Wednesday, December 13, 2017

**********मुक्तिप्रसंग का लोकतंत्र**********

राजकमल चौधरी [साभार : मैथिलीजिन्दाबाद.कॉम]
  मुक्तिप्रसंग का लोकतंत्र* 
(राजकमल चौधरी की कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ का एक पाठ)

        मुक्तिप्रसंग’ के पाठकों के पास एक सुविधा यह है कि इसकी रचना अवधि के दौरान कवि राजकमल चौधरी की बाह्य परिस्थितियों और मनोजगत को समझने में मदद करने वाली सामग्रियाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं । यह कविता फरवरी 1966 से जुलाई 1966 तक की अवधि में लिखी गयी थी । उन दिनों राजकमल चौधरी पटना अस्पताल के राजेन्द्र सर्जिकल वार्ड में भर्ती थे । फरवरी के अंतिम दिनों में असह्यनीय पेट दर्द और तीव्र मुत्रावरोध की शिकायत के बाद उन्हें यहाँ लाया गया था । शुरू में कैंसर की आशंका व्यक्त की गयी थी । बाद के मेडिकल जाँच रिपोर्टों के आधार पर कैंसर की तो नहीं, लेकिन, मैलिग्नेट लिम्फो सर्कोमो नामक जिस बीमारी की आशंका व्यक्त की गयी थी, वह भी जानलेवा थी । सर्जिकल ऑपरेशन ही एक मात्र निदान था ।[1] राजकमल का घोर असुरक्षाबोध से भर जाना स्वाभाविक था । मृत्यु की आशंका ने मन को बहुत अशांत कर दिया था । तब उनकी उम्र तकरीबन साढ़े छत्तीस वर्ष थी । मार्गदर्शन की उम्मीद में उन्होंने अस्पताल से ही वात्स्यायन जी को एक पत्र लिखा था । अस्पताल में ही उन्हें अपने पत्र का उत्तर भी मिला । 25 मार्च 1966 को लिखे गये वात्स्यायन जी के आत्मीय पत्र का एक अंश इस तरह था- स्वीकार के बाद मृत्यु को हटाकर एक ओर रख दिया जा सकता है, और यही मैं आपसे कहना चाहता हूँ । यह स्वीकार हराता नहीं जीने का बल भी देता है । [2] पत्र में लिखी बातों को पढ़कर राजकमल का मन दृढ़ अवश्य हुआ था, लेकिन जीने की उत्कट इच्छा, मृत्यु की आशंका, भयावह पीड़ा और मृत्यु को स्वीकार कर उसे अलग रख देने के प्रयास का आपसी तनाव उन्हें बहुत बेचैन किये रहता था । 11.04.66 को मैथिली के साहित्यकार जीवकान्त को सम्बोधित एक पत्र में उन्होंने लिखा- रोग बहुत कठिन बहुत कष्टकर है । लेकिन जीना है । [3] कभी असह्य पीड़ा के क्षणों में वे अपनी डायरी में लिखते- ‘Please stop the world. I want to get off from this earth” [4]
इन कुछ प्रसंगों से गुजरकर यह समझा जा सकता है कि मुक्तिप्रसंग बेहद असामान्य मनःस्थिति में लिखी गयी कविता है । इसकी भूमिका में राजकमल ने लिखा है – मुक्तिप्रसंग मेरा वर्तमान है ।” और यह भी लिखा है कि - जिजीविषा और मुमुक्षा-इस कविता के मूलगत कारण हैं । [5]
इस कविता की शुरूआत आत्मालाप से होती है, जिसमें जिजीविषा और मृत्यु की प्रबल आशंका के द्वन्द्व से निर्मित बिम्बों की प्रचूरता है – ‘दोनों आँखों की ज्वालामुखी पिघल जाने के उपरांत / मैं उसकी बाँहों में / यूनिसेफ-एंबुलेंस की दुर्गति / मेरे नशे में डूबी हुई / मैं ही प्राप्त करूँगा / इस नगरवधू को महाश्मशान बनाने का श्रेय / मेरे ही रक्त के शंख चक्र सामुद्रिक स्वाद में / जलते हुए नाम मेरे होठ दुहराते हैं / वही एक शब्द बार-बार / बीजमंत्र  वही एक कामतंत्र / छत से पलंग तक झूलती हुई रस्सी का फंदा और सर्जिकल अस्पताल तक की स्वप्न यात्रा में कहता है उपाध्याय / कुछ नहीं होगा तुम्हें / वैसा जो नहीं हुआ है अब तक मर्मांतक / किंतु मेरा चेहरा मेरी गर्दन मेरे कंधे काले पत्थर की अपनी बाँहों में समेट कर वह मुस्कुराती है / वही होगा वही होगा / रोक लिया गया था अब तक जिसे विपरीत ऋतुओं और मांगलिक नक्षत्रों के कारण..[6]
इस कविता की भूमिका में राजकमल ने वात्स्यायन जी के पत्र का संदर्भ लेते हुए लिखा है – “मृत्यु की सहज स्वीकृति से देह की सीमाओं, संगतियों और अनिवार्यताओं से मुक्त हुआ जा सकता है । इस वर्ष फरवरी से जुलाई तक प्रत्येक शनिवार को ऑपरेशन थियेटर के सफेद टेबुल पर संज्ञाहीन होते हुए, मैंने ऐसा अनुभव किया है । मैंने अनुभव किया है कि स्वयं को अपने अहं से मुक्त किया जा सकता है ।”[7] स्वयं को अहं से मुक्त किये जा सकने का अनुभव संभवतः इस कविता में भी उनके आत्म की परिधि से बाहर आने में सहायक रहा होगा । आत्ममुक्ति की चिंता के साथ शुरू हुई कविता मुक्तिप्रसंग धीरे-धीरे दुनियाभर की मुक्तिकामी आकांक्षाओं से अपना सम्बंध स्थापित कर लेती है । कविता अपने समय के कई अनुत्तरित प्रश्नों से जूझने लगती है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से एक जिम्मेदार दुनिया की उम्मीद जगी थी । धीरे धीरे यह छलावा साबित होने लगी । संयुक्त राष्ट्र संघ कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों की कठपुतली बन कर रह गया । दुनिया भर में जनता ने लोकतंत्र के भरोसे जो सपने देखे थे, वे टूटने लगे । भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और अस्वास्थ्य से जूझ रही जनता के लिए हथियारों और बारूद के ढेर जमा किये जा रहे थे । ‘मुक्तिप्रसंग’ में यह सब दर्ज हुआ है दैनिक समाचार पत्रों में वियतनाम हिंदेशिया कांगो रोडेशिया / अपने देश में एटम बम बनेगा नहीं बनेगा ।
सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र, अन्य राष्ट्रों के शोषण के नये-नये तरीके इजाद कर उन्हें लगातार आजमा रहे  थे । राष्ट्रों की प्रभुता और अखंडता के नाम पर क्रूरतापूर्वक दमन का दौर भी जारी था । साठ के दशक तक हमारे देश के सोचने समझने वाले युवाओं के सामने भी यह स्पष्ट होने लगा था, कि लोकतांत्रिक युग के नाम पर दुनिया भर में फरेब चल रहा है । स्वाभाविक रूप से इन युवाओं की भी लोकतंत्र से बहुत उम्मीदें रही होंगी । लोकतंत्र के प्रति मोह और मोहभंग के संक्रमण काल में वे भी कई अनसुलझे सवालों में उलझे रहे होंगे । राजकमल भी ऐसे कई सवालों से जूझ रहे थे - आदमी क्यों पार करता है युद्ध?/ क्यों वर्लिन की दीवार?/ क्यों देश प्रेम?/ क्यों ताशकंद?/ क्यों दास कैपिटल?/ क्यों सेगाँव की बौद्ध भिक्षुणियाँ जल मरती हैं?/ क्यों कश्मीर के लिए सेनाएँ?/ क्यों एक ही युद्ध मेरी कमर की हड्डियों और कभी-कभी वियतनाम में होता है?
          कथित लोकतांत्रिक दुनिया के ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न, ‘लोकतंत्र” के प्रति बेहद नकारात्मक धारणाओं को निर्मित करने वाले होते हैं । नवंबर, 1965 में ज्योत्सना में छपे राजकमल के एक लेख  एक कवि का निजी वक्तव्य का यह अंश ऐसी ही एक धारणा को प्रकट करता है – जनतंत्र के युग में सारी बातें और सारी हालतें सोई रहेंगी । यों, कभी-कभी दिल बहलाव के लिए कोई नाच-गान पेश होगा, कोई कविता लिखी जाएगी, पुरस्कार दिए जाएँगे, नकली प्रतियोगिताएँ होंगी, शीशे के रंगीन टुकड़े हीरों से ज्यादा कीमती जचेंगे, कोई अफसर नौकरी छोड़कर योगाश्रम खोलेगा और अखबार निकलते रहेंगे । यह सारा कुछ सिर्फ मनोरंजन और सिर्फ जनताशाही के नाम पर होगा ।[8]
जब मुक्तिप्रसंग की रचना की जा रही थी, तब देश को आजाद हुए अठारह वर्ष से अधिक बीत चुके थे । देश की बड़ी आबादी आजादी और लोकतंत्र को हाँसिल करने की खुशफहमी में जी रही थी । इस स्थिति का फायदा उठाकर सामंती व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की राजनीतिक साजिश अपनी कामयाबी के नित नये कीर्तिमान गढ़ रही थी । राजाओं के वंशज, जमींदार, बड़े व्यापारी और ऊँची जातियों के लोग सांसद, विधायक, मंत्री बनकर लोकतंत्र का अपने चरित्र और अपनी सुविधा के अनुसार दोहन कर रहे थे । अफसरों ने अंगरेजी नौकरशाही की परंपरा और प्रवृत्ति से अपने आप को मुक्त नहीं होने दिया था । देश की जनता के हित में नीतियों और योजनाओं को तैयार करने के दावे खोखले साबित हो रहे थे । भ्रष्टाचार ने देश को तबाह करना शुरू कर दिया था । संविधान में प्रस्तावित संकल्प दम तोड़ने लगा था । देश का बड़ा हिस्सा बदहाल था । ऑपरेशन टेबल पर लेटे हुए कवि की देह और मन की पीड़ा देश की असह्य पीड़ा से जुड़कर इस तरह व्यक्त हुई है -  लेकिन मेरा देश मेरा पेट मेरा ब्लाडर / मेरी अंतड़ियाँ खुलने से पहले / सर्जनों को यह जान लेना होगा / हर जगह नहीं है जल अथवा रक्त / अथवा मांस अथवा मिट्टी / केवल हवा कीड़े जख्म और गन्दे पनाले हैं / अधिक स्थानों पर इस देश में/ जहाँ सड़कर फट गयी हैं नसें / वहाँ हवा तक नहीं/ ऊपर की त्वचा चीरने पर आग नहीं निकलेगी न ही धुआँ / जठराग्नि..दावानल.. / सब बुझ गए अचानक पहले पन्द्रह अगस्त की पहली रात के बाद / अब राख ही राख बच गया है पीला मावाद
          जब जनता में यह भ्रम हो कि देश में उनका अपना शासन है, तब उनका प्रतिरोधी स्वभाव बहुत कमजोर हो जाता है, शायद इसीलिए राजकमल अपने समय के लोकतंत्र की पहचान एक सम्मोहिनी राजनीतिक व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में नहीं कर पा रहे थे । लोकतंत्र के प्रति उनकी निराशा बृहत्तर थी । लोकतंत्र के प्रति उनकी अनास्था ‘मुक्तिप्रसंग’ में बहुत मुखर होकर दर्ज हुई हैं – आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियाँ / केवल पेट के बल उसे झुका देती हैं / धीरे-धीरे अपाहिज / धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए / उसे शिष्ट राजभक्त देशप्रेमी नागरिक बना लेती है ।
