमानदार राजनीति का फर्क तो जनता को तय करना है । शुभकामनाओं सहित-

कुमार सौरभ


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