लहर के मार्च 1961 अंक में राजकमल चौधरी का एक लेख छपा था – कबिरा खड़ा बजार में । इस लेख में उन्होंने अपनी पसंदीदा उपन्यासकार आइन रैण्ड के 1957 में प्रकाशित उपन्यास ‘एटलस श्रग्ड’ (Atlas Shrugged) के कुछ पात्रों की चर्चा की है । आन्द्रे और रोआर्क की प्रकृति का उल्लेख करने के बाद, इन दोनें पात्रों से एक अन्य पात्र जॉन गाल्ट की प्रकृति की तुलना करते हुए उन्होंने लिखा है – जॉन गाल्ट आत्महत्या नहीं करता, डिनामाइट नहीं लगाता, वह सिर्फ़ अलग हो जाता है, वह नासमझ लोगों की नासमझ दुनिया से अलग हो जाता है ।[9]
‘मुक्तिप्रसंग’ में भी कवि ने लोकतंत्री संसार से अलग हो जाने की प्रस्तावना रखी है -आदमी को इस लोकतंत्री संसार से अलग हो जाना चाहिए / चले जाना चाहिए कस्साबों गांजाखोर साधुओं / भीखमंगों अफीमची रंडियों की काली दुनिया में / मसानों में / अधजली लाशें नोचकर खाना श्रेयस्कर है / जीवित पड़ोसियों को खा जाने से” उन्हें लोकतंत्र के नाम पर चल रहे मानवता के विध्वंश की बहुत खतरनाक साजिश से अलग हो जाना अनिवार्य लगता है - “हम लोगों को अब शामिल नहीं रहना है / इस धरती से आदमी को / हमेशा के लिए ख़त्म कर देने की साजिश में ।”
लोकतंत्र का आवरण ओढ़कर पसर रही विकृतियां भयावह थीं । इतनी भयावह कि मुक्तिप्रसंग’ का कवि इस लोकतंत्री संसार से उलग होकर अराजक गाँजाखोरों, साधुओं, भीखमंगों, अफीमचियों आदि की दुनिया को चुन लेना बेहतर समझता है । यह निर्विवाद है कि देश में पनप रहे असंतोष, उग्रवाद और अलगाववाद आदि के लिए लोकतांत्रिक विकृतियाँ बड़ी जिम्मेदार रही हैं । इसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि लोकतंत्र की विकृतियों से जन्मी अनास्था ही कालांतर में ‘नक्सलबाड़ी’ जैसे आंदोलनों के अस्तित्व में आने का बड़ा कारण बनी ।
यह विचारणीय है कि ‘मुक्तिप्रसंग’ और राजकमल के अन्यत्र लेखन में लोकतंत्र के प्रति जो अनास्था,आक्रोश और रोष व्यक्त हुआ है, क्या वह लोकतंत्र के प्रति उनकी अनंतिम धारणा को प्रकट करता है? क्या राजकमल लोकतंत्र की व्यवस्था को खारिज करते हैं, अथवा ऐसा प्रकट करने वाली उनकी अभिव्यक्तियाँ गहन अंतःपाठ की मांग करती हैं?
‘लहर’ के जुलाई, 1962 अंक में छपे उनके एक लेख – ‘बर्फ और सफ़ेद कब्र पर एक फूल’ में वे बेहतर राजनीतिक व्यवस्था की संभानाओं को खोजने की चेष्टा करते हुए दिखाई देते हैं– “सोचता रहता हूँ कि क्या उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद या कम्युनिज्म के अलावा कोई तीसरा रास्ता नहीं है?”[10] राजकमल का जुड़ाव अमेरिका की बीट पीढ़ी से भी था, जिसकी मान्यता थी कि व्यक्तिगत स्वाधीनता सर्वोपरि है । संभव है कि अपनी मनोरचना के कारण वे साम्यवाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतिकूल समझते हों । उस दौर में राममनोहर लोहिया जैसे प्रखर राजनितिक चिन्तक भी कांग्रेस विरोध के साथ ही साम्यवाद की खामियों को भी देश के सामने लाने का प्रयास कर रहे थे । लेकिन राजकमल देश के भीतर विकसित हो रहे ‘समाजवादी धाराके सच को भी पहचान रहे थे । वे जनसंघी चरित्र और उसके खतरे से भी भली-भांति परिचित थे । अप्रैल-जून-1967 के ‘आलोचना’ में छपे अपने एक लेख- ‘अप्रत्याशित कुछ भी नहीं’ में उन्होंने लिखा है- कांग्रेस शासन के देशव्यापी विरोध, जनमत के अर्ध विक्षिप्त अनिर्णय और नयी विकल्प प्रियता के कारण देश के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी (और परस्पर विरोधी) दलों की संयुक्त सरकारें बनी हैं । इन सरकारों में अधिक बुद्धिमान, अधिक स्वार्थहीन, अधिक ईमानदार व्यक्ति अवश्य शामिल हुए हैं, लेकिन इन सरकारों में जनसंघ, स्वतंत्र, प्रसोपा, मुस्लिम लीग, जनक्रांति दल जैसी प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी पार्टियां भी शामिल हैं । इसलिए कुल मिलाकर ये पीढियां भी कांग्रेस के अपने दक्षिणपंथ और वामपंथ की मिली-जुली भाव भगत की सरकार से अधिक पराक्रमी, और अधिक क्रांतिकारी और अधिक समाजवादी सरकारें नहीं बन पाएंगे ।”[11]
‘मुक्तिप्रसंग’ का कवि विकल्पहीनता और अनास्था को अपना स्थाई भाव बना लेने के पक्ष में नहीं   है । इसलिए अपने पलायन की इच्छा को वह स्थगित करता है और अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की अपनी रचनात्मक आस्था की ओर लौटता है – “वह पागल मरी हुई आतंकित अनगढ़ स्त्री चिपकाऊंगा / अपने ओंठों पर उसके ओंठों में / अपने शब्द / वाक्य / भाषाएँ / अपने मुहावरों से उसकी बंजर धरती नहलाऊंगा ।” कवि यह सब उस स्त्री के लिए कहता है जो – “ग्यारह बजकर उनसठ मिनट पर / हर रात शहीद-स्मारक के नीचे नंगी होती है / पागल काली मरी हुई एक स्त्री / उजाड़ आसमान में बाहें फैलाकर रोने के लिए / रोते हुए सो जाने के लिए पानी और अनाज के देवताओं से भीख मांगती है / तिरंगा फहराने के अपराध में मार डाले गए / 1942 के छात्रों के नाम पर” । ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्त्री भारत की जनता की जनतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक है, जिन्हें कवि स्वर देने का संकल्प लेता है ।
राजकमल चौधरी ने विधिवत रूप से 1960 में लिखना शुरू किया था और 1967 में साढ़े सैंतीस वर्ष की उम्र में उनका देहान्त हो गया था । यह कहना उचित होगा कि उनके लेखन की अल्पावधि उनके सृजन ही नहीं, उनके निर्माण के भी वर्ष थे । संभवत: इसलिए परस्पर विरोधाभासी बातों से उनका साहित्य भरा हुआ है । व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व के द्वंद्व ने भी उन्हें पर्याप्त मथा  है ।
फरवरी 1967 के आम चुनावों के बाद ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख – ‘अप्रत्याशित कुछ नहीं’ में उन्होंने यह भी लिखा है- “मैं राजकमल चौधरी अपनी तरफ से जनता के पास चले जाने का वादा करता हूँ, मेरी सही यात्रा यहीं से शुरू होगी ।”[12] ऐसा प्रतीत होता है कि राजकमल अपने लिए उचित प्रस्थान बिंदु और दिशा तय कर चुके थे ।  इसी दौर में राजकमल राजनितिक रूप से भी अपने चिंतन में स्पष्ट होने लगे थे । इसी लेख में उन्होंने लिखा है - “जब तक देश की अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था में आमूल, सम्पूर्ण और क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं होगा – हमारा देश और हमारे देश का मनुष्य लोक सेवाओं और लोक सभाओं में अपना सही प्रतिनिधि भेजने के लिए स्वाधीन नहीं है ।”[13] राजकमल का जनता के पास लौटने का संकल्प 19 जून 1967 को हुई उनकी मृत्यु के साथ ही अधूरा रह  गया ।
‘मुक्तिप्रसंग’ का पुनर्पाठ करते हुए हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह कविता लोकतंत्र के प्रति जिस अनास्था को अभिव्यक्त करती है, वह किन परिस्थितियों में निर्मित हुई थी । ‘लोकतंत्री’ संसार से अलग हो जाने की बात कितनी अधिक पीड़ा के साथ कही गयी होगी । इस बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करना बहुत आवश्यक है, कि कवि जिस लोकतंत्री संसार से अलग होने की बात करता है, वह लोकतंत्री संसार, वास्तविक लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित ही नहीं है ! यह समझना भी आवश्यक है कि राजकमल की जो अनास्था प्रकट हुई है, वह लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था के छले जाने से निर्मित हुई है ।
दरअसल ‘मुक्तिप्रसंग’ का स्वर लोकतंत्र के जरुरी मूल्यों के प्रति आग्रही है । यह कविता लोकतंत्र की वास्तविक भावना को परे रख कर चलने वाले लोकतंत्र को स्वीकार करने से साफ इंकार करती है । अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब मांगती है । लोकतंत्र के नाम पर चल रही साज़िशों के प्रति सावधान करती है । यह कविता लोकतंत्र को नहीं लोकतंत्र के नाम पर परोसे जाने वाले अलोकतंत्र को खारिज करती है । यह कविता अपने निहित आशय में यही व्यंजित करती है कि अनास्था के लोकतंत्र का एकमात्र विकल्प है- सही लोकतंत्र ।
‘मुक्तिप्रसंग’ को लिखे हुए पांच दशक बीत चुके हैं । राजकमल के उठाये गए सवाल अब भी ज्यों के त्यों हैं, बल्कि अधिक तीखे हो गये हैं । कुछ सन्दर्भों में स्थान काल पात्र ज़रूर बदल गए हैं । लोकतंत्री संसार आज भी वास्तविक लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना ही चलती है । देश दुनिया की परिस्थितियाँ कमोवेश वैसी ही है । कश्मीर में मानवाधिकारों का क्रूरतापूर्वक हनन आज भी हो रहा है । इस ‘लोकतांत्रिक देश के कुछ हिस्सों में भारी विरोध के बावजूद आफसफा जैसे नागरिक अधिकारों के क्रूर दमन में सहायक कानून लागू हैं । आदिवासियों को जंगल से बेदखल किया जा रहा है, और किसानों से उनकी ज़मीने छीनी जा रही हैं । मानव विकास की अपेक्षा युद्धोन्माद अधिक महत्वपूर्ण बना हुआ है । दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध छिड़े हुए हैं । अमेरिका जैसे कई शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर राष्ट्रों का बल और छलबलपूर्वक शोषण कर रहे हैं । कई मजबूत देश, कमजोर देशों को अपने निशाने पर लेकर इन्हें तबाह करने पर तुले हुए हैं । जनता के चुने हुए प्रतिनिधि राजाओं की तरह पेश आते हैं । इत्यादि ।
ऐसे मुद्दों की एक असमाप्त श्रृंखला है । यह और भी दुखद है कि परिस्थितियाँ पहले से अधिक भयावह हुई हैं, और इसके और भी अधिक भयावह होते जाने की आशंका है । जरूरी है कि पुनर्पाठ के क्रम में हम राजकमल की अनास्था से गुज़रते हुए वास्तविक लोकतंत्र को हाँसिल करने की चुनौतियों से निपटने की युक्तियों पर विचार करें, और उसे व्यवहार में लाने का प्रयास करें । ‘मुक्तिप्रसंग’ में निहित ‘लोकतंत्र की आकांक्षा’ की दिशा में यही हमारा प्रस्थान बिंदु हो सकता है ।


[1] इन सूचनाओं के स्रोत के लिए देखिए : राजकमल चौधरी का सफर (पहल पुस्तिका), पृष्ठ : 34-35
[2] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-7
[3] देखिए : राजकमल चौधरी का सफर (पहल पुस्तिका), पृष्ठ : 35
[4] राजकमल चौधरी रचनावली, खंड-8, पृष्ठ : 285
[5] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-8
[6] इस लेख में उद्धृत कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ के सभी पद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तिका- ‘मुक्तिप्रसंग (द्वितीय सं.-2006) से लिये गये हैं ।
[7] देखिए : मुक्तिप्रसंग,पृष्ठ-8
[8] देखिए : देखिए : राजकमल चौधरी रचनावली, खंड-7, पृष्ठ : 133
[9] देखिए : वही, पृष्ठ : 335
[10] देखिए : वही, पृष्ठ : 349
[11] देखिए : वही, पृष्ठ : 389
[12] देखिए : वही, पृष्ठ : 390
[13] देखिए : वही, पृष्ठ : 389
 सन्दर्भ विवरण
1. राजकमल चौधरी : मुक्तिप्रसंग : द्वितीय संकलन-2006 : वाणी प्रकाशन, दिल्ली-2
2. सुभाष चन्द्र यादव : राजकमल चौधरी का सफ़र (पहल पुस्तिका) : अक्टूबर, 1998 : जबलपुर-4
3. संपादक- देवीशंकर नवीन : राजकमल चौधरी रचनावली खंड-7 व खंड-8 : प्रथम संस्करण-2015 : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली-2
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[*‘बया’ (संपादक : गौरीनाथ) के जुलाई-दिसंबर,2017 अंक (पृ.14-16) में प्रकाशित] 

Sunday, September 3, 2017

अनीता की त्रासदी न तो पहली है न आखिरी

     तमिलनाडु की रहने वाली सत्रह वर्ष की एक छात्रा अनीता एस. की आत्महत्या की घटना बहुत विचलित करने वाली है । अनीता आर्थिक रूप से कमजोर एक दलित परिवार की बेहद प्रतिभाशाली लड़की थी । इस वर्ष बारहवीं की परीक्षा में तमिलनाडु बोर्ड के अव्वल विद्यार्थियों में से एक अनीता को मेडिकल कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल सका । यह दाखिला उसका सपना था, जिसे उससे छीन लिया गया ।

सुप्रीम कोर्ट के 28 अप्रैल 2016 के एक आदेश के बाद राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में भी दाखिले के लिए सीबीएसई के द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षा नीट (NEET) को अनिवार्य कर दिया गया है । पिछले वर्ष (2016) के लिए केन्द्र सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर राज्य सरकारों के कॉलेजों को इससे छूट दे दी थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ ।

यदि नीट अनिवार्य नहीं होता तो बारहवीं में 1200 में 1176 अंक हासिल करने वाली अनीता को अपने इसी प्रदर्शन के आधार पर तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिल सकता था । अनीता नीट क्वालिफाई नहीं कर पायी । उसने नीट की अनिवार्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी, लेकिन उसे वहाँ से भी निराश होना पड़ा ।

स्रोत: https://twitter.com/aanacanth95/
नीट अभी अंग्रेजी और हिन्दी के अतिरिक्त बंगाली, तमिल, तेलुगू, मराठी, असमिया, गुजराती, ओड़िया और कन्नड़ सहित कुल दस भाषा माध्यमों में आयोजित की जाती है । इस परीक्षा में शामिल होने वाले कई स्टेट बोर्ड्स के छात्रों की यह शिकायत रही कि परीक्षा के प्रश्न पूरी तरह सीबीएसई के पाठ्यक्रम पर आधारित थे, जिनमें से कई उनके पाठ्यक्रम से बाहर के थे । कई परीक्षार्थियों ने इस बात की भी शिकायत की थी कि विभिन्न भाषा माध्यमों से पूछे गये प्रश्नों के स्तर भी अलग-अलग थे । मसलन बंगाली और तमिल भाषा माध्यम के छात्रों ने यह आरोप लगाया कि उनसे पूछे गये प्रश्न अंग्रेजी माध्यम में पूछे गये प्रश्नों से अधिक कठिन थे । यह सोचने वाली बात है कि विभिन्न भाषा माध्यमों से ली गयी परीक्षा में अलग-अलग स्तर के प्रश्नों के पूछे जाने की क्या तुक हो सकती है? यह संदेह होता है कि क्या ऐसा अंग्रेजी माध्यम के और निजी विद्यालयों के छात्रों के हक़ में जान बूझ कर किया गया था? क्या यह ग्रामीण पिछड़े, दलित और वंचित तबके के छात्रों को प्रगति के अवसर से वंचित करने की साजिश है? क्या राज्यबोर्ड के स्कूलों के छात्रों के साथ दुर्भावनापूर्ण भेदभाव कर के, सीबीएसई और सीआईएससीई जैसे बोर्ड से सम्बद्ध अंग्रेजी माध्यम के बड़ी पूँजी वाले निजी स्कूलों के लिए मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश की जा रही है? केन्द्र सरकार के द्वारा विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे विद्यालयों की संख्या तो वैसे भी बहुत कम है ।

 ग़ैर अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के लिए शैक्षणिक सामग्रियों की उपलब्धता और गुणवत्ता की जो चुनौतियाँ होती हैं, वे नीट की तैयारी के क्रम में तमिल माध्यम की छात्रा रही अनीता के लिए भी रही होंगी । अनीता ने बारहवीं की परीक्षा में अंग्रेजी विषय में भी अच्छे अंक हासिल किये हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि वह शिक्षा माध्यम के रूप में भी इस भाषा में सहज होगी । उसे मजबूरन अंग्रेजी माध्यम की किताबों से जूझना पड़ा होगा । आर्थिक पिछड़ेपन और ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने के कारण भी उसके लिए उस तरह की शैक्षणिक सहायता भी उपलब्ध नहीं हो सकती थी, जो कोचिंग के रूप में अन्य छात्रों के लिए सहज उपलब्ध होती है । इन सभी पहलुओं पर विचार किये बिना और सम्बंधित विसंगतियों और समस्यायों के उचित समाधान के बिना नीट की अनिवार्यता को लागू कर देना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि भारी क्रूरता  है । अनीता जैसी प्रतिभाशाली छात्रा को हमने इसी क्रूरता के कारण खो दिया है । यदि उसे दाखिला मिल सकता और वह जीवित रह सकती तो संभव है कि वह एक बहुत अच्छी डाक्टर बनती । लेकिन तब भी ऐसा हो पाता यह पूरे यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता है ।

भेदभाव और चुनौतियाँ स्कूली शिक्षा और प्रवेश परीक्षाओं तक ही सीमित नहीं  है । मेडिकल या इंजनीयरिंग कॉलेजों में दाखिलों के बाद पृष्ठभूमि और भाषा माध्यमों के आधार पर होने वाले भेद भाव से जो प्रताड़ना मिलती है, उसने भी कई प्रतिभाओं को कई बार अवसाद या आत्महत्या की स्थिति तक पहुँचाने का काम किया है ।

ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से सबक लेने की जरूरत होती है । क्या तमिलनाडु के नेता इस बात पर ईमानदारी से विचार कर पाएँगे कि अपनी अंग्रेजीपरस्ती के चलते तमिलनाडु के छात्रों के लिए उन्होंने कितनी घुटन भरी परिस्थिति तैयार कर दी है? क्या वे आर.के. लक्षमण के उस कार्टून की संवेदनशीलता को महसूस कर पाएँगे, जिसे आश्चर्यजनक रूप से तमिलनाडु के छात्रों के प्रति अपमानजनक बताते हुए, दबाव डालकर तमिल नेताओं ने ही 2012 में एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक से बाहर करवा दिया था? इस प्रतीकात्मक कार्टून में एक तमिल भाषी छात्र को, ‘हिन्दी विरोधी आंदोलनकी अंग्रेजी परस्ती का विरोध करते हुए दिखाया गया है, जो हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी का भी जानकार नहीं है! इस तरह की समस्या पर संवेदनशील होने के बजाय इसे तमिलों के लिए मान सम्मान का मुद्दा बना देने वाली सरकार और राजनीतिक पार्टियाँ क्या ग्रामीण, दलित और पिछड़े तमिल छात्रों की हितैषी हैं, या उनके ऑनर किलिंगकी दोषी? इस तरह की प्रवृत्ति को तमिलनाडु मात्र तक सीमित नहीं मानना चाहिए । ऐसा कमोबेश देश के सभी राज्यों में हो रहा है । 

लेकिन हम ऐसी त्रासद घटनाओं से अक्सर कोई सबक नहीं सीखते । कई लोग ये दलील देते हैं, और इस घटना के बाद भी दे रहे हैं कि यदि सभी बच्चों को एकदम शुरूआत से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाए, तो इस तरह के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है । यह बहुत ही असंवेदनशील विचार है । इस विचार के ठीक-ठीक फलीभूत होने के लिए इस देश की लगभग पूरी आबादी को कम से कम एक आवश्यक न्यूनतम स्तर की अंग्रेजी का जानकारी रखनीन पड़ेगी, अन्यथा आप एक मजदूर माता पिता से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे अपने बच्चे को जन्म से स्कूल जाने की अवधि तक अंग्रेजी माहौल उपलब्ध करा पाएंगे । ऐसी स्थिति में यह होगा कि अधिकांश बच्चे एकदम शुरू में ही भाषा माध्यम की कठिनाई के कारण अपना स्वाभाविक विकास खो देंगे । जिस वक्त वे तीव्रता से विषय वस्तुओं को सीखने की स्थिति में होंगे, उनका वह कीमती वक्त एक भाषा माध्यम को समझने में बीत जाएगा । दुनिया भर के शिक्षाशास्त्री जब मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की ज़रूरत पर जोर दे रहे हैं, हमारे यहाँ ठीक उल्टी बहस चल रही है । आइंस्टीन के कथन के विपरीत हम अपनी समस्याओं का समाधान उन्हीं विचारों में खोज रहे हैं, जिनसे वे उपजे हैं ।

आखिर हम इस तरह क्यों नहीं सोच पाते कि ज्ञान किसी एक भाषा का मोहताज नहीं है । आखिर क्यों एक प्रतिभाशाली बच्चे को इंजीनियर या डाक्टर बनने से पहले अनिवार्यतः अंग्रेजी से जूझना चाहिए? मुझे विश्वास है, कि एक दिन हम इस सच्चाई को जरूर समझेंगे, लेकिन तब तक हम न जाने कितनी प्रतिभाओं की बली ले चुके होंगे । 



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Thursday, August 3, 2017

नकली नायकों के भरोसे लोकतंत्र

बिहार के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और उसके बाद की प्रतिक्रियायों के बीच जिन बातों को अभिव्यक्त करने की जरूरत महसूस हो रही थी, उसे इस लेख में लिखने की कोशिश की है । इसे लिखने में समय और श्रम दोनों अपेक्षाकृत अधिक लगा है । चाहकर भी इस लेख को अधिक विस्तृत होने से बचा नहीं सका । 
प्रतीकात्मक चित्र [साभार : बिजनेस स्टैंडर्ड]

नकली नायकों के भरोसे लोकतंत्र

[1.]

मेरा मानना है कि बिहार के नये राजनीतिक घटनाक्रम में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है । पिछले कई वर्षों से बिहार भारी राजनीतिक विकल्पहीनता का शिकार है । वैसे यह बात कुछ अपवादों के अतिरिक्त पूरे देश पर लागू होती है ।

1990 में राज्य की जनता ने जब कांग्रेसियों से सत्ता छीन कर पिछड़ो गरीबों के नेता कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव को सौंपी थी, तब देश भर में एक सकारात्मक संदेश गया था । बिहार के लोगों में एक उम्मीद जगी थी । इस उम्मीद पर लालू यादव कितने दिनों तक और कितना खरा उतर सके, यह बिहार की आम जनता अच्छी तरह जानती है, इसके बावजूद अपने राजनीतिक कौशल की वजह से वे और उनकी पार्टी लगभग डेढ़ दशक तक सत्ता पर काबिज रहे ।

2005 में हुए विधानसभा चुनावों में बिहार की जनता ने जब नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल(यू) और भाजपा गठबंधन को स्पष्ट जनादेश देकर सत्ता सौंपी थी, तब इसके पीछे का एक बड़ा कारण पिछले डेढ़ दशक की सत्ता संस्कृति और बदहाली से बिहार की जनता का बुरी तरह परेशान हो जाना और ऊब जाना भी था ।

ऐसा माना जाता है कि अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार ने अपने काम करने के तरीके से लोगों को प्रभावित किया । बिहार में कानून व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर हुई । बहुत अधिक बढ़ चुके अपराध के मामले काफी कम हुए । प्रशानिक ढाँचे की अराजकता में कमी आयी और लोगों को अपेक्षाकृत एक संतुलित व्यवस्था का बोध हुआ । कई जरूरी मसलों पर उदासीनता के रहते हुए भी नीतीश कुमार ने कई लोकलुभावन योजनाएँ लागू की, और मामूली वेतन देकर बेरोजगार शिक्षितों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए नियोजित करने जैसे, लोकप्रियता मे बढ़ोतरी करने वाले कई और योजनाओं पर काम किये । इन सबका उन्हें इनाम भी मिला । 2010 के विधानसभा चुनावों में जनता दल (यू)-भाजपा गठबंधन को पिछली बार की तुलना में और बड़ा जनादेश मिला और नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने ।

इस बार इस जनादेश ने उनमें भारी अहंकार भी भर दिया था । वे बहुत ताकतवर नेता के तौर पर उभरे थे । इस बार वे लोकतांत्रिक तरीके से चलाए जा रहे वाजिब मांगों के आंदोलन तक को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे । हालाँकि कानून व्यवस्था पिछले कार्यकाल की तरह ही ठीक-ठाक रही और लोकलुभावन योजनाएँ स्थगित नहीं की गयी । 1990 से 2005 के दौर की तुलना में बेहतर स्थिति ही, लोगों के लिए संतोष की बात थी । विकल्पहीनता में ऐसा ही होता है । सरकार के पहले कार्यकाल में जो मीडिया सरकार के कार्यों को उत्साह और महिमा मंडन के साथ जनता को परोस रही थी, दूसरे कार्यकाल तक यह स्पष्ट हो गया था, कि वे सरकार के आगे किसी न किसी कारण से नतमस्क हो चुकी थीं, और सरकार की जरूरी आलोचना भी उनके बूते की बात नहीं रह गयी थी । नीतीश कुमार के प्रति मोह बनाए रखने में विकल्पहीनता के साथ ही बिहार में स्वतंत्र विचारों की मीडिया के अभाव की भी बड़ी भूमिका मानी जा सकती  है ।

अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्षों में नीतीश कुमार का भारतीय जनता पार्टी से रिश्ता खराब होना शुरू हो गया था । कथित तौर पर यह सैद्धांतिक मसला था, जिसके अनुसार नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी जैसे साम्प्रदायिक व्यक्ति के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं थे । 2013 में भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने को अपनी अवहेलना और प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की दावेदारी के अनुमोदन का संकेत मानते हुए जनता दल (यू) ने भाजपा से बिहार के साथ ही केन्द्रीय स्तर पर भी सम्बंध तोड़ लिये । इस गठबंधन के टूट जाने के बाद नीतीश कुमार को विश्वास मत हासिल करने में कांग्रेस के चार विधायकों ने भी समर्थन दिया था । तब राष्ट्रीय जनता दल और भाजपा दोनों ने नीतीश कुमार को विधानसभा की बहसों में अवसरवादी कहा था ।

बाद में 2014 के लोकसभा चुनावों में हार की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था । इस इस्तीफे के बाद जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बनने से लेकर एक समय भाजपा की शह पा कर अप्रत्याशित रूप से उनके बागी होते जाने और इसके बाद त्याग और महादलित प्रेम का चोला उतारकर नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री बन जाने तक की नाटकीय घटनाओं पर यहाँ विस्तार से बात करना विषयांतर होगा ।

2015 के विधान सभा चुनावों में जनता दल (यू) का राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ना और फिर से सत्ता में लौटना एक उल्लेखनीय घटना है । कई विश्लेषक इसे साम्प्रादयिकता के विरूद्ध बिहार की जनता का जनादेश मानते हैं, लेकिन मेरे विचार से यह एक आधारहीन विश्लेषण है । मेरा मानना है कि राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के पारंपरिक जनाधारों के साथ नीतीश कुमार की ‘सोशल इंजीनियरिंग, मीडिया द्वारा तैयार की गयी सुशासक की उनकी छवि और कुछ लोकप्रिय योजनाओं की वजह से तैयार हुए वोट बैंक ने आपस में मिलकर महागठबंधन को यह सफलता दिलाई । यह चुनाव मुख्य रूप से राज्य केन्द्रित चुनाव ही था । ऐसी स्थिति में बीजेपी का 54 सीटें हासिल कर लेना भी बड़ी बात कही जा सकती है । यदि इस चुनाव में साम्प्रदायिकता या केन्द्रीय राजनीति जैसे मुद्दे थे भी, तो 2014 के लोकसभा चुनावों में बिहार के 40 सीटों में से बीजेपी+ के 32 सीटों पर कब्जा करने को, हमें इस तरह विश्लेषित करना पड़ेगा कि 2015 के विधानसभा चुनावों में अचानक से परिपक्व हो गयी बिहार की जनता ने 2014 लोकसभा चुनावों में साम्प्रदायिकता के पक्ष में वोट दिया था ! यह दोनों ही विश्लेषण सही नहीं है ।

यदि बिहार की जनता ने विधान सभा चुनावों में वास्तव में चेतनशील होकर साम्प्रदायिकता के विरूद्ध मतदान किया होता तो यह लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि कही जा सकती थी । लेकिन इस किस्म की चेतनशीलता इस समय कुछ अपवादों के अतिरिक्त पूरे देश में दुर्लभ है । जनता की चेतना का बढ़ा-चढ़ाकर मूल्यांकन करना उनके वास्तव में चेतनाशील बनने की जरूरत को न्यूनतम बना कर प्रस्तुत करता है । इससे जनता को चेतना सम्पन्न बनाने की यदि कोई मुहिम चल रही हो, या चलाई जाने की आवश्यकता महसूस हो रही हो तो वह सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर हतोत्साहित होती है ।

बिहार की राजनीति के ताजा घटनाक्रम में प्रकट रूप से यह हुआ है कि सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, जो लालू प्रसाद यादव के पुत्र  हैं, पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उसके बाद महागठबंधन में बन रहे गतिरोध के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया । इसके ठीक बाद भाजपा ने नीतीश कुमार को समर्थन देने की घोषणा की और अगले दिन उनके नेतृत्व में भाजपा-जनता दल (यू) गठबंधन की सरकार फिर से कायम हो गयी । 
साभार :  इंडियन एक्सप्रेस 

[2.]

बिहार के नये राजनीतिक घटनाक्रम पर बीजेपी विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं और सोशल मीडिया पर बीजेपी विरोधी लोगों की तीखी प्रतिक्रियायें पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं । नीतीश कुमार को सिर्फ अवसरवादी ही नहीं, बल्कि विश्वासघाती और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का हत्यारा भी कहा जा रहा है । मेरे खयाल से यह उचित ही है । इस तरह के आक्रोश लोकतंत्र के लिए सकारात्मक ही होते हैं । लेकिन हमारी गलती यह है कि जनादेश के उल्लंघन अथवा जन आकांक्षाओं की हत्या की बात करते हुए, हम बहुत ही मासूमियत से पूर्व की ऐसी ही घटनाओं को भुला देते हैं । इसी कारण से हम फिर से ऐसे विकल्पों पर भरोसा कर बैठते हैं, जिनसे भविष्य में ऐसी घटनाओं के बार-बार दोहराए जाने का रास्ता बहुत आसान हो जाता है ।  
   
          बिहार की राजनीति में करीब दो दशक पीछे जाएँ । 1997 में लालू प्रसाद यादव की जब चारा घोटाला मामले में गिरफ्तारी तय लग रही थी, तब दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हुई   थीं । लालू प्रसाद यादव ने जनता दल के नेतृत्व विवाद के कारण अपने समर्थकों सहित इस दल से अलग होकर 5 जुलाई 1997 को राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया था और इसके कुछ दिनों बाद ही 25 जुलाई 1997 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । इसके बाद राजनीतिक रूप से नितांत अनुभवहीन उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं । ये दोनों ही घटनाएँ लोकतांत्रिक स्वभाव रखने के बजाय सत्तासुख, वर्चस्व और परिवारवाद की भावना से प्रेरित थीं । बाद के दिनों में लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाए रखकर सत्ता का नियंत्रण अपने हाथों में बनाए रखा ।

          28 जुलाई 1997 को जब राबड़ी देवी सरकार के सामने विधान सभा में विश्वासमत हासिल करने की समस्या आयी तब कांग्रेस मदद के लिए आगे आयी थी । इससे पहले जनता दल के विभाजन के बाद नव गठित राष्ट्रीय जनता दल के मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव के सामने जब यही समस्या आयी थी, तब विधान सभा में अनुपस्थित रहकर परोक्ष रूप से कांग्रेस ने इस सरकार के प्रति अपनी सद्भावना का ही प्रदर्शन किया था । यह वही कांग्रेस थी, जिसने 1995 का बिहार विधान सभा चुनाव राज्य की लालू सरकार की नीतियों और असफलताओं के विरूद्ध लड़ा था । इनके समर्थकों के बीच चुनावों में परस्पर हिंसक और जानलेवा झड़पों का इतिहास रहा था । क्या कांग्रेस को तब लोगों ने लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी सरकार को बचाने के लिए जनादेश दिया था? क्या तब जनादेश की हत्या नहीं हुई थी? इसके पीछे साम्प्रदायिकता विरोध अथवा राज्य को मध्यावधि चुनाव से बचाने का तर्क रहा था ।
  
          प्रसंगवश 1996 के लोकसभा चुनावों की बात करें तो यह गैर कांग्रेसी दलों द्वारा मुख्यतः कांग्रेस के पीवी नरसिंह राव सरकार की नितियों के विरुद्ध लड़ा गया था । इन चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और राष्ट्रपति ने उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में तब 13 दिनों तक सरकार चली थी । यह सरकार सदन में विश्वासमत हासिल नहीं कर सकी थी । इसके बाद संयुक्त मोर्चा ने उसी कांग्रेस से समर्थन लेकर सरकार बनाई, जिसके विरूद्ध उसके लगभग सभी घटक चुनावों में उतरे थे । तर्क फिर से धर्मनिरपेक्षता और भाजपा को रोकने का था । मध्यावधि चुनावों से देश को बचाने का तर्क भी  था । हालाकि बाद में कांग्रेस ने निहित स्वार्थ के चलते पहले एचडी देवगौड़ा सरकार और बाद में आईके गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेकर दोनों ही सरकारें गिरा भी दी और देश को अंततः 1998 में मध्यावधि चुनावों में जाना पड़ा था । इसके बावजूद बाद के दिनों में भी कांग्रेस और गैरकांग्रेसवाद की राजनीति करते हुए विकसित हुए राजनीतिक दलों के बीच सहयोग संभव होता रहा । यह सहयोगी सम्बंध थोड़े-बहुत उतार चढ़ाव के साथ भाजपा सरकार के दिनों से लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दिनों में भी और अब तक बना हुआ है । इनके बीच चुनावी गठबंधन भी होते रहे हैं ।

जनता दल (यू) की बात करें तो इसने जरूरत पड़ने पर भाजपा के साथ न सिर्फ गठबंधन किया बल्कि इस पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव एनडीए के संयोजक भी रहे । इस पार्टी के कई नेताओं ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों को भी संभाला । इस गठबंधन के इस विरोधाभास को याद रखना चाहिए कि, जनता दल (यू) उस पार्टी की परंपरा में विकसित हुई पार्टी है, जिसने 1980 में अपनी पार्टी के नेताओं के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ाव रखने पर पाबंदी लगा दी थी । 1977 में जब जनता पार्टी बनी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े राजनीतिक दल जनसंघ का भी इसमें विलय हुआ था । 1980 में जनता दल के इस निर्णय के बाद इससे जनसंघ धड़ा फिर से अलग हो गया था, और भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ था । यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी के गठन और जनता दल (यू) के उसके साथ आने की घटना के बीच की अवधि में ही बाबरी विध्वंस की घटना भी घट चुकी थी । यह देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की एक बड़ी और दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानी जाती है, और भाजपा को इसका सबसे बड़ा जिम्मेवार माना जाता है ।

जनता दल (यू) नेता नीतीश कुमार के भाजपा सरकार में रेलमंत्री रहते ही फरवरी’2002 में गोधरा में वह दुर्घटना घटी थी, जब साबरमती ट्रेन के एक कोच में आग लग जाने से कई लोगों की मौत हो गयी थी । इसमें मारे गये लोग कथित तौर पर विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए थे । इसके एक सुनियोजित हिंसा के रूप में प्रचारित होने के बाद गुजरात में भयावह साम्प्रदायिक दंगे होने शुरू हो गए थे । इन दंगों को रोकने के बजाय इन्हें प्रोत्साहित करने में प्रशासन और शासन की संलिप्तता की बात कही जाती है । इस भयावह दंगे के बाद भी जनता दल (यू) सरकार में बनी   रही । 1999 में गायसल रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेकर रेल मंत्री के पद से त्यागपत्र देने वाले नीतीश कुमार भी गोधरा की घटना और उसके बाद हुए भयावह दंगे और इसमें नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात की भाजपा सरकार की संदिग्ध भूमिका के बावजूद इस बार केन्द्र की भाजपा सरकार के रेल मंत्री के पद पर डटे रहे ।  ऐसा माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार होने की स्थिति में उनकी साम्प्रदायिक छवि का मुद्दा उठाकर, जनता दल (यू) जब एनडीए से अलग हो गया, तब इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका नीतीश कुमार की ही थी, और पार्टी अध्यक्ष शरद यादव अधूरे मन से इस फैसले में उनके साथ आए थे । नयी परिस्थिति में जिन युवाओं को शरद यादव में अचानक से जयप्रकाश के दर्शन होने लगे हैं, उन्हें इस बात पर अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए कि क्या शरद यादव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक झोल से बाहर आकर भरोसेमंद और सक्षम नेतृत्व दे सकने के काबिल हैं भी या नहीं!

साभार : www.dailyo.in
गुजरात दंगे के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के रेलमंत्री के रूप में बने रहने और दो बार भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश कुमार की अचानक से जगी नैतिकता को समझ पाना क्या बहुत जटिल है? जब नरेन्द्र मोदी को साम्प्रदायिक बताकर नीतीश कुमार एनडीए के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के बतौर उनको प्रस्तुत किये जाने को ग़लत बता रहे थे, उन्हीं दिनों 2003 में दिये उनके एक भाषण का विरोधाभासी वीडियो सार्वजनिक हुआ था । इसमें गुजरात में एक निजी कंपनी द्वारा तैयार रेल लाइन को राष्ट्र को सौंपे जाने के एक कार्यक्रम में वे नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते हुए, उनके गुजरात की सीमा से बाहर निकलकर भी सेवा देने की अपील करते हुए नजर आए थे । इसी भाषण में उन्होंने नरेन्द्र मोदी की छवि को गलत तरीके से प्रचारित करने की प्रवृत्ति की आलोचना भी की थी । अपने इस भाषण में गुजरात दंगे की बात करते हुए उन्होंने यह आशय प्रकट किया था कि इसी मुद्दे को पकड़ कर बैठे रहना सही नहीं है, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात ने बहुत प्रगति की है । इस वीडियो के सामने आने पर नीतीश कुमार ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे रेलवे प्रोटोकॉल का हिस्सा भर कहा था । क्या तब भोलेपन से उनके इस तर्क को मान लेने वालों से गलती नहीं हुई थी? जिन लोगों ने नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का विरोध करने पर नीतीश कुमार में सम्प्रदायिकता विरोधी नायक की छवि देखनी शुरू कर दी थी, क्या यह उन्हीं लोगों की चूक नहीं थी? नीतीश कुमार के इस साम्प्रदायिकता विरोध की आड़ में उनके प्रधानमंत्री बनने की तीव्र महत्वाकांक्षा यदि आपको नहीं दिखी थी, तो यह आपकी नहीं तो किसकी गलती थी?

प्रसंगवश एक और बात का जिक्र हो जाना चाहिए । यूट्यूब पर इस पूरे भाषण का उपलब्ध वीडियो* यदि फर्जी नहीं है, तो इसमें प्रधानमंत्री मोदी के अत्यंत प्रिय और अब देश भर में लोगों की धारणा में उनके सुपर फाइनेंसर के रूप में पर्याप्त चर्चित हो चुके उद्योगपति गौतम अडानी की और रेलवे में निजी क्षेत्र की भागीदारी दोनों की ही खूब सारी तारीफें नीतीश कुमार के मुँह से सुन सकते हैं । इस भाषण को सुनते हुए आज से चौदह वर्ष पहले गुजरात के मुख्यमंत्री, अडानी समूह और तब के रेल मंत्रालय के बीच के बेहतर तालमेल को समझना, इस दौर के इसी तरह के नये समीकरणों को भी समझने में मदद कर सकता है !

साभार: आजतक
2015 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के लगभग दो दशकों से भी अधिक समय के बाद एक साथ आने पर, फरवरी’1994 में पटना के गाँधी मैदान में आयोजित उस विशाल कुर्मी चेतना महारैली को याद किया जाना चाहिए था, जिसके मंच से नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव पर यह आरोप लगाया था कि वे मात्र यादव जाति के हित की राजनीति करते हैं, और उन्होंने शेष पिछड़ी जातियों के साथ छल किया है । खुद लालू प्रसाद यादव नीतीश की कई मौकों पर आलोचना करते रहे हैं । 2013 में जनता दल (यू) के भाजपा से अलग होने पर भी उन्होंने शुरू में यही प्रतिक्रिया दी थी कि नीतीश कुमार सत्ता के लालची हैं, और मुसलमानों का वोट हासिल करने मात्र के लिए वे भाजपा से अलग हुए हैं । बाद में ये दोनों साथ आकर एक दूसरे की तारीफों के पुल बांधने लगे और फिर हालिया अलगाव के बाद एक दूसरे की तीखी नींदा करने में जुट गये हैं!
  
नीतीश कुमार का राष्ट्रीय जनता दल से अलग होकर फिर से भाजपा के साथ आ जाने के प्रत्यक्ष कारण भले ही उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप हैं, लेकिन मेरे खयाल से ये दिखावटी कारण भर हैं । मेरा अनुमान है कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ जिस सहजता से सत्ता चला पा रहे थे, उसी सहजता से राष्ट्रीय जनता दल के साथ वे नहीं चला पा रहे थे । समय-समय पर यह प्रकट भी होता रहा कि राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं का सत्ता में मजबूत हस्तक्षेप भर ही नहीं था, बल्कि कई नेताओं ने कई बार सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के लिए अवज्ञा का प्रदर्शन भी किया था । सत्ता में लालू यादव जैसे प्रभावशाली नेता के दखल के रहते, राज्य में एकमात्र मजबूत सत्तासीन नेता के रूप में फिर से स्थापित हो सकने की उनकी इच्छा दब कर ही रह जाने वाली थी । अपने पिछले कार्यकालों में बिग बॉस और सवालों से परे नेता की तरह व्यवहार करने का उन्हें अभ्यास हो गया था । वैसे कई लोग यह भी मानते हैं, कि बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति के फिर से कमजोर पड़ने और व्यवस्था के संतुलन बिगड़ने में राष्ट्रीय जनता दल का सरकार में दखल होना एक प्रमुख कारण रहा । इससे नीतीश की बनी बनाई छवि को भी आघात पहुँच रहा था । ऐसा कहा जा सकता है कि नोटबंदी और राष्ट्रपति चुनाव जैसे मुद्दों पर नरेन्द्र मोदी के साथ एकजुटता प्रदर्शित कर वे राज्य में अपने महागठबंधन के घटक दल राष्ट्रीय जनता दल पर दबाव बनाकर शक्ति संतुलन स्थापित करने का ही प्रयास कर रहे थे । केन्द्रीय सत्ता की नाराजगी का घाटा भी उन्हें इसके लिए प्रेरित करता होगा । दरअसल नीतीश कुमार ने वहीं वापसी की है, जहाँ से प्रधानमंत्री पद की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की वज़ह से उन्होंने पलायन किया था । उसी महत्वाकांक्षा का व्यावहारिक परिणाम देख लेने के बाद और उसे स्थगित कर देने के बाद, अब उनके फिर से वापस आ जाने को बहुत महत्व की घटना या दुर्घटना नहीं मान जाना चाहिए ।

नीतीश पर जनमत के अपमान का जो आरोप लग रहा है, वह बिल्कुल सही है । लेकिन नीतीश अपने पूर्व के अनुभवों से निश्चिंत होंगे, कि यह कोई बड़ा मसला नहीं है । एक अनुभवी राजनेता की तरह वे इस बात से भी अच्छी तरह परिचित होंगे कि ऐसे काम सभी राजनीतिक दल करते रहे हैं । जनता जनादेश के ऐसे अपमानों को भुलाकर प्रोत्साहन की अपनी मुहर भी लगाती रही है ।

इसे स्वीकार लेना ही हितकर होगा कि ग़लती उन लोगों से हुई थी, जिन्होंने नीतीश की सारी वास्तविकता सामने होने के बावजूद उन्हें अपना हीरो मान लिया था । ग़लती वे लोग भी कर रहे हैं, जो सहानुभूतिवश लालू प्रसाद यादव को जनतंत्र के योद्धा की तरह पेश कर रहे हैं । मुख्यमंत्री के बतौर अपनी अराजनीतिक पृष्ठभूमि की पत्नी को अपने पार्टी के अनुभवी कार्यकर्ताओं पर तरजीह देने वाले और महागठबंधन सरकार में अपने बेटों के लिए उपमुख्यमंत्री के पद सहित कुल आठ मंत्रालय और उसी दौर में अपनी बड़ी बेटी मीसा भारती के लिए राज्यसभा की सीट सुरक्षित करने वाले व्यक्ति में आपको लोकतंत्र का योद्धा कैसे दिखाई दे सकता है?

नेता विपक्ष के बतौर तेजस्वी के भाषणों को सुनकर उनमें भविष्य के एक बड़े नेता को देख पा रहे लोगों को क्या क्षण भर के लिए भी यह खयाल आया होगा कि उन्हें नेता विपक्ष की जो हैसियत मिली है, उसके पीछे क्या उनकी मेहनत और जनता के बीच जाकर किया गया उनका काम है, या परिवारवाद है? हमें यह खयाल नहीं आना चाहिए था कि क्या उनकी जगह साधारण पृष्ठभूमि का कोई अन्य गरीब दलित या पिछड़ा नेता नहीं हो सकता था? क्या लालू प्रसाद यादव के इतने वर्षों के राजनीतिक संघर्ष की सबसे शानदार उपलब्धि सिर्फ उनके बेटे ही हैं? यदि हाँ, तो यह दुखद है कि हम इसे दुर्भाग्यपूर्ण नहीं मानते । ऐसे प्रायोजित नेताओं में अपने नायक ढूँढ़ना, दयनीय है । यहाँ यह जोड़ देने में कोई दिक्कत नहीं है कि सामाजिक न्याय के पक्ष में खड़ा होने का दावा करने वाली लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने अनेक अवसरों पर अपने ही सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ायी हैं ।

साभार : इंडिया टुडे
राहुल गाँधी ने इस मसले पर इस आशय की प्रतिक्रिया दी कि नीतीश अवसरवादी, अविश्वसनीय और जनतंत्र के प्रति विश्वासघाती हैं । राहुल को यह कहते हुए स्मरण नहीं रहा, कि खुद उनकी पार्टी ने इस लोकतंत्र का सर्वाधिक सुख लूटा है, और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के हनन में उनसे आगे पहुँचने में अभी भाजपा सरकार को भी वक्त लगेगा । बहुत पीछे न भी जाएँ तब भी राहुल के पार्टी महासचिव रहते ही कांग्रेस सरकार ने भ्रष्टाचार के मामले और उसके विरोधों पर जो रूख अपनाया, कई जन आंदोलनों को निर्ममता से कुचला और सरकार के मंत्रियों ने जो हर अवसर पर बेहद अहंकारी व्यवहार किया, क्या राहुल सचमुच उसे भूल गये हैं? क्या रहुल यह भी भूल गये हैं कि वे खुद लोकतंत्र की ताक़त से नहीं अपनी पारिवारिक हैसियत की वजह से कांग्रेस के महासचिव बने बैठे हैं । यदि किसी को राहुल में लोकतंत्र का रखवाला दिखता हो तो, अपने इस दृष्टिकोण के परिणामों की जिम्मेवारी भी उसे खुद ही लेनी होगी !

भाजपा ने कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए उसकी जिन योजनाओं और नीतियों का सख्त विरोध किया था, सत्ता में आने के बाद वह उन्हीं योजनाओं और नीतियों को अधिक सख्ती से लागू करवाने में अपना ध्यान लगा रही है । उदाहरण के लिए खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश, आधार योजना सहित कई नाम गिनाए जा सकते हैं । मीडिया लोभ, लाभ या भय से घुटने पर आ गयी है, या कई दूसरे तरीकों से उन्हें ऐसा ही करने पर मजबूर किया जा रहा है । काला धन, भ्रष्टाचार, नोटबंदी, गरीबों-किसानों के मुद्दे, रोजगार, शिक्षा, पड़ोसी राष्ट्रों से सम्बंध, शांति की स्थापना सहित लगभग हर मोर्चे पर सरकार ने जनता के साथ धोखा किया है, और भ्रमजाल में उन्हें फंसाए रखने के लिए लगातार कोशिश करती रही है । मीडिया ही नहीं आम जनता तक पर अघोषित सेंसरशिप की तलवार लटका दी गयी है । इस समय देश में धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर जो उन्माद पसारा जा रहा है, भीड़ द्वारा हत्यायें हो रही हैं, अल्पसंख्यकों में असुरक्षबोध पनप रहा है, उन सब को लेकर केन्द्र सरकार ने अब दायित्वबोध के साथ कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया है । देश भर में एक दमघोंटू माहौल है । क्या यही सब करने के लिए इस सरकार को जनादेश मिला था?

नरेन्द्र मोदी की सरकार कांग्रेस सरकार की तरह ही बल्कि उससे भी अधिक बेहयायी से दिल्ली की बहुमत से चुनी हुई आम आदमी पार्टी की सरकार के काम करने में लगातार बाधा उपस्थित करती रही है । क्या ऐसी पार्टी को लोकतंत्र और जनादेश का सम्मान करने वाली पार्टी कह सकते हैं? नरेन्द्र मोदी को नायक की छवि में कितना भी पेश किया जाए लेकिन वे और उनकी पार्टी किसी भी तरह से लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रतिनिधित्व करने के लिए योग्य नहीं ठहराए जा सकते ।

स्वयं आम आदमी पार्टी ने एक नयी राजनीतिक संस्कृति का भरोसा दिलाया था, लेकिन पार्टी नेताओं पर लगे आरोपों पर उसकी जो प्रतिक्रिया रही है क्या वह वैकल्पिक लोकतंत्र की बात करने वालों के लिए कहीं से उपयुक्त है? मतभेदों के कारण अपने ही दल के प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव सहित कई नेताओं को सरेआम अपमानित कर पार्टी से बाहर निकाल देने वाली आम आदमी पार्टी के नोताओं पर हम लोकतंत्र की बेहतरी में सहयोगी भूमिका निभाने वालों के रूप में कैसे भरोसा कर सकते हैं!

देश की दो बड़ी वामपंथी पार्टियों भाकपा और माकपा के जनतंत्र के प्रति गुनाहों की तो एक लम्बी सूची तैयार हो जाएगी । उनपर चर्चा करने के बजाय बिहार की सड़कों पर अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय रही भाकपा (माले) की बात करते हैं । अपने जुझारूपन और प्रतिबद्धताओं के दावों के और ऐसे ही इतिहास के कारण, जिससे बिहार के ताजा घटनाक्रम के दौरान जनता के बीच जाकर जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम ऐसी पार्टियों की नुराकुश्ती, घोर अलोकतांत्रिक चरित्र सहित स्वार्थ और अवसर केन्द्रित मित्रता और दुराव की छल भरी राजनीति का पर्दाफाश करने की अपेक्षा की जा सकती थी, वह इस स्थिति में असहाय सी दिखाई दे रही है । जिस पार्टी को इन तमाम तरह के नाटकों में उलझे बिना जनता के असल मुद्दों मात्र पर केन्द्रित होना चाहिए था, वह महाठबंधन के सम्भव होने और इसके चुनाव जीतने को ऐतिहासिक और जनाकांक्षाओं की जीत कह कर उल्लास दिखाने और महागठबंधन के टूटने पर नीतीश कुमार को कोसते हुए दुख में डूब जाने में अपनी उर्जा खर्च कर रही है ! जिस राष्ट्रीय जनता दल के एक प्रभावशाली सदस्य और पूर्व सांसद पर माले के एक जुझारू और लोकप्रिय युवा नेता चंद्रशेखर (चंदू) की हत्या का आरोप हो, और जिसके अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव सहित अन्य पार्टी नेताओं पर उन्हें अब तक लगातार संरक्षण देते रहने और इस हत्या के विरोध में हुए अभूतपूर्व प्रतिरोधी आंदोलन के दमन का आरोप हो, आश्चर्यजनक रूप से, भाकपा (माले) जनादेश के सम्मान और लोकतंत्र की बेहतरी की बात करते हुए उसी के लिए चिंतित दिख रही  है ! लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार के दौर में सामंती और वर्चस्वादी ताकतों से जन चेतना और एकता के बल पर निर्णायक अहिंसक लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए लगातार प्रयासरत रहे चंदू की 31 मार्च 1997 को सीवान में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी । इस मामले में न्याय, आज तक हासिल नहीं हो सका है । भाकपा (माले) उन लोगों और उन दलों के लिए दुखी है, जिन्होंने सत्ता में रहते हुए, बिहार मे हुए जघन्यतम जातीय हिंसाओं, नरसंहारों और इसमें दबंगों की भूमिका को लेकर न्याय सुनिश्चित करवाने में उदासीनता ही नहीं बल्कि नकारात्मक रूख अपनाया । साम्प्रदायिकता की हार लोकतंत्र की जीत है, यह कहना तो उचित है, लेकिन हत्यारों को संरक्षण देने वाली, भ्रष्टाचार में लिप्त और सामाजिक न्याय के प्रति निष्ठावान होने का ढोंग करते हुए सामाजिक न्याय का गला घोंटने वाली पार्टियों की जीत लोकतंत्र की और जनाकांक्षाओं की जीत कैसे हो सकती है?

साभार : आजतक
इस लेख में राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक दायित्वों से पलायन, जनादेश के अपमान, अवसरवाद के जो कुछ उदाहरण आए हैं, वे ऐसी कुल घटनाओं के छटांक भर भी नहीं है । भारतीय राजनीति में ऐसी घटनाएँ घटती ही रहती हैं । लगभग हर राजनीतिक पार्टी और उसके नेता इस तरह के गुनाहों में शामिल हैं । ऐसी विकट परिस्थिति में लोकतंत्र को बचाए रखने की उम्मीद किनसे की जाए?

नकली नायकों पर भरोसा जताना लोकतंत्र के प्रति हमारी खोखली चिंता और असम्बद्धता का ही परिणाम है । ऐसे नायक कभी भरोसेमंद नहीं हो सकते । ये अयोग्य ही नहीं भविष्य में लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक भी साबित हो सकते हैं । ऐसे नायकों या ऐसे विकल्पों के सहारे लोकतंत्र की बेहतरी की जंग जीत लेने का दंभ पालना बहुत बड़ी नादानी है । इसका परिणाम नुकसानदेह ही होगा । हमें यह भी समझना होगा कि जिस तरह साम्प्रदायिकता और घृणा एक लाभकारी राजनीति है, उसी तरह साम्प्रदायिकता विरोध भी अक्सर लाभ की राजनीति मात्र से प्रेरित होकर रह जाता है । साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर तमाम लोकतंत्र विरोधी बुराइयों को बर्दाश्त करने या ढँक देने का कार्य साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करने वाले कार्यों से कम आत्मघाती नहीं है । दि हम ईमानदारी से साम्प्रदायिकता और लोकतंत्र की अन्य चुनौतियों  के प्रति चिंतित हैं, तो हमें ईमानदार विकल्पों के पुनर्निर्माण अथवा नवनिर्माण पर ध्यान केन्द्रित करना होगा । बार-बार असफल होने की स्थिति में भी हमें यह प्रयास करते रहना होगा । यदि हम कुछ और नहीं कर सकते तब भी हमें कम से कम ईमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए कि हम मौजूदा राजनीतिक स्थिति में विकल्पहीन हैं । इस बात को खुल कर अभिव्यक्त भी करना चाहिए ।  इस तरह के असंतोष, कई बार बेहतर रास्तों के निर्माण के कारण बनते हैं !
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